शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

जनकवि को श्रद्धांजलि

हरीश भादाणी इस दुनिया में नहीं रहे। वे शायद स्‍वर्ग में नहीं जाएंगे। क्‍योंकि जीते जी जो ईश्‍वर के नाम पर बनाए हर सिस्‍टम का विरोध करते रहे वे मरने के बाद भी संभव है अपनी इस कोशिश को जारी रखें। केवल इसी कारण नहीं बल्कि आम आदमी की तकलीफ और दर्द को अपने सस्‍वर काव्‍य में दिखाने वाले हरीशजी को उनके पाठकों ने ही जनकवि बना दिया। जनवादी लेखक संघ के संस्‍थापकों में से एक इस कवि ने पूर्व स्‍थापित सभी मान्‍यताओं, भ्रांतियों और परम्‍पराओं को चुनौती दी और बहुत हद तक सफल भी रहे। अब अगर उसी भगवान के दूत उन्‍हें स्‍वर्ग में प्रवेश का न्‍यौता भी देंगे तो वे मना कर देंगे और एक नया स्‍वर्ग बनाएंगे। उनका वृहद् परिवार जिसमें उनके चाहने वालों की संख्‍या ही अधिक है, उस स्‍वर्ग में जाने के लिए लालायित रहेगा। खैर, बीकानेर के इस सपूत ने मरने के बाद भी बीकानेर नहीं छोड़ा। अपनी देह यहीं के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज को दान कर दी। यह भी स्‍थापित परम्‍परा को तोड़ने का ही जज्‍बा है। उन्‍हें मैं शब्‍दों में श्रद्धांजलि नहीं दे सकता सो उनकी कविता को यहां पेश कर रहा हूं जिसे उन्‍होंने तकरीबन हर मंच पर गाया फिर भी लोगों की प्‍यास बनी रही। उनके स्‍वर तो नहीं है लेकिन शब्‍द पेश करने की कोशिश कर रहा हूं।

रोटी नाम सत है

खाए ते मुगत है

ऐरावत पर इंद्र बैठे

बांट रहे टोपियां

झोलियां फैलाए लोग

भूग रहे सोटियां

वायदों की चूंटनी से

छाले पड़े जीभ पर

रसोई में लाव-लाव

भैरवी बजत है

रोटी नाम सत है

खाए ते मुगत है

बोले खाली पेट की

क्रोड़-क्रोड़ कुण्डियां

खाकी वर्दी वाले भोपे

भरे हैं बन्‍दूकियां

पाखण्‍ड के राज को

स्‍वाहा-स्‍वाहा होम दे

राज के विधाता सुण

तेरे ही निमत्त है

बाजरी के पिण्‍ड और

दाल की वैतरणी

थाळी में परोस ले

हथाळी में परोस ले

दाता के हाथ

मरोड़कर परोस ले

भूख के धरमराज

यही तेरा व्रत है

रोटी नाम सत है

खाए ते मुगत है

- जनकवि हरीश भादाणी

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

लड़का ही क्‍यों...

पिछले तीन दिन से बस सोच ही रहा हूं। आमतौर पर किसी एक विषय को लेकर सोचने का क्रम कभी इतना लम्‍बा नहीं चल पाता है लेकिन पिछले तीन दिन में हर काम करते-करते, उठते-बैठते, आते-जाते, सोते-जागते यही सोच रहा हूं। बचपन में मां सरस्‍वती की एक तस्‍वीर थी। उसमें उनके हाथ में वीणा और सादे वस्‍त्र देखा करता था। चेहरे पर ऐसी सौम्‍यता कि लगता काश यही मेरी मां होती। बाद में पता चला कि ये तो वास्‍तव में सबकी मां है। लता मंगेशकर को बहुत बाद में देखा। सुना पहले। कुछ खास अनुभव नहीं हुआ लेकिन जब देखा तो देखता रह गया। वही सादगी और वीणा के तारों की झनकार जैसी आवाज। मानो सरस्‍वती उनके जरिए अपनी आभा दिखा रही हो। कई कार्यक्रमों में देखा। एक बार तो टीवी पर लाइव शो देखा। उसमें अमिताभ बच्‍चन उनके साथ गा रहे थे। कुछ लोग स्‍टेज पर आने पर उनके पैर छू रहे थे। कुछ नहीं भी छू रहे थे, तब मैंने सोचा कि जो लोग लता जी के पैर नहीं छू रहे हैं वे एक अच्‍छा मौका खो रहे हैं। एक बार यसुदास ने कहा कि अब लताजी की आवाज में कंपन आ गया है उन्‍हें गाना बंद कर देना चाहिए। तब अच्‍छा खासा बवाल खड़ा हो गया था। तब खुद लताजी ने कहा कि यसुदास सही कह रहे हैं। उसके बाद ही मैंने यसुदास के कैसेट्स लाकर सुने। लड़कपन से एक इच्‍छा यह भी है कि एक बार मुम्‍बई जाउं और लताजी के पैर छूकर आउं। लताजी को देखकर ही मुझे शायद एक बेटी की भी इच्‍छा है।

पिछले दिनों वे अस्‍सी साल की हो गई। वही सौम्‍य अंदाज और वही वीणा के तारों की आवाज। उनके अस्‍सीवें जन्‍मदिन पर उनके एक पुराने इंटव्‍यू को छापा गया था। उसी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। उसमें उन्‍होंने कहा कि अगले जन्‍म में वे लड़की नहीं बल्कि एक साधारण परिवार में लड़का बनकर जन्‍म लेना चाहती हैं। इस बात ने मुझे झकझोर दिया। मैं सोच रहा था कि वैसी जिंदगी बार-बार कौन नहीं चाहेगा लेकिन इस जन्‍म में भी लताजी को शांति नहीं मिली तो कैसे जन्‍म में मिलेगी। क्‍या एक लड़का होना अच्‍छी जिंदगी की गारंटी है। क्‍या लड़कियां वास्‍तव में खाली दु:ख पाने के लिए ही पैदा होती हैं। हो सकता है कि मंगेशकर बहनों का बचपन इतना अच्‍छा नहीं रहा। हर किसी ने अपने तरीके से संघर्ष किया। लताजी के अलावा आशा भोंसले के जीवन में भी उतार चढ़ाव रहे और दोनों मंगेशकर बहनों की वृहद् छाया में उषाजी को भी कुछ तकलीफ हुई होगी। भले ही निरी ईर्ष्‍या के कारण ही हुई हो। लेकिन किसे समस्‍या नहीं है।

एक ज्‍योतिषी या एक पत्रकार के तौर पर देखता हूं तो समस्‍याएं हर जगह दिखाई देती हैं। क्‍या पलायन से शांति संभव है। क्‍या संघर्ष से भागने पर इसका अंत हो जाता है। क्‍या रणछोड़ बन जाने से युद्ध की स्थिति खत्‍म हो जाती है। लड़ना तो पड़ेगा ही संघर्ष की लकीरें नहीं होगी तो कैसे लिखेंगे जीवनी।

फिर दूसरा पक्ष भी मैं सोचना चाहता हूं। मैंने पढ़कर और देखकर अनुभव किया है कि इंसान दो चीजों के लिए जिंदा रहता है। स्‍पर्श और महत्‍व। वास्‍तव में इस जिंदगी में लताजी को इनमें से एक ही मिला होगा। असामान्‍य बचपन ने स्‍पर्श का अभाव दिया, असामान्‍य जवानी ने भी स्‍पर्श को दूर रखा और अब वृद्धावस्‍था भी स्‍पर्श से अछूती लगती है। ऐसे में जीवन अनुभव के दो मूल तत्‍वों में से एक का एकांतिक अभाव ऐसी सोच को पैदा कर रहा होगा। मैं भी चाहता हूं कि लताजी को अपने अगले जीवन में दोनों सुख मिले और भरपूर मिले, लेकिन क्‍या उसके लिए लड़का होना जरूरी है।

मैं निजी तौर पर चाहता हूं कि हमारी अगली संतान कन्‍या हो। लता मंगेशकर जैसी हो। भले ही उसे लताजी जैसी प्रसिद्धि न मिले लेकिन सादगी और वीणा के तारों सी आवाज हो। उसे हर संभव सुविधाएं मुहैया कराउं, उसके लिए अच्‍छा वर ढूंढकर लाउं और वह मनमर्जी का अच्‍छा जीवन जिए। मेरे जैसे बहुत से लोग होंगे जो ऐसी कामना रखते होंगे। लताजी से निवेदन है कि वे ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि ऐसे ही किसी घर में वे अगले जन्‍म में पैदा करे। फिर से कन्‍या बनाकर न कि लड़का। क्‍योंकि मां सरस्‍वती के आशीर्वाद की अभी इस धरती को बहुत जरूरत है। इस जन्‍म में भी मैं चाहता हूं कि लताजी कम से कम बीस साल तो और जिएं। उनके सौ साल पूरे होने तक मैं इंतजार कर लूंगा। उसके बाद अगली संतान करने को तैयार हूं। फिर मेरे घर आए कन्‍या के रूप में मां सरस्‍वती का आशीर्वाद बनकर...

बुधवार, 9 सितंबर 2009

अभिभूत हूं

सात सितम्‍बर को मेरा जन्‍मदिन था। जब पच्‍चीस साल का हुआ था तो लगा था कि बहुत बड़ा हो गया। तब से हर बार वर्षगांठ आने पर लगता कि अरे अभी तक कुछ किया भी नहीं और चौथाई जिंदगी निकल गई। आस-पास का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। सो लगता कि जन्‍मदिन आने का मतलब है बहुत खराब बात। एक और साल हाथ से निकल गया। इस भावना ने दिन में काम के घण्‍टों को बढ़ा दिया था। पहले पढ़ाई के साथ-साथ कम्‍प्‍यूटर कोर्स और खेल-कूद जारी रखे तो नौकरी लगने के बाद भी दूसरे आयाम खोजता रहा।

2008 में सक्रिय रूप से ब्‍लॉगिंग में जुड़ा और इसके बाद तो जैसे पंख लग गए। रोज नए लोगों से जानकारी और रोज नए विचार। कभी-कभार इतनी खुश करने वाली घटनाएं भी नहीं होती लेकिन ओवर ऑल बहुत अच्‍छा समय रहा। अभी सात सितम्‍बर को 32 साल का हो रहा था, तब अचानक इस बार दो-तीन दिन पहले घर में जन्‍मदिन की तैयारी शुरू हो गई और बाहर भी लोग पूछने लगे। ऑफिस में जहां आमतौर पर मैकेनिकल माहौल रहता है, वहां भी सरसता घुल गई। स्‍टॉफ के कई लोगों को पता था कि सात सितम्‍बर को मेरा हैप्‍पी बर्थ डे है :)

उत्‍साह बढ़ता गया, मैंने पाबलाजी को मेल करके आग्रह किया कि ब्‍लॉगर्स के जन्‍मदिन में मेरा नाम भी शामिल किया जाए। पांच सितम्‍बर को सुबह मेल की और दोपहर तक तो उनकी मेल वापस भी आ गई। शाम तक तो नाम भी जुड़ चुका था और सात सितम्‍बर को बड़े फोंट में उस ब्‍लॉग पर प्रकाशित हुआ कि आज सिद्धार्थ जोशी का जन्‍मदिन है। ऐसा लगा किसी और के बारे में पढ़ रहा हूं। नीचे बधाइयों के संदेश जुड़ते गए।

ब्‍लॉग, ईमेल, एसएमएस, ऑरकुट और फोन कॉल के दौर सुबह-सुबह शुरू हो गए जो देर रात तक चलते रहे। सालों बाद ऐसा लगा कि वाह... ऑफिस में तो छोटी सी पार्टी भी हो गई।

घर में भी पार्टी भी हुई। परिवार के लोग एकत्रित हुए। हमारे यहां काठे दाल-भात और लापसी बनते हैं। यह टिपिकल राजस्‍थानी या कहूं बीकानेरी खाना है। कुल जमा पंद्रह लोग शामिल हुए लेकिन गिफ्ट खूब आए। सबने दिए। कैश भी। मजा आ गया।

साल में कम से कम एक बार तो ऐसा होना ही चाहिए कि बर्थ डे ब्‍वॉय बना जाए। दिन में जमकर खुशियां मनाने के बाद रात को उत्‍साह के मारे नींद भी नहीं आई। (वैसे भी रोज दो बजे से पहले सोता नहीं हूं)। बैठकर बीते सालों के बारे में सोचता रहा। फर्क बस इतना था कि अच्‍छी बातें ही ध्‍यान आई।

पता नहीं साल कैसा बीतेगा लेकिन पहला दिन इतना मस्‍त था कि लगा पूरा साल बढि़या जाएगा। एक बार फिर सभी लोगों को दिल से धन्‍यवाद। मेरे खास दिन को खासमखास बनाने के लिए।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

क्‍या हम अपनी ही ताकत से डरते हैं ?

मुझे लगता है हां, कई बार यह इतनी अधिक हो जाती है कि समझ में नहीं आता कि इसका क्‍या किया जाए। तब या तो इसे नष्‍ट करने के तरीके ढूंढने लगते हैं या फिर उसे डायवर्ट कर देते हैं। वास्‍तव में पूरी ताकत का क्‍या किया जाए इसका जवाब काफी टेढ़ा है। गांधी, नेहरू, सरदार वल्‍लभ भाई पटेल, कृष्‍ण मेनन, चेतन भगत, नेपोलियन, हिटलर, डेंजिल वाशिंगटन, इंदिरा नुई, इंदिरा गांधी, सचिन तेंदुलकर सहित हजारों नाम गिनाए जा सकते हैं। वही बहत्‍तर हजार आठ सौ चौसठ नाडि़यां और वही फेफडे़ होने के बावजूद प्रयासों में जमीन आसमान का अन्‍तर है। तो क्‍या शरीर से इतर दिमाग की कोई नस ऐसी भी है जो बाकी के हिस्‍से को खोलने से रोकती है।

कुछ भी हो ताकत तो वही है, फिर कौनसी चीज है जो हमें रोकती है...

क्‍या है जो उन्‍हें लगातार आगे बढ़ने और अनजान की ओर जाने का साहस देता है...

कौनसी शक्ति इसके पीछे काम करती है्...

कैसे वे अपनी शक्ति को नियंत्रित कर पाते हैं...

यह भाग्‍य तो नहीं हो सकता क्‍योंकि भाग्‍य की बात की जाए तो इनमें से अधिकांश लोगों ने आम लोगों से अधिक दुर्भाग्‍य झेला होगा...

क्‍या वास्‍तव में हम अपनी ताकत से डरते हैं... ?

शनिवार, 29 अगस्त 2009

दार्शनिकता कब शुरू होती है

Adi    SwamiMain      ka     11024X768

दो साल तक ऑ‍फीशियली दर्शन का विद्यार्थी रहा। ऑफीशियली का मतलब पोस्‍ट ग्रेजुएट का विद्यार्थी रहा। उन दो सालों में ओशो, कृष्‍णामूर्ति, अरविन्‍द और विवेकानन्‍द के जीवन दर्शन से इतर शुद्ध लॉजिकल दर्शन से रूबरू हुआ। मेरे लिए जुदा अनुभव था। 'मैं हूं इसलिए ईश्‍वर है' और 'घोस्‍ट इन द मशीन' के पश्चिमी विचारों से लेकर 'एको ब्रह्म जगत मिथ्‍या' तक के विचारों को पढ़ गया था। हालांकि शंकराचार्य उत्‍तरार्द्ध में आते थे लेकिन मैं उन्‍हें भी पूर्वाद्ध में पढ़ गया। कोई काम तो था नहीं, नया नया शौक था सो पढ़ता गया। दिसम्‍बर की सर्दियों में जोधपुर विश्‍वविद्यालय से एक प्रोफेसर आए जोशी जी (अभी उनका पूरा नाम याद नहीं आ रहा, वे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के फोटोग्राफर भी हैं।) का अतिथि व्‍याख्‍यान हुआ। पहले दिन उन्‍होंने हल्‍के-फुल्‍के अंदाज में 'दर्शन क्‍या है' पर भाषण दिया। न तो भाषण समझ में आया न उसका औचित्य। एक सवाल उन्‍होंने शुरू से आखिर तक खड़ा किया था कि दर्शन कब शुरू होता है। और मेरे दिमाग में एक ही बात आई कि जब आदमी खा पीकर लेटी हुई मुद्रा में होता है तब यह दर्शन शुरू होता है।

भाषण के आखिर में उन्‍होंने पूछ ही लिया कि बताइए दर्शन कब शुरू होता है। उनका मतलब सत्‍य की खोज लॉजिकल तरीके से पराकाष्‍ठा तक पहुंचने के संदर्भ था। उन्‍होंने डेढ़ घण्‍टे के अपने भाषण में यही स्‍थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन मैं अड़ गया। मेरे पास अपने ठोस कारण थे। हमारी बीकानेर की डूंगर कॉलेज में पूर्वाद्ध और उत्‍तरार्द्ध के अस्‍सी छात्रों में एक भी ऐसा बंदा नहीं था जो स्‍थापित परिवार से न हो। यानि सब खाते-पीते घरों के। पोस्‍ट ग्रेजुएट करके भी वे अपने परिवारों पर अहसान कर रहे थे, कि बेरोजगार नहीं है पढ़ रहे हैं। मेरे खा-पीने के बाद लेटने वाले लॉजिक में दम था। हमारी कॉलेज के संस्‍कृत के एक विद्वान अध्‍यापक को मेरी बात जंची नहीं। वे सोच रहे थे कि मैं दर्शन की मजाक बना रहा हूं लेकिन जोशी सर समझ गए। उन्‍होंने कहा आज के संदर्भ में तुम्‍हारी बात ठीक है लेकिन पश्चिम में अरस्‍तू और भारत में शंकराचार्य ने भूखे रहकर दर्शन को स्‍थापित किया। इस पर मेरा कहना था कि वे शुद्ध विचार थे जिन्‍हें अब दर्शन में शामिल किया गया है। जोशी सर का पक्ष भी उतना ही दमदार था, लेकिन मेरा लॉजिक भी कॉलेज में दर्शन को चुनौती दे रहा था। इस बीच संस्‍कृत वाले सर बौखला गए। वे वार्ता को सिरे पर पहुंचाने के बजाय मुझे ही डांटने लगे। उनके कारण बात सिरे पर नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में भाषण और संवाद खत्‍म होने के बाद बाहर बरामदे में मैंने कोशिश की कि जोशी सर से एक बार फिर बात की जाए लेकिन दूसरे अध्‍यापकों ने मुझे मौका नहीं दिया। अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त लैक्‍चरर से हर कोई मिलने को उत्‍सुक था। मेरी बात वहीं  रह गई।

अंत में मैंने अपने स्‍तर पर ही निष्‍कर्ष निकाला कि अब जो दर्शन है वे इलाईट क्‍लास के हाथ में है ओर कुछ नया विचार आने के बजाय बस पुराने विचारों की जुगाली हो रही है। बाद में और भी पढ़ा पर कहीं भी शुद्ध दार्शनिकता नहीं मिली। उन दो सालों के बाद जब भी ओशो को पढ़ा तो लगा कि वे लॉजिक से स्‍थापित पुरानी बातों को चुनौती दे रहें, उसमें नया कुछ नहीं बस विरोध है। हर स्‍तर पर विरोध, चार्वाक को खराब बताया गया है तो चार्वाक का समर्थन कर देते हैं और नीति को सही बताया गया है तो उसके औचित्‍य पर सवाल खड़ा कर देते हैं। विवेकानन्‍द और अरविन्‍द पुरानी बातों को नए अंदाज में दोहरा रहे हैं। बस कृष्‍णामूर्ति का संवाद नया है लेकिन सिरे चढ़ता नहीं लगता। खुले सूत्र इतने अधिक हैं कि वह स्‍थाई नहीं दिखाई देता।

उत्‍तरार्द्ध में जब डेजरर्टेशन देने का मौका आया तब भी मैंने पुराने विचारों को ही लिया। बस अंतर इतना था कि दो दर्शनों को जोड़ दिया था। वास्‍तव में यह कहना भी गलत होगा कि जोड़ दिया। वे खुद जुड़े हुए हैं। राबिया,  अमीर खुसरो, खय्याम, इकबाल जैसे विचारक वास्‍तव में शंकराचार्य के दर्शन की ही पैरोकारी करते हैं। अपने अंदाज में। सो मैंने विषय रखा 'इस्‍लाम में धर्म की दार्शनिक पृष्‍ठभूमि।' इसमें मैंने इस्‍लाम को कुरान से इतर सूफी रहस्‍यवाद से जोड़कर पेश किया था। जब मैंने इसे सभा में पढ़ा तो विद्यार्थियों के अलावा हमारी एचओडी का चेहरा भी ब्‍लैंक था। डेजरर्टेशन खत्‍म होने के बाद तो उन्‍होंने ईमानदारी से कह दिया कि सिद्धार्थ ये कहां से उठा लाए हो। खैर मुझे तो समझ नहीं आया, जो भी है इसे सबमिट कर दो। :)