मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

ब्‍लॉगिंग में संप्रेषणीय आग्रहता

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में लेखकों का उत्‍साह लगातार बढ़ता हुआ देख रहा हूं। एक तरफ पचासों लोग हैं जो आमतौर पर भी कुछ भी लिख दें तो पूरी शिद्दत के साथ पढ़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी लेखकों की मिसालें भी हैं जो ऐसा लिखते हैं कि पाठक पढ़ना चाहते हुए भी पढ़ नहीं पाते। हालांकि पाठकों और टिप्‍पणीकारों का लगातार आग्रह रहता है कि ऐसी भाषा में लिखा जाए जिसे आम आदमी आसानी से पढ़ और समझ सके। इसके बावजूद लिखने में सिद्धहस्‍त लोग अपनी धुन में उत्‍कृष्‍ट साहित्‍य नेट पर रच रहे हैं।

ठीक है, भले ही आज किसी को समझ में न आए लेकिन किसी न किसी दिन किसी न किसी पाठक को तो ये लेख समझ में आएंगे ही।

मैं सीधा-सीधा किसी का नाम नहीं लूंगा लेकिन विषय आधारित और कई जगह विषय से हटकर कुछ लोग ऐसी भाषा लिख रहे हैं जो कम से कम मुझे एक बार में समझ में ही नहीं आती। जरूरी नहीं है कि मैं सभी विषयों का अच्‍छा जानकार होउं और यह भी जरूरी नहीं है कि सबकुछ मेरे लिए ही लिखा जा रहा है। इसके बावजूद संप्रेषण को सुगम बनाने की आग्रहता बनी रहती है।

मैं सोचता हूं कि किसी हैडिंग को पढ़ने के बाद मेरी इच्‍छा होती है कि इस विषय पर जो लेख लिखा गया है उसे पढूं और समझूं कि इसमें नया क्‍या है। हो सकता है इस बारे में बाजार में कई किताबें उपलब्‍ध हों लेकिन जब एक ब्‍लॉगर लिख रहा है तो समझने के बाद नेट के पाठकों को समझाने के इरादे से लिख रहा होगा। मैं उस पोस्‍ट में पहुंचता हूं, तो पाता हूं कि अब तक जिस अंदाज में विषय को पढ़ा और समझा था उससे कहीं अधिक दुरुह अवस्‍‍था में यह नेट पर मिल रहा है। किसी लेख विशेष को एक दो या तीन बार पढ़ने के बाद भी मेरी उलझन खत्‍म नहीं होती, तो कुछ देर उलझा रहने के बाद अंतरजाल के किसी दूसरे कोने की ओर चल देता हूं।

आमतौपर नेट पर जमे हुए अधिकांश पाठकों की भी यही स्थिति होती होगी।

जो बातें किताबों में लिखी जा चुकी हैं उन्‍हें ज्‍यों का त्‍यों नेट पर हिन्‍दी में डाल देना न केवल हिन्‍दी की सेवा है बल्कि नेट पर हिन्‍दी के वर्चस्‍व की ओर एक और कदम है लेकिन यह कदम कितना प्रभावी है, यह सोचना भी महत्‍वपूर्ण लगता है। कई लोग अपनी बात लिख रहे हैं, सादे शब्‍दों में, कई बार कुछ कठिन शब्‍दों का भी इस्‍तेमाल करते हैं, लेकिन वे इतने कठिन नहीं होते कि पढ़ने पर सिर चकरा जाए, लेकिन सोचिए कि क्‍या बिना किसी विषय विशेष को केन्‍द्र में रखे ये लोग क्लिष्‍ट भाषा लिखते, तो क्‍या आज उन्‍हें इतनी लोकप्रियता मिल पाती।

मैं सोचता हूं,  नहीं।

... इससे हिन्‍दी और इसके क्लिष्‍ट शब्‍दों का महत्‍व भी कम नहीं होता।

जनकवि हरीश भादाणीजी की कविताओं की समीक्षा में एक बार जगदीश्‍वर चतुर्वेदीजी ने कहा था कि ये कविताएं केवल गाने के लिए हैं। आम आदमी सुनेगा और भुला देगा। जब तक खुद हरीशजी गाएंगे ये कविताएं जिंदा रहेगी लेकिन खुद हरीशजी के सीन से हटने के साथ ही कविता का भी लोप हो जाएगा। उनका संदर्भ हरीश भादाणीजी की कविताओं में आ रहे बिंब और बिंब के विचार में रिड्यूस होने के बारे में था। इस पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंदकिशोर आचार्यजी ने कहा था कि हरीशजी आम जनता से संप्रेषणीय आग्रहता के चलते बिंब के साथ कविता का सृजन करते हैं। और यह बिंब आम आदमी की समझ में आए इसलिए कविता के अंत तक बिंब यानि इमेज को विचार तक रिड्यूस कर देते हैं। यह कमी नहीं बल्कि हरीशजी की खासियत है।

आज उस घटना के करीब दो साल बाद मैं देख रहा हूं कि ब्‍लॉगिंग में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

एक ज्‍योतिष विद्यार्थी के रूप में जब लिखना शुरू किया तो लगा कि क्‍या लिखा जाए जो आम आदमी को समझ में आए। विषय को लेकर सैकड़ों सवाल दिमाग में थे और अब भी हैं लेकिन उनमें से कुछ विषयों का जुड़ाव आम आदमी से सीधे होता है। अब नवमांश और सबलॉर्ड में से किसे अधिक सटीक माना जाए इस पर बहस की गुंजाइश अभी नेट पर नहीं है लेकिन ज्‍योतिष में अंधविश्‍वास या साढे़साती की समस्‍या पर हर पाठक पढ़ने को तैयार मिलेगा। ऐसे में मैं सरल शब्‍दों में अपनी बात रख पाता हूं तो पाठक भी उस विचार से खुद को जुड़ा हुआ पा सकेगा। जितने अधिक पाठक जुड़ेंगे विषय से नजदीकी भी उतनी ही बढ़ती जाएगी।

शुरूआती दौर में एक रास्‍ते पर कुछ दूरी तक पाठक को खींच लेने के बाद विषय को क्लिष्‍ट बना लिया जाए तो शायद किसी को आपत्ति नहीं होगी लेकिन शुरूआत ही ऐसे शब्‍दों से हो जिन्‍हें समझने के लिए हर पंक्ति के बाद रुककर डिक्‍शनरी निकालनी पड़े तो क्‍या नेट पर ब्‍लॉग पढ़ना सजा की तरह नहीं हो जाएगा...

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

एक नया अध्‍याय शुरू हुआ बीकानेर में

मैं संयोगों पर यकीन करता हूं। ये बार बार होते हैं। हर बार होते हैं और मुझे पहले से अधिक आश्‍चर्यचकित छोड़ जाते हैं। इस बार फिर ऐसे ही संयोग हुए जिन्‍होंने ने न केवल मुझे सोचने पर मजबूर किया बल्कि कई दूसरे लोग भी इन संयोगों की चपेट में आए। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं कि मैं सक्रामक हो चुका हूं। इस बार तो मैंने संक्रमण के बीच ही बो दिए। या कहूं कि समय ने कुछ ऐसा चक्रव्‍यूह रचा कि संक्रमण के बीज खुद ब खुद आए और बीकानेर की मानस धरती पर समा गए। बीकानेर में ब्‍लॉग संगोष्‍ठी हुई। इसके लिए दो दिन से एक शब्‍द तलाश रहा हूं। पर घूमफिरकर एक ही सही शब्‍द दिमाग में आता है वह है...

ब्‍लॉग आमुखीकरण कार्यशाला

चलिए पहेलिया छोड़कर सीधे मुद्दे पर चलते हैं। अहमदाबाद से वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर संजय बेगाणीजी सपरिवार बीकानेर आए। मैं बता दूं कि बीकानेर के पास के एक छोटे से गांव बीदासर से निकला बेगाणी परिवार करीब पैंतीस साल से सूरत और अहमदाबाद में स्‍थापित है। तो जड़ों की ओर लौटने के लिए संजय जी को बहाना मिला अपने साले साहब की शादी का। वे बीकानेर आ रहे थे उन्‍हीं दिनों उनसे मेरा संवाद स्‍थापित हुआ। इसी संवाद के दौरान उन्‍होंने मुझे बताया कि वे 27 नवम्‍बर को बीकानेर पधार रहे हैं। मैंने ब्‍लॉगर मीट के सपने देखने शुरू कर दिए। एक भरा हुआ हॉल और एक के बाद एक ब्‍लॉगर आए और अपने अनुभव दूसरों के साथ बांटता चला जाए। जो पहले से ब्‍लॉगर हैं वे तालियां बजाएं और जिन लोगों ने अब तक ब्‍लॉग शुरू नहीं किया है वे मुंह बाएं देखते रहें। खैर, दिन का सपना था सो जल्‍दी टूट गया। संयज जी के बीकानेर आने से ठीक एक दिन पहले तक बीकानेर में पहले महापैार फिर उपमहापौर के चुनाव सिर पर रहे। मैं शुरूआती एक दो दिन तैयारी के निकालने के बाद ऐसा व्‍यस्‍त हुआ कि बेगाणीजी की अगली मेल से तंद्रा टूटी और फिर से ब्‍लॉग मीट की तैयारी करने लगा। हकीकत तो यह है कि अपने दमघोंटू दिनचर्या में से मैंने कुछ ही घंटे निकाले।

डॉ. कटारिया की स्‍नेहपूर्ण कृपा

मैं खुद कभी किसी का अच्‍छा मित्र नहीं रहा हूं लेकिन मुझे हमेशा अच्‍छे मित्र मिले। इसी कड़ी में एक और नाम है डॉ. प्रताप कटारिया। वे बीकानेर संभाग के सबसे बड़े कॉलेज में प्राणीशास्‍त्र के व्‍याख्‍याता हैं और शौकिया पक्षीविज्ञानी। मैंने उन्‍हें बताया कि अहमदाबाद से वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर आ रहे हैं उनके लिए एक संगोष्‍ठी का आयोजन कराने की कोशिश कर रहा हूं। उन्‍होंने कहा ठीक है मैं मदद कर दूंगा। बाद में तो यह स्थिति हुई कि शुरू से आखिर तक की सारी व्‍यवस्‍थाएं उन्‍होंने ही कराई। समय कम होने के कारण कॉलेज के तीन एलसीडी प्रोजेक्‍टर किसी न किसी कारण से हमारी पहुंच से दूर थे। माइक भी ईद की छुट्टी की वजह से अरेंज नहीं हो पाया। इन सबके बावजूद न तो किसी के उत्‍साह में कमी थी न उत्‍सुकता में।

मौजूद लोग

इनके बारे में मैं इसलिए जानकारी देना चाहता हूं कि संजयजी का भाषण और उपस्थिति श्रोताओं का तारतम्‍य समझा जा सके। डॉ. कटारिया के अलावा डॉ। नवदीप बैंस डूंगर कॉलेज के व्‍याख्‍याता हैं,

डिफेंस रिसर्च डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक डॉ. हनुमानप्रसाद व्‍यास जो कि महात्‍मा गांधी और विवेकानन्‍द पर राष्‍ट्रीय स्‍तर की कई कांफ्रेंस में भाषण देते रहे हैं, और अंतरराष्‍ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ समझे जाते हैं इन्‍होंने अपने जिंदगी के बीस साल अमरीका में गैलियम आर्सेनाइड पर रिसर्च में लगाए और भारत में आकर तकनीक विकसित करने पर पाथ ब्रेकिंग अवार्ड लिया,

शंकर लाल हर्ष भी मौजूद थे, हर्ष जी एशियन शतरंज संघ के उपाध्‍यक्ष रहे हैं और बीकानेर में शतरंज की अंतरराष्‍ट्रीय प्रतियोगिताएं करवा चुके हैं। अब भी हर साल दुनिया के कई देशों की यात्राएं करते हैं शतरंज टूर्नामेंटों को लेकर क्‍योंकि वे इंटरनेशनल ऑर्बिटर हैं,

विनय कौड़ा जो कि देश के प्रमुख आठ अखबारों के एडीटोरियल में नियमित रूप से छपते हैं, इनमें अमर उजाला, प्रभात खबर, राजस्‍थान पत्रिका जैसे नाम शामिल हैं, ये अंतरराष्‍ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं,

पुखराज चोपड़ा जी अंतरराष्‍ट्रीय ट्रेड पर गहरी नजर रखते हैं और इनकी सलाह देश के सभी प्रमुख चैनल और अखबार सुनते हैं। इनके ब्‍लॉग की हर नई पोस्‍ट को ऑन लाइन ट्रेडिंग से जुड़े लोग तुरंत पढ़ते हैं।

इनके अलावा इन्‍हीं लोगों से संबंधित कुछ और लोग थे।

मेरी सीमाएं

कार्यक्रम के लिए मैंने भरसक प्रयत्‍न किया कि कम से कम पचास लोग तो आएं ही, लेकिन पूरी कोशिश करने के बावजूद भी शादियों का दिन, ईद की छुट्टी और अन्‍य कई कारणों से कई लोग चाहकर भी पहंच नहीं पाए। अगली कांफ्रेंस तक मैं कोशिश करूंगा कि कम से कम सौ लोग तो शामिल हों ही। वैसे मैं सोचता हूं कि खाने का प्रबंध किया जाएगा तो भोजनप्रिय बीकानेर के लोग अवश्‍य पहुंच जाएंगे। यह व्‍यवस्‍था कैसे होगी आगे बताउंगा।

तो शुरू हुआ कार्यक्रम

मेरी पंचायती में यह पहला कार्यक्रम था। सो ऑफीशियली कैसे शुरू करते हैं मुझे पता नहीं था। मैंने सबसे पहले कॉल किया संजय बेगाणीजी को, बेगाणी जी बस तैयार हो ही रहे थे कि डूंगर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पी.आर. ओझा ने घड़ी देखते हुए कहा कि पहले मैं बोलूंगा। अब डॉ. ओझा ब्‍लॉग तो लिखते नहीं हैं लेकिन हिन्‍दी पढ़े हुए हैं। उनके पिताजी भी हिन्‍दी के विद्वान थे। उन्‍होंने जो कुछ भी बोला उसका संबंध ब्‍लॉगिंग से कतई नहीं था। सो आपका समय भी मैं खराब नहीं करूंगा।

अब बारी थी संजय जी की...

उन्‍होंने जो कहा उसका मंतव्‍य था कि इंटरनेट पर भाषाओं की जंग छिड़ी हुई है। इसमें अंग्रेजी भाषा के बाद अब चीन अपना वर्चस्‍व स्‍थापित करने में लगा हुआ है। सन 2020 तक इंटरनेट की प्रथम भाषा चीनी होगी और दूसरे स्‍थान पर हिंदी होगी। भले ही हम इससे खुश हो जाएं लेकिन ऐसा क्‍यों नहीं हो सकता कि हम पहले स्‍थान पर रहें। इसके लिए हर प्रबुद्ध व्‍यक्ति को ब्‍लॉग लिखना चाहिए। अब ब्‍लॉग पर क्‍या लिखा जा रहा है और क्‍या लिखा जा सकता है। इस बारे में उन्‍होंने कहा कि साहित्यिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ब्‍लॉग कचरे से अधिक कुछ नहीं हैं। क्‍योंकि यहां लिखने वाले लोग साहित्‍यकार नहीं हैं। अधिकांश लोगों को तो हिन्‍दी भी सही लिखनी नहीं आती। लेकिन इससे ब्‍लॉग का महत्‍व कम नहीं हो जाता। दुनिया में ऐसे कई प्रकरण हुए हैं जहां देशों की सरकारों के दमनचक्र को ब्‍लॉग के माध्‍यम से पूरी दुनिया ने जाना। यही कारण है कि तानाशाह देशों की सरकारें ब्‍लॉग से डरती हैं और इस पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही हैं। बेगाणीजी ने इसे आम आदमी की आवाज की ताकत बताते हुए कहा कि चाहे कुछ भी लिखिए लेकिन लिखिए जरूर। अन्‍य किसी माध्‍यम से लिखेंगे तो उस प्रकाशित रचना का जीवनकाल अधिक से अधिक एक दिन या एक महीना होगा लेकिन इंटरनेट पर आप जो कुछ लिखेंगे वह शाश्‍वत होगा। इससे आप अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी कुछ छोड़ जाएंगे। अब कौन क्‍या लिखे के बिंदू पर उन्‍होंने कहा कि जो अपने विषय के विशेषज्ञ हैं वे अपने विषय के बारे में लिखें वरना यह भी लिख सकते हैं कि आज दिन कैसा रहा। आज कैसे लोग मिले। उन्‍होंने एक चायवाले का उदाहरण देते हुए बताया कि एक चायवाला भी ब्‍लॉग लिख सकता है। उसमें वह लिखेगा कि आज तो ऐसे ऐसे अजीब लोग मिले।

कुछ सीखने की बातें

यहां तक पहुंचने के बाद लोगों में उत्‍सुकता थी कि ब्‍लॉग कैसे बनता है और हम कैसे इस जमात में शामिल हो सकते हैं। इस पर कुछ लोगों का मत था कि मैं खुद उन लोगों के पास जाउं और उनके ब्‍लॉग बनाकर लिखने की विधि समझा दूं लेकिन बाद में उपस्थित लोगों के आग्रह पर गोष्‍ठी को औपचारिक की बजाय अनौपचारिक बना दिया गया। तस्‍वीरों में जो सिटिंग दिखाई गई है उसे क्रम को तोड़कर सभी आगे आकर एकत्रित हो गए और बेगाणीजी भी मंच से नीचे उतर आए। यहां उन्‍होंने अपने लेपटॉप पर अपने मोबाइल से चल रहे इंटरनेट से लोगों को ब्‍लॉगर डॉट कॉम के दर्शन कराए और ब्‍लॉग बनाने के तीन आसान चरणों की जानकारी दी। इसके बाद उन्‍होंने ऑन लाइन हिन्‍दी टूल और वर्तनी शुद्धि वाले सॉफ्टवेयर्स की जानकारी भी दी।

एक बार भी ताली नहीं बजी

संजय जी के भाषण के दौरान एक बार भी ताली नहीं बजी। पूरे सदन में केवल मैं ही था जो उपस्थित श्रोताओं को बेगाणीजी को पर्सनली जानता था। इसलिए मैं देख सकता था कि हिन्‍दी और हिन्‍दुस्‍तान के वर्चस्‍व के संबंध, अंतरराष्‍ट्रीय मामलों पर बेगाणीजी के बोलने के साथ ही प्रमुख श्रोता अपनी तलवारें निकाल चुके थे। वे यह सुनने को तैयार ही नहीं थे कि चीन हमसे आगे है। डॉ. व्‍यास ने अपने शोध से चीन को धूल चटाई थी, कौड़ाजी जानते थे कि चीन हमसे किन मामलों में पिछड़ रहा है, पुखराज जी भारत की मजबूत अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में सोच रहे थे और हर्षजी विश्‍वनाथन आनन्‍द और अन्‍य भारतीय शतरंज मास्‍टरों के बारे में सोचने लगे थे। यानि भाषण की शुरूआत ही कुछ ऐसी थी कि बेगाणीजी ने श्रोताओं को एक्टिवेट कर दिया था। इसलिए बाकी के भाषण के दौरान श्रोता उनके शुरूआती कथन के विश्‍लेषण में ही उलझे रहे। इसलिए एक बार भी तालियां नहीं बजी।

चाय और कचौरियां

कार्यक्रम करीब आधे घण्‍टे देरी से शुरू हुआ। भाषण के पहले भाग के अंत तक डॉ. कटारिया के आज्ञाकारी शिष्‍य चाय और गर्मागरम कचौरिया लेकर पहुंच चुके थे। हॉल के पीछे से खुशबू आनी शुरू हो गई। मैं सुबह से बिना नाश्‍ता किए निकला हुआ था। दोपहर एक बजे तक तो पेट जवाब दे गया। मैंने गुजारिश की कि चलिए चाय पी लेते हैं। बाकी लोगों के पीछे पहुंचने से पहले मैं दो कचौरिया निगल चुका था। चाय के ब्रेक के दौरान ब्‍लॉग, इसकी ताकत, बनाने के तरीके और चीन के वर्चस्‍व को लेकर लगातार होती रहीं। मेरा ध्‍यान पूरी तरह से कचौरियों की तरफ था।

श्रोताओं के विचार

जैसा कि मैंने पहले से सोच रखा था, मैंने कुछ श्रोताओं को बोलने के लिए आमं‍त्रित किया। सबसे पहले आए डॉ. व्‍यास उन्‍होंने अपने डीआरडीओ के अनुभव के आधार पर बताया कि केवल हिंदी की बात करने से अन्‍य भाषाओं वाले लोग चिढ़ सकते हैं। उत्‍तर भारत में तो ठीक है लेकिन दक्षिण भारतियों के समक्ष तो हिन्‍दी तो प्रमुखता की बजाय कनेक्टिंग लैंग्‍वेज के रूप में परोसना ही उचित रहेगा। इससे हिन्‍दी का भी विकास होगा और दूसरी भाषाओं को भी उचित सम्‍मान मिलेगा। शंकरलाल हर्ष ब्‍लॉग में लिखे गए किसी भी अंट शंट के लिटिगेशन के बारे में पूछना चाह रहे थे। उनका सवाल था कि इसके लिए जुरिस्डिक्‍शन जोन कौनसा होगा। मैं बीकानेर से कुछ लिखता हूं और एक आदमी आपत्ति करके मुझे बैंगलोर की अदालत में हाजिर करवा लेगा तो ब्‍लॉगिंग तो पीछे रह जाएगी, नौकरी धंधे का भी संकट हो जाएगा। हालांकि उनका सवाल अनुत्‍तरित रहा लेकिन संगोष्‍ठी जारी रही। चाय के दौरान डॉ. व्‍यास ने रजनीश परिहार जी से पूछा था कि आप क्‍या लिखते हैं ब्‍लॉग में... मैंने दोबारा यही सवाल उठाते हुए उन्‍हें बोलने के लिए आमंत्रित किया। परिहारजी ने बताया कि वे जो कुछ रोजाना की जिंदगी में देखते हैं। उसे ही लिखते हैं। पिछले दिनों उन्‍होंने अंधी मां के दो बच्‍चों की कहानी लिखी थी, जिस पर देशभर में पढ़ा गया और कई लोगों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाए। इस पर तालियां बजी

अगली संगोष्‍ठी का प्रपोजल

बीकानेर में अगली संगोष्‍ठी के लिए मुझे दो प्रपोजल मिले हैं। एक तो यहां के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सेमिनार हॉल का और दूसरा बीकानेर के उपनगर गंगाशहर स्थित तेरापंथ भवन का। पुखराज जी ने तो दो लाख रुपए तक के खर्च की सीमा भी पेश की है। अगर सबकुछ सही रहा तो छह महीने बाद ही अलगी संगोष्‍ठी आयोजित करने का प्रयास करूंगा। जिसमें देश के अन्‍य क्षेत्रों से प्रमुख ब्‍लॉगरों को बुलाने की कोशिश रहेगी। और प्रमुख वक्‍ताओं में संजय बेगाणीजी तो होंगे ही...

संगोष्‍ठी के दौरान मैं अपना कैमरा लेकर पहुंचा नहीं, सो मीडिया द्वारा लिए गए फोटो से ही काम चलाना होगा। ये वही फोटो हैं जो संयजजी ने अपने ब्‍लॉग जोगलिखी पर लगाए हैं...

sanjay begani1

dungar college auditorium1 

dungar college auditorium2

शनिवार, 28 नवंबर 2009

बीकानेर में हुई ब्‍लॉग कार्यशाला वक्‍ता संजय बेगाणी

अहमदाबाद से बीकानेर आए संजय बेगाणी को मुख्‍य वक्‍ता के रूप में रखकर एक ब्‍लॉग गोष्‍ठी का आयोजन शनिवार को किया गया। इसमें डिफेंस रिसर्च डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक डॉ. एच.पी. व्‍यास, एशियन चैस एसोसिएशन के पूर्व उपाध्‍यक्ष एस.एल. हर्ष और एनसीडीईएक्‍स और एमसीएक्‍स की एडवाइजरी कमेटी के सदस्‍य पुखराज चोपड़ा सहित कई गणमान्‍य लोग मौजूद थे। इस गोष्‍ठी की झलकियां और फोटो के साथ कल सुबह एक पोस्‍ट चस्‍पा करूंगा। क्‍योंकि संजयजी के साथ संवाद के उत्‍साह में फोटो खुद ने लिए नहीं और मीडिया में गए फोटो आज मिले नहीं। सो कल मिलेंगे फोटो और कल ही पेश करूंगा
इस गोष्‍ठी में ब्‍लॉगिंग का इतिहास, वर्तमान और भविष्‍य के बारे में तो चर्चा की ही गई, साथ ही स्‍थानीय ब्‍लॉगरों जैसे रजनीश पडि़हार, पुखराज चोपड़ा और डॉ. प्रताप कटारिया के विचारों से भी अवगत हुए।

फोटो मिल जाएंगे तो रविवार को पोस्‍ट पूरी बनाकर पेश करूंगा। तब तक तो इंतजार करना ही पड़ेगा। संगोष्‍ठी शुरू हुई तो मुझे लानतें मिल रही थी और खत्‍म होने तक शाबाशियां। साथ ही अगली गोष्‍ठी के लिए प्रपोजल भी...

क्‍या कैसे कब और क्‍यों हुआ जानिए अगले अंक में...

सोमवार, 23 नवंबर 2009

मानसिक स्‍तरों में विचरण

शुरू से मैं यह जानता नहीं था या कह दूं कि मानता नहीं था कि मानसिक स्‍तरों में उतार चढ़ाव होता है और कई बार यह खतरनाक भी हो सकता है। बहुत छोटा था तब मुझे कॉमिक्‍स पढ़ते देख मेरे पड़नानाजी स्‍वर्गीय डॉ. माधोदासजी व्‍यास मुझे टोका करते थे। वे कहते कि एक बार हल्‍के साहित्‍य में उतर गए तो कभी गंभीर साहित्‍य पढ़ नहीं पाओगे। मुझे कॉमिक्‍स अच्‍छी लगती थी। सो उनकी बात थोड़ी कम पचती थी। यह स्‍वाभाविक भी था। पर इसे मैंने एक चैलेंज की तरह लिया और उन्‍हीं दिनों नागराज और सुपर कमाण्‍डो ध्रुव के साथ प्रेमचंद को भी पढ़ा। सच कहूं रोलर कोस्‍टर राइड थी। एक तरफ आभासी दुनिया थी और दूसरी तरफ जमीनी सच्‍चाई। नागराज अपने हाथों से निकले सापों से परदे खड़े कर रहा था और प्रेमचंद का परदा बिल्‍कुल गल गया था, जिसके पीछे अधनंगी सच्‍चाई खड़ी थी। शायद इन्‍हीं दिनों में मेरा एक ही समय में अलग अलग मानसिक स्‍तरों में विचरण का क्रम शुरू हो गया था।

लाइक डिजाल्‍व लाइक की तर्ज पर मुझे मिला आशीष। वह जीनियस होने का भ्रम पाले जबरदस्‍ती मानसिक स्‍तरों का विचरण कर रहा था। भले ही मेरी स्थिति भी जबरदस्‍ती वाली ही थी लेकिन मेरे पास इसके लिए सुविधाएं और साधन मुहैया थे। सबकुछ घर पर ही और आशीष इनके लिए भटक रहा था। हम दोस्‍त थे, बाद में इस विचरण के साथी भी बन गए। हमारे कई तरह के प्रयासों के बावजूद निजता बरकरार रही। बाद में एक दिन आशीष ने इक्‍कीसिया गणेश मंदिर के पास बने खेल मैदान की हमारी बैठक में कहा कि ये मानसिक स्‍तरों का विचरण खतरनाक हो सकता है। मैं बेफिक्र था। मैंने ध्‍यान ही नहीं दिया।

इसी दौर में मैं मानसिक रोगों के बारे में पढ़ना शुरू कर चुका था। मेडिकल स्‍टूडेंट समझ सकते हैं कि मैं क्‍या कहना चाहता हूं, कि रोगों को पढ़ने के साथ मैंने उनमें से कई रोगों को महसूस करने की कोशिश शुरू कर दी। या कहें वे खुद को महसूस कराने लगे। वास्‍तव में यह स्थिति बहुत खतरनाक होती है। मेरा सबसे पसंदीदा विषय स्‍कीजोफ्रीनिया है। जब मैंने उसे पढ़ना शुरू किया तो रोग को समझना ही टेढ़ी खीर लगा। जैकाल हाइड वाली कहानी से मिलता जुलता यह रोग है। यानि भेड़ की खाल में छिपा भेडि़या। ये रोगी वैसे नहीं होते कि अच्‍छी सामाजिक छवि हो और नौकरानी का बलात्‍कार करे। बल्कि ये रोगी सामान्‍य दिखने वाले ऐसे लोग होते हैं जो लगातार मर रहे होते हैं। अब मरना क्‍या है इसे समझना भी बहुत मुश्किल है। सही कहूं तो असंभव है। लेकिन मरने के करीब होने की कल्‍पना करना उससे कुछ आसान है। यहां मैं कह रहा हूं कि कुछ आसान है यानि असंभव से कुछ आसान। ठीक है उस स्थिति को महसूस करने के बाद अगली स्‍टेज नहीं आ सकती क्‍योंकि वह लगातार चलने वाला प्रोसेस है। ऐसे में आप नीयर डेढ एक्‍पीरियंस की कल्‍पना तो कर सकते हैं लेकिन उसके प्रभावों की नहीं। उसके प्रभाव तक एक बार पहुंच भी गए तो उससे अगली स्‍टेज मिलना तो असंभव है, बिना रोग हुए। फिर भी मैंने लम्‍बे काल के लिए उस स्थिति को बनाए रखने की कोशिश की तो कुछ ऐसे अनुभव होने शुरू हुए जिसमें शक होने लगता है। यहां मैं एक बार सावधान हुआ और खुद को दूसरे कामों में मोड़कर बाहर आ गया। लेकिन इस प्रयास ने मुझे समझने का सूत्र थमा दिया। अब मैं इस रोगी को समझ सकता था। इस दौर के बाद मुझे दो बार शक हुआ कि कहीं मैं भी इसका रोगी तो नहीं हूं। सो यहां थोड़े अंतराल में दो अलग अलग मानसिक रोग विशेषज्ञों को दिखाकर आया। दोनों में मुझे क्‍लीन चिट दी। बाद वाले ने मुझे पंद्रह दिन की एंटी डिप्रेसेंट लिख दी। वो मैंने नहीं ली और घर आकर प्राणायाम में जुट गया। कुछ दिन में वह अवस्‍था खत्‍म हो गई तो मैंने दोबार मुड़कर देखा। अब मैं मुस्‍कुरा सकता था।

यह सब मुझे याद आया समय की टिप्‍पणी से। वे छद्म और अंध विश्‍वास में अंतर नहीं कर पाए। यह एक प्रकार के माइंड सेटअप की समस्‍या है। वे खुद को‍ क्लिष्‍ट शब्‍दों और तार्किक ज्ञानयोग में झोंक रहे हैं। ऐसे में जब अंधविश्‍वास की बात आती है तो वे उसे आमतौर पर बताया जाने वाला ईश्‍वरीय विश्‍वास मान रहे हैं। यही छद्म विश्‍वास भी है। उनकी उलझाहट में मानसिक स्‍तर में विचरण नहीं कर पाने की विवशता दिखाई देती है। उनके ब्‍लॉग पर जाकर मैंने दो बार आगाह भी किया लेकिन वे अपने इस विश्‍वास के साथ बने हुए हैं कि दर्शन ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन मैं अब भी उन्‍हें यही सलाह देना चाहता हूं कि वे शब्‍दों की क्लिष्‍टता और ज्ञान की तार्किकता के परे आकर आम बोलचाल की भाषा में दर्शन की बात करें। यह लोगों की समझ में भी जल्‍दी आएगा और वे खुद भी स्‍वाभाविक मानसिक अवस्‍था में रह पाएंगे। वैसे उनका ब्‍लॉग है और उनका दिमाग... वे जैसा उचित समझे करें।

उनके लिए स्‍पष्‍ट कर रहा हूं कि एक सामान्‍य अंधविश्‍वासी बिना जाने यकीन करता है कि ईश्‍वर है और बताए गए रूप में है। जबकि एक छद्म विश्‍वासी उस ईश्‍वर को अपने अंदाज में देखता है भोगता है और उसका दिमाग उसे जस्टिफाई भी करता है। यानि अंध से अधिक पक्‍का छद्म विश्‍वास होता है। यही बात मैं स्‍पष्‍ट करने की कोशिश कर रहा था।

अगली पोस्‍ट ब्‍लॉगिंग में संप्रेषणीय आग्रहता पर होगी... यह एक रोचक बहस का हिस्‍सा थी और अब इसे रोजाना देख रहा हूं....

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

छद्म और अंध विश्‍वास में अंतर है

लवली कुमारी जी के ब्‍लॉग संचिका पर मैं अंधविश्‍वास के बारे में हैडिंग देखकर पढ़ने चला गया। विज्ञान की छात्रा लवली कुमारीजी की मेधा पर बहुत कम लोगों को शक होगा लेकिन इस बार उन्‍होंने ऐसा टॉपिक छेड़ा कि मैं न चाहते हुए भी उसमें कूद पड़ा। वहां चर्चा का सिलसिला अप्रिय तरीके से मैंने ही शुरू किया और अब उसे और बढ़ाना नहीं चाहता। लेकिन एक बात मन में है कि स्किजोफ्रीनिया के बारे में आम लोगों को आम भाषा में जानकारी क्‍यों न दी जाए। बस यह पोस्‍ट लिखने बैठ गया हूं। बात शुरू हुई अंधविश्‍वासियों से...

मानसिक अवस्‍था

स्किजोफ्रीनिया के रोगी अंधविश्‍वासी होते हैं वे न केवल ईश्‍वर को देखते हैं बल्कि उनसे वार्तालाप भी करते हैं और कई बार उनके आदेशों को मानकर बलि देने जैसे कामों को भी अंजाम दे देते हैं। भारत में एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी ने एक रात में लोहे की रॉड से सड़क के किनारे सो रहे इकतालीस लोगों की हत्‍या की और शांति से अपने घर में जाकर बैठ गया। पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय में उस रोगी के चेहरे पर असीम शांति थी। क्‍योंकि यह सब उसने सूर्य भगवान के निर्देश पर किया था। सूर्य भगवान रोज उससे बातें किया करते थे। यह रोगी दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में है। पिछली जानकारी तक तो.. आज का पता नहीं।

खैर यहां डराने की नहीं बल्कि हकीकत तक पहुंचने की बात है। करीब दस साल पहले मैंने एक अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त साइकोलॉजिस्‍ट (अब उनका निधन हो चुका है) से इस बारे में पूछा था। तब उन्‍होंने जो समझाया आज तक समझने के स्‍तर पर उससे बेहतर और कोई जवाब मिला नहीं है। इस बारे में मैंने न्‍यूरोलॉजिस्‍ट से लेकर साइक्रेटिस्‍ट और अन्‍य साइकोलॉजिस्‍ट से भी बातें की लेकिन किसी के दिमाग में इसकी स्‍पष्‍ट तस्‍वीर नहीं है।

लक्षण: स्‍पष्‍ट तौर पर सिर्फ एक संदेह। हर किसी पर, हर परिस्थिति पर और हर कोण से। बाकी बातें बाद में आती हैं।

कैसे होता है: इसे साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कह सकते हैं। यानि शारीरिक क्षति का भुगतान मानसिक अवस्‍था करती है।

आम बोलचाल में: इसे समझिए कि दिमाग के दो हिस्‍से हैं। दांया और बायां। इन दोनों हिस्‍सों में या कह दें कि दिमाग में ऑक्‍सीजन पहुंचाने के लिए लाल रक्‍त कणिकाओं का इस्‍तेमाल नहीं होता। इसके लिए अलग से ऑक्‍सीजन कैरियर्स होते हैं। ये कैरियर दिमाग के पिछले हिस्‍से में जाकर ऑक्‍सीजन को आरबीसी से ले लेते हैं और फिर दिमाग के अलग-अलग हिस्‍सों में चलते जाते हैं। वहां ऑक्‍सीजन की सप्‍लाई हो जाती है। दिमाग के हर हिस्‍से के लिए कैरियर पहले से तय हैं। इनमें बदलाव नहीं होता।

अब चाहे किसी बाहरी चोट से, किसी मेंटल डिसऑर्डर से या वंशानुगत कारणों से ये ऑक्‍सीजन के वाहक बनना बंद हो जाते हैं। अब दिमाग का एक हिस्‍सा बिना ऑक्‍सीजन की अवस्‍था में आ जाता है। तो उस हिस्‍से के न्‍यूरॉन मरने के संदेश भेजने लगते हैं। इसे नीयर डेथ एक्‍सपीरियंसेज कहते हैं। मौत को बहुत करीब से देखने वाले बहुत से लोगों को चमक, भगवान और कई तरह की चीजें दिखाई देने लगती हैं। दायां मस्तिष्‍क इस कल्‍पना को जन्‍म देता है और बायां भाग उसे जस्टिफाई करता है। अब स्‍कीजोफ्रीनिया में अंतर यह होता है कि दिन के चौबीस घण्‍टे, सातों दिन और सालों तक यह प्रक्रिया चलती है। ऐसे में रोगी संदेह करने लगता है। हर तथ्‍य पर जो सामने आता है। इसी अवस्‍था में ईश्‍वर उसे एकमात्र सहायक के रूप में नजर आने लगते हैं और वह छद्म विश्‍वास बना लेता है कि ईश्‍वर उससे बात कर रहे हैं या ईश्‍वर उसके कांटेक्‍ट में है।

इन लोगों के केवल ईश्‍वर ही नहीं बल्कि अन्‍य ऐसी कई चीजों के प्रति छद्म विश्‍वास होता है जो आमतौर पर होती ही नहीं हैं। जैसे एक रोगी को लगता था कि उसके सामने रखे शीशे में दो ड्रेगन हैं, एक अन्‍य रोगी को दूसरों द्वारा की जा रही साजिश दीवार पर चित्रों के रूप में दिखाई देती है। एक अन्‍य दूसरों पर अनैतिक लांछन लगता है।

प्रभाव: इस सबका असर यह होता है कि रोगी के परिवार के लोग ही एक-दूसरे को गलत समझने लगते हैं और रोगी के रोग की वजह बताने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि रोगी और भी अकेला पड़ जाता है। वह खुद यह डिसाइड नहीं कर पाता है कि कौन उसके पक्ष में है और कौन विरोध में।

ईलाज: सालों पहले तक इस रोग के बारे में चिकित्‍सकों की स्‍पष्‍ट राय नहीं होने के कारण पहले रोगी को संदमित करने की दवाएं दी जाती रहीं बाद में इलेक्ट्रिक शॉक की सहायता भी लगी गई लेकिन ये रोगी अनपेक्षित रूप से कभी भी ठीक हो जाते हैं और कभी भी गड़बड़। अब साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कब होगा और कब नहीं कोई नहीं कह सकता। ऐसे में रोगी का व्‍यवहार की उसके ईलाज में आड़े आता है। यानि कभी पूर्ण संयत होता तो भी पूर्ण मैनिक होना।

दवाएं: पिछले कुछ समय में कम संदमन करने वाली और ऑक्‍सीजन कैरियर की कमी की पूर्ति करने वाली दवाएं बाजार में आई हैं। इससे रोगियों को बहुत हद तक आराम भी मिला है।

अब मैं कह सकता हूं कि अंध विश्‍वास और छद्म विश्‍वास में अंतर है। उम्‍मीद है आप भी समझे होंगे....

अंत में: अगर आपको एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी की सुपरफीशियल तस्‍वीर देखनी हो तो आप ए ब्‍यूटीफुल माइंड फिल्‍म देखिए। गेम थ्‍योरी विषय में नोबेल पुरस्‍कार प्राप्‍त कर चुके जॉन नैश ने इस रोग को पूरे जीवन भोगा है और अब उनका पुत्र भी इसी बीमारी से ग्रस्‍त है।

जिस प्‍वाइंट को लेकर मेरे दिमाग में यह हलचल शुरू हुई वह लवली कुमारीजी की पोस्‍ट अन्धविश्वाशी लोगों में पाया जाने वाला सामान्य रोग - स्किजोफ्रेनिया थी।