शनिवार, 9 अप्रैल 2011

इरोम शर्मिला की भूख के मायने

जनरल स्‍मट जो नया कानून लागू कर रहे हैं उससे हमारे परिवारों की महिलाएं वेश्‍याएं और हम सभी नाजायज औलादें घोषित कर दिए जाएंगे। मैं इसका विरोध करता हूं। जान देने के लिए तैयार हूं, लेने के लिए नहीं। मेरे इस तरह के विरोध का शायद उपनिवेशी ताकत पर असर हो। वे मुझे बन्‍दी बना सकते हैं, मेरी हड्डियां तोड़ सकते हैं और हो सकता है मेरा मृत शरीर ले लें, लेकिन मेरी आज्ञाकारिता नहीं ले सकते।

गांधी फिल्‍म में दक्षिण अफ्रीका के उस हॉल का नजारा आज भी मुझे आंदोलित कर देता है। बैरिस्‍टर गांधी ने इसी हॉल से सॉफ्ट प्रोटेस्‍ट को सत्‍याग्रह का शक्तिशाली हथियार बना दिया था। आज साठ साल बाद उसी हथियार को सरकार ने आत्‍महत्‍या का प्रयास जैसा नाम देकर उसका भद्दा मजाक बना दिया है।

सत्‍य का आग्रह जब गांधीजी ने किया...

लोकपाल बिल की लड़ाई में आज भारत का आम आदमी खास बना है, तब एक बार फिर उसे इरोम शर्मिला की याद दिलाने का सही वक्‍त है। हिन्‍दुस्‍तान का तहरीर चौक बने जन्‍तर मन्‍तर में अन्‍ना हजारे की भूख ने सरकार की गहरी अंतडि़यों से भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने के लिए जरूरी राजपत्र निकलवा लिया। पर, पूर्वोत्‍तर के लिए स्‍मट कानून बने सेना के विशेष अधिकार कानून हटाने की मांग लिए इरोम शर्मिला की भूख अब भी अपने ही देश के शीर्ष नेतृत्‍व और आम जनता की नजरे इनायत का इंतजार कर रही है।

मणिपुर में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पावर्स एक्‍ट 1958 का उपयोग...

अपने शरीर को अपना हथियार बना चुकी इरोम शर्मिला ने वर्ष 2000 में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशनल पावर एक्‍ट 1958 का विरोध तब करना शुरू किया जब सेना ने उनके गांव में घुसकर निर्दोष लोगों की हत्‍या कर दी। तब से अब तक शर्मिला की भूख हड़ताल को आत्‍महत्‍या का प्रयास बताकर गांधी के सत्‍याग्रह का खुला मजाक बना दिया है। पूर्वोत्‍तर में पृथ्‍‍थकवादी ताकतों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए कई क्षेत्र सेना के हवाले कर दिए गए थे। इसके बाद हर खास और आम व्‍यक्ति सेना की कार्रवाई का शिकार हुआ। मणिपुर में आसाम राइफल के जवानों ने दस लोगों की गोली मारकर हत्‍या कर दी। इसके खिलाफ शर्मिला उठ खड़ी हुई। ग्‍यारह साल होने को आए हैं। शर्मिला और उसका सत्‍याग्रह चल रहा है। शर्मिला की भूख कहीं उसकी जान न ले ले, इसके लिए पुलिस और प्रशासन उसे लगातार गिरफ्तार रखता है और नली की सहायता से उसे खाना पहुंचाया जा रहा है।

मीडिया ने कई बार शर्मिला की आवाज को उठाया, लेकिन रम्‍स अदायगी से ज्‍यादा कुछ नहीं हो पाया। आज अन्‍ना की सफलता के बाद एक बार फिर दिल्‍ली के कान बजाने का समय है। समय रहते पुरजोर आवाज उठी तो शायद शर्मिला का अनशन भी खत्‍म हो जाए...

आइए... भारतवर्ष के एक हिस्‍से में आम आदमी की मांग को लेकर ग्‍यारह सालों से सत्‍य का आग्रह कर रही शर्मिला के लिए अपने हिस्‍से की चेतना का कुछ अंश अर्पित करें...

कैसे भी...

यह भी देखिएगा

फिल्‍ममेकर कविता जोशी का मार्च 2006 को लिखा गया लेख

बीबीसी पर इरोम की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी 

मंगलवार, 29 मार्च 2011

पगे लागूं महाराज

बचपन में मैं महाराजों को बहुत देखता था। इन सालों में महाराजों की संख्‍या कुछ कम हो गई है। कुछ परिभाषा में भी आंशिक बदलाव आ गया तो महाराज की इतनी गरिमा भी नहीं रही। जब उन महाराजों को देखता था तो सोचता था कि एक दिन मैं भी महाराज बनूंगा। मैंने किसी समझदार से पूछ भी लिया कि महाराज कैसे बनते हैं। समझदार मेरी उम्‍मीद से ज्‍यादा समझदार था, उसने बताया जो अपना घर फूंककर तमाशा बनते हैं वे महाराज बन जाते हैं। उनसे वही लोग बराबरी कर सकते हैं जो अपना खुद का घर फूंकना जानते हो या फूंक चुके हों। यह परिभाषा सुनकर पांव के नीचे से जमीन सरक गई। खैर बाद में मैंने एक महाराज को करीब से भी देखा... आज उनकी याद आ गई...

हालांकि मैं उनका वास्‍तविक नाम भी बता सकता हूं लेकिन नाम से अधिक उनकी कहानी में दम है सो सुनिए...

महाराज के पिता नायब तहसीलदार थे। करीब चालीस साल पहले यह बहुत शानदार पोस्‍ट हुआ करती थी। पटवारी से शुरू हुए थे और दसवीं पास होने के कारण तेजी से तरक्‍की करते हुए तहसीलदार के पद पर पहुंच गए थे। अपने रुआब से अच्‍छी खासी जमीनें, गहने और जायदाद जमा कर लिए थे। महाराज को इन सबकी जानकारी थी। सो कभी पढ़ने में मन नहीं लगाया। ऐसा नहीं था कि पढ़ने जितना दिमाग न हो, लेकिन शुरू से ही पढ़ाई को डिस्‍कार्ड ही कर दिया। खेलने का शौक था। फुटबॉल खेलने के लिए जाते थे, सो एक दिन बात की बात में टीम से अलग हो गए और अपनी अलग फुटबॉल टीम बना ली। कोच से लेकर अर्दली तक रिक्रुट कर लिए। जितनी टीम उतना ही स्‍टाफ। खैर टीम में भी ऊंची कीमतों पर एक से बढ़कर एक खिलाडि़यों को शामिल किया। कुछ महीने तक बीकानेर में ही प्रेक्टिस की और चले विश्‍वविजय को। बीकानेर से सीधे कलकत्‍ता गए। मैत्री मैच हुआ और मोहनबागान को टिका दिया। जमकर वाह वाह हुई। महाराज पक्‍के महाराज बन गए। घर फुंक रहा था, लेकिन महाराज के पिता खुश थे, कि बेटा नाम कमा रहा है। धीरे धीरे खेल से अलग हुए तो घोड़ों का शौक पाल लिया। टीम में शामिल खिलाडि़यों के खाने के लाले पड़े तो खिलाडि़यों ने छोटे मोटे धंधे करना शुरू कर दिया और दिन रात महाराज के गुण गाते। इधर महाराज का घोड़ों का शौक बढ़ता जा रहा था। तेल का पीपा घोड़े के मुंह के आगे ही खोल कर रखा जाता। जब तेल खत्‍म हो जाता और घोड़ा मुंह मारता रहता तो तेल के खुले पीपे में घी उंडेल दिया जाता। महाराज के घोड़े शहर की शान बन गए।

इसी दौरान समयचक्र ने पलटा खाया। महाराज की किसी बात पर पिता से लड़ाई हो गई। अपनी आन पर जिंदा रहने वाले महाराज ने पिता से पैसा लेना बन्‍द कर दिया। परिवार में बीबी बच्‍चों थे, सो उनको लेकर अलग हो गए। महाराज के पिता कमरे बन्‍द कर कर के खूब रोए लेकिन महाराज को नहीं मना पाए। सोने और चांदी का चम्‍मच मुंह में लेकर पैदा हुए महाराज के बच्‍चों के सामने दोनों समय के खाने का जुगाड़ मुश्किल हो रहा था। महाराज ने अपने किसी यारबाज से पैसा लेकर जीप खरीद ली। महाराज मेहनती तो थे ही जीप का काम भी अच्‍छा चल पड़ा। एक बार सड़क पर लाश पड़ी देखी तो उसे जीप में डालकर ले आए। खबर आग की तरफ फैली तो लोगों ने मांगलिक कार्यों के लिए जीप में किराए पर लेना बन्‍द कर दिया। महाराज कहां हार मानने वाले थे, उन्‍होंने लाशें ढोने के काम में ही खुद को खपा दिया। इसी दौरान पता चला कि महाराज के बड़े बेटे ने अपने दादा से सांठ-गांठ कर सारी संपत्ति अपने नाम करा ली है। महाराज ने आव देखा न ताव, अपने पिता के घर से बाहर चल पड़े। अपना अलग घर बना लिया। छोटा बेटा महाराज के ही नक्‍शे कदम पर चल रहा था, सो संगीत का शौक पाल बैठा। हालांकि कहीं से तालीम नहीं ली, लेकिन दिन महीने और साल तबले, हारमोनियम, सितार और मंजीरे बजाते हुए ही निकल रहे थे। ऐसे में गृहस्‍थी का सारा बोझ महाराज के कंधों पर ही रहा। एक दिन महाराज टूट गए। बीमार होकर बिस्‍तर पर पड़े तो वापस उठ नहीं पाए। सालों की मेहनत से बनाई आन और गृहस्‍थी टुकड़ा टुकड़ा कर टूटती नजर आ रही थी। तीन साल तक बिस्‍तर में रहे। बीबी ने खूब सेवा की। आखिर यमराज ने महाराज को उठा लिया। जब महाराज अंतिम सांसें गिन रहे थे तो एक लकड़ी के पाटे पर निश्‍तेज पड़े थे और आंखें पथरा रही थी। करोड़ों रुपए की संपत्ति पर बड़ा पुत्र काबिज था और छोटा बेटा संगीत की धुनों में खोया हुआ था...

महाराज तो फिर भी महाराज ही रहे। जिसे भी पता चला कि महाराज का निधन हो गया है, अपना काम छोड़ सीधा उनके घर की ओर भागता हुआ आया। जिन लोगों को पैसा दिया वे लौटे नहीं और जिन्‍हें प्‍यार लुटाया वे सम्‍मान लुटाने आ पहंचे। मैं भी कई बार उनके प्‍यार की बारिश में नहाया था। सो मैं भी उनकी अंतिम यात्रा में साथ था। कंधा देने के बाद मैं शवयात्रा में पीछे लौटा तो लोग आपस में बात कर रहे थे...

महाराज तो महाराज थे, उनकी तरह अपना सबकुछ फूंककर कौन दूसरों पर प्‍यार लुटा सकता है...

नहीं कोई नहीं लुटा सकता...

शनिवार, 15 जनवरी 2011

जाकिर भाई से मौज

मेरा ब्‍लॉगिंग के जरिए जाकिर जी से पुराना रिश्‍ता है। वे ज्‍योतिष की पूछ फाड़ने में लगे रहते हैं और मैं साइंस की पूछ पकड़ने की कोशिश करता रहता हूं। किसी जमाने में फ्रीडम फाइटर हुआ करते थे, फिर सर्विस फाइटर और पीएमटी और पीईटी फाइटर हुए। आजकर ब्‍लॉगर फाइटर होते हैं। ऐसे ही मैं और जाकिर अली रजनीश जी ब्‍लॉगर फाइटर हैं। और आप पाठकगण तो हम दोनों की मौज तो लेते ही रहते हैं। खैर मैं पहले क्‍लीयर कर देना चाहता हूं कि मैं जाकिर अली रजनीश जी से मौज ले रहा हूं। वे बुरा न मानें...


उन्‍होंने कुछ माह पहले मुझे जन्‍मदिन की शुभकामनाएं दी। निश्‍चय ही हृदय से दी... मैं उनका शुक्रगुजार हूं, लेकिन चार दिन से बिस्‍तर पकड़े पकड़े आखिर मैंने उन शुभकामनाओं को दोबारा देख लिया तो तगड़ा झटका लगा... आप भी देखिए...
आपकी दुआएं भी सांप के काटने जैसी लगेंगी तो सांप से कटवाकर ही खुश हो जाएंगे, कुछ भी नहीं करेंगे :)

शक्ति के नियम और पतंगबाजी...

हर बार मकर संक्रांति पर जयपुर वाले जमकर पतंगें उड़ातें हैं और बीकानेर वाले आखातीज को याद करते हैं। आपको क्‍या लगता है, इस बार कुछ नया हुआ होगा, नहीं बिल्‍कुल नहीं। इस बार भी वही हुआ।
लेकिन मैंने कुछ अलग करने की ठानी है।
पतंगबाजी के बीच से कुछ छानकर
निकालने को छननी तानी है।
गौर किया तो पता लगा कि पतंगबाजी में शक्ति के कुछ नियम छिपे हैं। सर्दी से जकड़कर तीन दिन से घर में पड़ा हूं, सो शक्ति के नियमों और पतंगबाजी का घालमेल ही क्‍यों न तैयार कर लिया जाए। तो पेश है कुछ नियम...


पहला नियम
कभी हवा के खिलाफ जाकर पेंच मत लड़ाओ... हमेशा आपकी ही पतंग कटेगी, हां आपमें अगर माद्दा है कि आप लपाते (खींचते) रह सकते हैं आखिरी हाथ तक तो ही आप विरोधी की पतंग काट पाएंगे। वरना हवा के रुख के खिलाफ जाते ही आपकी पतंग ढीली पड़ जाएगी।

दूसरा नियम
फटी हुई पतंग से अपनी पतंग दूर रखो... इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे कोई बिजनेस डूब रहा हो और आप उसे लेकर ट्रेड में कूद पड़ें। आपका पैसा डूबना तय है। नैतिकता और आत्‍मविश्‍वास जैसे पहलुओं से भी इसे जोड़ा जा सकता है।

तीसरा नियम
अपने पीछे वाले से लम्‍बे पेंच मत लो... पीछे वाले पतंगबाज की पतंग हमेशा आपकी पतंग से भारी रहेगी। ऐसे में या तो पेंच करने से बचो या एक बार में ही पतंग काट दो, लम्‍बे पेंच लिए तो आपकी पतंग कटनी तय है।

चौथा नियम
पासे वाली पतंग आपको सक्रिय रखेगी... ऐसी पतंग जो मैन्‍युफैक्‍चरिंग डिफेक्‍ट के कारण एक ओर झुक रही हो, वह हमेशा आपको सक्रिय रखेगी, लैस प्रिडिक्‍टेबल होने के कारण उसके कटने की आशंका भी कम रहेगी।

पांचवा नियम
हवा न हो तो पतंग उतार लो.. हवा का बहाव अचानक बंद हो जाए तो बढ़ी हुई पतंग को समय रहते उतार लेना चाहिए, वरना मांझा झोळ खा जाता है, इससे पतंग लुटने का डर बना रहता है। बढ़ी हुई पतंग का लोभ न करें और हवा आने पर दोबारा उड़ा लें।

छठा नियम
कटी हुई पतंग का आकर्षण... कटी हुई पतंग मुफ्त माल की तरह होती है, उसे कभी जाने मत दो। कटी हुई पतंग का धागा सही पिरोया हुआ होता है, तभी तो वह उड़कर कटती है। दूसरी ओर कटी पतंग के साथ आए मांझे को भली भांति चैक करने के बाद ही काम में लें, अगर उपयुक्‍त धागा नहीं है तो लोभ न करें उसे फेंक दें और बढि़या धागे के साथ उड़ाएं।

सातवां नियम
विजय उत्‍सव जोर से मनाएं... एक या दो पतंग काट लेने के बाद अपनी पतंग को आसमान में ऊंचा टांग दें। दूसरे पतंगबाज जिन्‍होंने पहले दो पेंच देखें होगे वे करीब नहीं आएंगे और नए पतंगबाज पहले नीचे की पतंगों से उलझेंगे। ऐसे में आपकी पतंग देर तक आसमान में टिकी रहेगी। ऐसा आप बिना एक भी पतंग काटे भी कर सकते हैं।

आठवां नियम
आखिर में सादा लगाना ही पड़ेगा... आप अगर बढि़या सुता हुआ मांझा इस्‍तेमाल करते हैं तो भी आपको पतंग के काफी बढ़ जाने पर आखिर में सादा सफेद धागा लगाना ही पड़ेगा। वरना पतंग के जोर से खुद की ही अंगुलियां कटेंगी। ऐसे में ध्‍यान रखें कि किसी को दिखाने की बजाय समय पर सफेद धागा जोड़ दिया जाए, ताकि सुते हुए मांझे का अधिक नुकसान नहीं हो।

मकर संक्रांति की शुभकामनाएं...

रविवार, 28 नवंबर 2010

राजा हसन के साथ एक और फोटो

राजा हसन के साथ एक और फोटोग्राफ। कल मैंने इसका इंटरव्‍यू लिया था। कई नई बातें सामने आई...



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