बुधवार, 27 अप्रैल 2011

गुरुत्‍व प्रेम और उठना पैरों का

बीस साल की उम्र में बॉस्‍केटबॉल खेलना शुरू किया था। कुछ लोगों का विचार था, कि तब तक मेरी खेल शुरू करने की उम्र बीत चुकी है, लेकिन अगला एक साल मैंने खेल सीखा और तीन साल तक कोर्ट पर जमकर जलवे दिखाए। इससे एक वहम पक्‍का हो गया कि मैं जब भी खेलना शुरू करूंगा, तब ऐसा ही खेल लूंगा। पर, मेरे एक गुरुजी कहते थे कि वहम और खेल का आपस में वैर है। या तो वहम रहेगा या खेल। तब मैं समझा नहीं।

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खेल छोड़ने के छह साल बाद आखिर दस दिन पहले एक बार फिर बॉस्‍केटबॉल कोर्ट पर पहुंचा तो उसी अंदाज में खेलने की कोशिश करने लगा। इस बीच शरीर की काफी शक्ति और अभ्‍यास का नुकसान हो चुका था। ऐसे में हंस की चाल में चलते कौअे को नए खिलाडि़यों ने देखा। फिर भी ढिठाई के साथ वैसे ही प्रयास करता रहा। उस दिन का खेल खत्‍म होने के बाद खुद पर शर्म आई। घर आया तो शरीर का जोड़ जोड़ दुख रहा था। टांगें कांप रही थी और मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। पत्‍नीजी ने पूछा कि चाय बना लाऊं तो हां का जवाब भी नहीं निकल रहा था। आखिर कुछ देर में तंद्रा टूटी तो हौले से कहा नींबू पानी। सालों बाद यह पानी अमृत की तरह लग रहा था। दस मिनट बाद बोली खुली तो बताया कि हालत पस्‍त है। मेरी शक्‍ल से ऐसा नहीं लग रहा था, लेकिन शरीर अंदर से टूट गया था। रात को ढंग से नींद नहीं आई।

पहले दिन के झटके ने वहम को चकनाचूर कर दिया था। अगले दिन शाम को कोर्ट पर एक नौसिखिए खिलाड़ी की तरह पहुंचा। साथी खिलाडि़यों से पहले पहुंचा और कुछ देर वार्म अप किया। इसके बाद स्‍टेप बाइ स्‍टेप खेलना शुरू किया। पहले शूटिंग, फिर लैप शॉट और बाद में थ्री प्‍वाइंटर। लैप शॉट के दौरान तो जैसे जमीन मुझे नीचे की ओर खींच रही थी। किसी जमाने में जहां मेरा एयर स्‍टे मेरी शान हुआ करता था वहीं आज जमीन छोड़ना भी भारी महसूस हो रहा था।

आज दस दिन हो गए खेलते हुए। कल शाम एक नए खिलाड़ी ने कहा भाई ने दस दिन में अपना खेल ठीक सुधार लिया। किसी जमाने में मेरे कोच ने यही बात कही थी। टांगे कल शाम भी टूटी और शरीर का सत भी निकला हुआ था, लेकिन एक जूनियर खिलाड़ी के इन शब्‍दों ने जैसे शरीर को अतिरिक्‍त ताकत दे दी। अब आज शाम शायद और बेहतर खेल पाउं...

रविवार, 17 अप्रैल 2011

वो उसे क्‍या आता है... मैं बनाता हूं...

बीके स्‍कूल में मेरे साथ योगेन्‍द्र पढ़ता था। स्‍कूल छोड़ने के करीब पंद्रह साल बाद एक दिन योगेन्‍द्र मिला। मैं चहका, पूछा क्‍या कर रहे हो। उसने कहा चित्र बनाता हूं। मैंने कहा वो तो ठीक है, लेकिन करते क्‍या हो। वो सचमुच चिढ़ गया। मुझसे पूरी बात ही नहीं की। यानि जितनी भी बातचीत हुई उसमें वह मुझ पर झल्‍ला अधिक रहा था और बात कम कर रहा था।
मैंने उसके बारे में पता किया। पहले बीकानेर में चित्रकला में स्‍नातक किया। बाद में एमएफए करने के लिए जयपुर चला गया था। दिल्‍ली और मुम्‍बई में कई अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की प्रदर्शनियों का आयोजन करने के बाद उन दिनों बीकानेर में खाली बैठा था। जब वह अपनी रचनात्‍मकता के शीर्ष पर होता है तो सब काम धंधे छोड़कर खाली बैठ जाता है। बस सोचता रहता है। यह उसने बाद में बताया।
स्‍कूल के दिनों में वह काला और भद्दा था। पूरे चेहरे में केवल उसकी आंखें ही ऐसी थी जिन्‍हें आकर्षक कहा जा सकता है। आज बीस साल पीछे की ओर झांकता हूं तो लगता है कि उसने अपनी आंखों की चमक को बचाए रखा है। शायद बढ़ भी गई है। एक वही तो था जिसने अपने दिल की आवाज को सुना और उसी के रास्‍ते पर निकल पड़ा। छठी कक्षा में वह पूरे दिन चित्र बनाया करता था। अमिताभ बच्‍चन का वह जबरदस्‍त फैन था। सो पहले एक सादे कागज पर ग्राफ बनाता और एक सस्‍ता फोटो लेकर ग्राफ वाले कागज पर उसकी न‍कल बनाता था। दूसरे लड़के बहुत प्रभावित होते। मैं मुंह बना देता... इसमें क्‍या खास है। कोई भी बना सकता है। और चंपक में आए कार्टून मैं भी बना देता। सर से गुड भी मिल जाता। बाद में मैं चूहा दौड़ में शामिल हो गया और वह विशिष्‍ट बनता गया। पहली मुलाकात में हुई मुक्‍का लात के बाद में उसे मनाया और कहा कि मेरा भी एक पोर्टेट बना दे। यह बिल्‍कुल ऐसा आग्रह था जैसे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की फैशन डिजाइनर को पजामा सिलने के लिए दे दिया जाए। योगेन्‍द्र मुझे जानता था, सो मेरी बात का बुरा नहीं माना। बस टालता रहा। आज उसने एक गिफ्ट भेजा है। वही पोर्टेट.. अभी मैंने उससे बात नहीं की है, लेकिन शायद वह मेरी टकले वाली छवि को पसन्‍द नहीं करता था, सो अच्‍छी तस्‍वीर का इंतजार कर रहा था। मेरे तस्‍वीर बदलने के बाद उसने पोर्टेट बनाकर भेज दिया है। आप भी देखिए कैसा है...

छठी कक्षा में तो शायद उसे कुछ नहीं आता था, लेकिन बीस सालों की साधना के बाद कुछ तो निखार आया होगा.. मेरा तो अभ्‍यास छूट गया है।
sidharth joshi

योगेन्‍द्र अब बच्‍चों को सिखाता भी है। पिछले दिनों पत्रिका इन एज्‍युकेशन के समर स्‍कूल में उसने कई बच्‍चों को सीधी लकीरें खींचना सिखाया। उसका एक फोटो उसकी आईडी में से उठाकर लगा रहा हूं...
योगेन्‍द्र अपने शिष्‍यों के साथ

अपने शिष्‍यों के बीच खड़ा है बाएं से तीसरा... मुझे तो वह अब भी बच्‍चा ही लगता है... मुस्‍कान

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

इरोम शर्मिला की भूख के मायने

जनरल स्‍मट जो नया कानून लागू कर रहे हैं उससे हमारे परिवारों की महिलाएं वेश्‍याएं और हम सभी नाजायज औलादें घोषित कर दिए जाएंगे। मैं इसका विरोध करता हूं। जान देने के लिए तैयार हूं, लेने के लिए नहीं। मेरे इस तरह के विरोध का शायद उपनिवेशी ताकत पर असर हो। वे मुझे बन्‍दी बना सकते हैं, मेरी हड्डियां तोड़ सकते हैं और हो सकता है मेरा मृत शरीर ले लें, लेकिन मेरी आज्ञाकारिता नहीं ले सकते।

गांधी फिल्‍म में दक्षिण अफ्रीका के उस हॉल का नजारा आज भी मुझे आंदोलित कर देता है। बैरिस्‍टर गांधी ने इसी हॉल से सॉफ्ट प्रोटेस्‍ट को सत्‍याग्रह का शक्तिशाली हथियार बना दिया था। आज साठ साल बाद उसी हथियार को सरकार ने आत्‍महत्‍या का प्रयास जैसा नाम देकर उसका भद्दा मजाक बना दिया है।

सत्‍य का आग्रह जब गांधीजी ने किया...

लोकपाल बिल की लड़ाई में आज भारत का आम आदमी खास बना है, तब एक बार फिर उसे इरोम शर्मिला की याद दिलाने का सही वक्‍त है। हिन्‍दुस्‍तान का तहरीर चौक बने जन्‍तर मन्‍तर में अन्‍ना हजारे की भूख ने सरकार की गहरी अंतडि़यों से भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने के लिए जरूरी राजपत्र निकलवा लिया। पर, पूर्वोत्‍तर के लिए स्‍मट कानून बने सेना के विशेष अधिकार कानून हटाने की मांग लिए इरोम शर्मिला की भूख अब भी अपने ही देश के शीर्ष नेतृत्‍व और आम जनता की नजरे इनायत का इंतजार कर रही है।

मणिपुर में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पावर्स एक्‍ट 1958 का उपयोग...

अपने शरीर को अपना हथियार बना चुकी इरोम शर्मिला ने वर्ष 2000 में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशनल पावर एक्‍ट 1958 का विरोध तब करना शुरू किया जब सेना ने उनके गांव में घुसकर निर्दोष लोगों की हत्‍या कर दी। तब से अब तक शर्मिला की भूख हड़ताल को आत्‍महत्‍या का प्रयास बताकर गांधी के सत्‍याग्रह का खुला मजाक बना दिया है। पूर्वोत्‍तर में पृथ्‍‍थकवादी ताकतों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए कई क्षेत्र सेना के हवाले कर दिए गए थे। इसके बाद हर खास और आम व्‍यक्ति सेना की कार्रवाई का शिकार हुआ। मणिपुर में आसाम राइफल के जवानों ने दस लोगों की गोली मारकर हत्‍या कर दी। इसके खिलाफ शर्मिला उठ खड़ी हुई। ग्‍यारह साल होने को आए हैं। शर्मिला और उसका सत्‍याग्रह चल रहा है। शर्मिला की भूख कहीं उसकी जान न ले ले, इसके लिए पुलिस और प्रशासन उसे लगातार गिरफ्तार रखता है और नली की सहायता से उसे खाना पहुंचाया जा रहा है।

मीडिया ने कई बार शर्मिला की आवाज को उठाया, लेकिन रम्‍स अदायगी से ज्‍यादा कुछ नहीं हो पाया। आज अन्‍ना की सफलता के बाद एक बार फिर दिल्‍ली के कान बजाने का समय है। समय रहते पुरजोर आवाज उठी तो शायद शर्मिला का अनशन भी खत्‍म हो जाए...

आइए... भारतवर्ष के एक हिस्‍से में आम आदमी की मांग को लेकर ग्‍यारह सालों से सत्‍य का आग्रह कर रही शर्मिला के लिए अपने हिस्‍से की चेतना का कुछ अंश अर्पित करें...

कैसे भी...

यह भी देखिएगा

फिल्‍ममेकर कविता जोशी का मार्च 2006 को लिखा गया लेख

बीबीसी पर इरोम की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी 

मंगलवार, 29 मार्च 2011

पगे लागूं महाराज

बचपन में मैं महाराजों को बहुत देखता था। इन सालों में महाराजों की संख्‍या कुछ कम हो गई है। कुछ परिभाषा में भी आंशिक बदलाव आ गया तो महाराज की इतनी गरिमा भी नहीं रही। जब उन महाराजों को देखता था तो सोचता था कि एक दिन मैं भी महाराज बनूंगा। मैंने किसी समझदार से पूछ भी लिया कि महाराज कैसे बनते हैं। समझदार मेरी उम्‍मीद से ज्‍यादा समझदार था, उसने बताया जो अपना घर फूंककर तमाशा बनते हैं वे महाराज बन जाते हैं। उनसे वही लोग बराबरी कर सकते हैं जो अपना खुद का घर फूंकना जानते हो या फूंक चुके हों। यह परिभाषा सुनकर पांव के नीचे से जमीन सरक गई। खैर बाद में मैंने एक महाराज को करीब से भी देखा... आज उनकी याद आ गई...

हालांकि मैं उनका वास्‍तविक नाम भी बता सकता हूं लेकिन नाम से अधिक उनकी कहानी में दम है सो सुनिए...

महाराज के पिता नायब तहसीलदार थे। करीब चालीस साल पहले यह बहुत शानदार पोस्‍ट हुआ करती थी। पटवारी से शुरू हुए थे और दसवीं पास होने के कारण तेजी से तरक्‍की करते हुए तहसीलदार के पद पर पहुंच गए थे। अपने रुआब से अच्‍छी खासी जमीनें, गहने और जायदाद जमा कर लिए थे। महाराज को इन सबकी जानकारी थी। सो कभी पढ़ने में मन नहीं लगाया। ऐसा नहीं था कि पढ़ने जितना दिमाग न हो, लेकिन शुरू से ही पढ़ाई को डिस्‍कार्ड ही कर दिया। खेलने का शौक था। फुटबॉल खेलने के लिए जाते थे, सो एक दिन बात की बात में टीम से अलग हो गए और अपनी अलग फुटबॉल टीम बना ली। कोच से लेकर अर्दली तक रिक्रुट कर लिए। जितनी टीम उतना ही स्‍टाफ। खैर टीम में भी ऊंची कीमतों पर एक से बढ़कर एक खिलाडि़यों को शामिल किया। कुछ महीने तक बीकानेर में ही प्रेक्टिस की और चले विश्‍वविजय को। बीकानेर से सीधे कलकत्‍ता गए। मैत्री मैच हुआ और मोहनबागान को टिका दिया। जमकर वाह वाह हुई। महाराज पक्‍के महाराज बन गए। घर फुंक रहा था, लेकिन महाराज के पिता खुश थे, कि बेटा नाम कमा रहा है। धीरे धीरे खेल से अलग हुए तो घोड़ों का शौक पाल लिया। टीम में शामिल खिलाडि़यों के खाने के लाले पड़े तो खिलाडि़यों ने छोटे मोटे धंधे करना शुरू कर दिया और दिन रात महाराज के गुण गाते। इधर महाराज का घोड़ों का शौक बढ़ता जा रहा था। तेल का पीपा घोड़े के मुंह के आगे ही खोल कर रखा जाता। जब तेल खत्‍म हो जाता और घोड़ा मुंह मारता रहता तो तेल के खुले पीपे में घी उंडेल दिया जाता। महाराज के घोड़े शहर की शान बन गए।

इसी दौरान समयचक्र ने पलटा खाया। महाराज की किसी बात पर पिता से लड़ाई हो गई। अपनी आन पर जिंदा रहने वाले महाराज ने पिता से पैसा लेना बन्‍द कर दिया। परिवार में बीबी बच्‍चों थे, सो उनको लेकर अलग हो गए। महाराज के पिता कमरे बन्‍द कर कर के खूब रोए लेकिन महाराज को नहीं मना पाए। सोने और चांदी का चम्‍मच मुंह में लेकर पैदा हुए महाराज के बच्‍चों के सामने दोनों समय के खाने का जुगाड़ मुश्किल हो रहा था। महाराज ने अपने किसी यारबाज से पैसा लेकर जीप खरीद ली। महाराज मेहनती तो थे ही जीप का काम भी अच्‍छा चल पड़ा। एक बार सड़क पर लाश पड़ी देखी तो उसे जीप में डालकर ले आए। खबर आग की तरफ फैली तो लोगों ने मांगलिक कार्यों के लिए जीप में किराए पर लेना बन्‍द कर दिया। महाराज कहां हार मानने वाले थे, उन्‍होंने लाशें ढोने के काम में ही खुद को खपा दिया। इसी दौरान पता चला कि महाराज के बड़े बेटे ने अपने दादा से सांठ-गांठ कर सारी संपत्ति अपने नाम करा ली है। महाराज ने आव देखा न ताव, अपने पिता के घर से बाहर चल पड़े। अपना अलग घर बना लिया। छोटा बेटा महाराज के ही नक्‍शे कदम पर चल रहा था, सो संगीत का शौक पाल बैठा। हालांकि कहीं से तालीम नहीं ली, लेकिन दिन महीने और साल तबले, हारमोनियम, सितार और मंजीरे बजाते हुए ही निकल रहे थे। ऐसे में गृहस्‍थी का सारा बोझ महाराज के कंधों पर ही रहा। एक दिन महाराज टूट गए। बीमार होकर बिस्‍तर पर पड़े तो वापस उठ नहीं पाए। सालों की मेहनत से बनाई आन और गृहस्‍थी टुकड़ा टुकड़ा कर टूटती नजर आ रही थी। तीन साल तक बिस्‍तर में रहे। बीबी ने खूब सेवा की। आखिर यमराज ने महाराज को उठा लिया। जब महाराज अंतिम सांसें गिन रहे थे तो एक लकड़ी के पाटे पर निश्‍तेज पड़े थे और आंखें पथरा रही थी। करोड़ों रुपए की संपत्ति पर बड़ा पुत्र काबिज था और छोटा बेटा संगीत की धुनों में खोया हुआ था...

महाराज तो फिर भी महाराज ही रहे। जिसे भी पता चला कि महाराज का निधन हो गया है, अपना काम छोड़ सीधा उनके घर की ओर भागता हुआ आया। जिन लोगों को पैसा दिया वे लौटे नहीं और जिन्‍हें प्‍यार लुटाया वे सम्‍मान लुटाने आ पहंचे। मैं भी कई बार उनके प्‍यार की बारिश में नहाया था। सो मैं भी उनकी अंतिम यात्रा में साथ था। कंधा देने के बाद मैं शवयात्रा में पीछे लौटा तो लोग आपस में बात कर रहे थे...

महाराज तो महाराज थे, उनकी तरह अपना सबकुछ फूंककर कौन दूसरों पर प्‍यार लुटा सकता है...

नहीं कोई नहीं लुटा सकता...

शनिवार, 15 जनवरी 2011

जाकिर भाई से मौज

मेरा ब्‍लॉगिंग के जरिए जाकिर जी से पुराना रिश्‍ता है। वे ज्‍योतिष की पूछ फाड़ने में लगे रहते हैं और मैं साइंस की पूछ पकड़ने की कोशिश करता रहता हूं। किसी जमाने में फ्रीडम फाइटर हुआ करते थे, फिर सर्विस फाइटर और पीएमटी और पीईटी फाइटर हुए। आजकर ब्‍लॉगर फाइटर होते हैं। ऐसे ही मैं और जाकिर अली रजनीश जी ब्‍लॉगर फाइटर हैं। और आप पाठकगण तो हम दोनों की मौज तो लेते ही रहते हैं। खैर मैं पहले क्‍लीयर कर देना चाहता हूं कि मैं जाकिर अली रजनीश जी से मौज ले रहा हूं। वे बुरा न मानें...


उन्‍होंने कुछ माह पहले मुझे जन्‍मदिन की शुभकामनाएं दी। निश्‍चय ही हृदय से दी... मैं उनका शुक्रगुजार हूं, लेकिन चार दिन से बिस्‍तर पकड़े पकड़े आखिर मैंने उन शुभकामनाओं को दोबारा देख लिया तो तगड़ा झटका लगा... आप भी देखिए...
आपकी दुआएं भी सांप के काटने जैसी लगेंगी तो सांप से कटवाकर ही खुश हो जाएंगे, कुछ भी नहीं करेंगे :)