रविवार, 12 जून 2011

क्‍या मैं ऐसा ही हूं... ?

आज रवि रतलामी जी ने चेताया कि आपको अपने ब्लॉगिंग व्यक्तित्व का अता-पता है भी? तो हम भी पहुंच गए यह जानने कि हमसे बेहतर हमें कौन जानता है। वहां पहुंचकर देखा कि महज लिंक पेश करना है और आपके व्‍यक्तित्‍व के बारे में विशद (?) जानकारी उपलब्ध है। पहले अपने एक ब्‍लॉग ज्‍योतिष दर्शन का पता किया तो शानदार परिणाम सामने आया। उत्‍साह के मारे अपने दूसरे ब्‍लॉग दिमाग की हलचल के जरिए भी खुद का परीक्षण कर लिया। वह तो और भी शानदार मिला। वाह... देखिए हमारे व्‍यक्तित्‍व के जो पहलु उभरकर सामने आए हैं। क्‍या वास्‍तव में मैं ऐसा ही हूं।

ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग के आधार पर मेरा विश्‍लेषण

The active and playful type. They are especially attuned to people and things around them and often full of energy, talking, joking and engaging in physical out-door activities. The Doers are happiest with action-filled work which craves their full attention and focus. They might be very impulsive and more keen on starting something new than following it through. They might have a problem with sitting still or remaining inactive for any period of time.

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दिमाग की हलचल ब्‍लॉग से मिले विश्‍लेषण का निष्‍कर्ष

The independent and problem-solving type. They are especially attuned to the demands of the moment and are highly skilled at seeing and fixing what needs to be fixed. They generally prefer to think things out for themselves and often avoid inter-personal conflicts. The Mechanics enjoy working together with other independent and highly skilled people and often like seek fun and action both in their work and personal life. They enjoy adventure and risk such as in driving race cars or working as policemen and firefighters.

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अपनी इतनी तारीफें पढ़ने के बाद एक वाकया याद आ गया....

एक बार राजस्‍थान के प्रार‍ंभिक शिक्षा निदेशक का सम्‍मान किया गया। उन्‍हें स्‍टेज पर बैठा दिया गया और पढे लिखे और वाकपटु शिक्षकों ने दो घंटे से अधिक समय तक उनकी तारीफों के ऐसे पुल बांधे कि सूरज देवता छिप गए। (मेरा ध्‍यान सूरज देवता पर ही था, क्‍यों‍कि भोज में विलम्‍ब हुआ जा रहा था)। आखिर तारों की रोशनी में निदेशक महोदय उठ खड़े हुए। उन्‍होंने डायस पर आते ही सभी शिक्षकों और कर्मचारियों को तहेदिल से आभार व्‍यक्‍त किया, लेकिन इसके साथ ही अपनी पीड़ा भी व्‍यक्‍त कर दी। उन्‍होंने बताया कि प्राचीन काल में किसी राजा के दरबारियों में किसी व्‍यक्ति को लज्जित करना होता तो राजा उसे सभा में खड़ा कर देता और दूसरे सभासदों से कहता कि इनकी तारीफ में कसीदे गढ़े। जिस व्‍यक्ति की तारीफ राजा के सामने होती वह लज्जित होता रहता। निदेशक महोदय ने कहा कि ज्ञानी लोगों और ईश्‍वर से पहले पूछे जाने वाले गुरुजनों के समक्ष अपनी तारीफें सुनकर उन्‍हें भी लज्‍जा महसूस हो रही है। तबादलों और दूसरे कामों की उम्‍मीद लिए कर्मचारी सकते में आ गए। बाद में निदेशक महोदय ने खुद ही माहौल को हल्‍का कर दिया। ये निदेशक थे श्‍यामसुंदर बिस्‍सा। रिपोर्टर के तौर पर मेरे साथ इनके कई खट्टे मीठे अनुभव रहे, लेकिन इस घटना के बाद मैं निजी तौर पर उनका मुरीद हो गया।

आपने ऊपर मेरी तारीफ तो नहीं पढ़ी ना... मुस्‍कान 

शनिवार, 11 जून 2011

बीकानेर में छाते नहीं बिकते

आप भी कहेंगे कि ये क्‍या बात हुई, लेकिन मुझे अपना पक्ष तो स्‍पष्‍ट करने दीजिए। बीकानेर में छाते नहीं बिकते क्‍योंकि यहां बारिश नहीं होती। यह भी कोई खास बात नहीं है, लेकिन गौर करें तो पाएंगे कि बीकानेर में बेरहम गर्मी तो होती है, फिर छाते क्‍यों नहीं बिकते। पिछले साल पत्रिका के एक वरिष्‍ठ साथी राहुल शर्माजी ने मुझे यह जानकारी दी थी। वे मूलत राजस्‍थान के हिण्‍डौनसिटी के हैं। पिछले साल छुट्टियों पर वे अपने गांव गए तो उनके पिता ने कहा कि बीकानेर में इतनी गर्मी पड़ती है तो छाते भी खूब बनते होंगे। कोई अच्‍छा सा छाता मिले तो अगली बार लेकर आना। राहुलजी ने बीकानेर आकर पता किया तो पता चला कि बीकानेर में कोई भी दुकान खासतौर पर छाता बनाने वालों की नहीं है। (मैं खुद बीकानेर का हूं, लेकिन मैंने कभी यह गौर नहीं किया, यहां तक कि सोचा भी नहीं)। वरिष्‍ठ साथी ने कई जगह चक्‍कर निकाले और कुछ दुकानों में जहां मिले तो वे भी दूसरे शहरों या राज्‍यों के बने हुए छाते बिक रहे थे। दुकानदारों ने भी बताया कि बीकानेर में छातों की बिक्री नहीं होती। कुछ लोग शौक के लिए बस खरीदकर ले जाते हैं। लौटकर आने वाले ग्राहक तो हैं ही नहीं।

पिछले एक महीने से तापमापी का पारा 45 से 49 के बीच घूम रहा है। मौसम विज्ञानियों की मानें तो आदर्श परिस्थितियों में मापे गए पारे की तुलना में सड़क पर तापमान इससे तीन या चार डिग्री ऊपर होता है। यानि बीकानेर में इस साल पारा कई बार पचास डिग्री के पार पहुंच चुका है, लेकिन फिर भी सिर पर छाता ताने लोगों को मैंने इस बार भी नहीं देखा। हां दिखाई दिए तो ये तीन बच्‍चे एक ही छाते को लेकर जा रहे थे। मैंने अपने मोबाइल कैमरे से यह “दुर्लभ” फोटो खींचा है।

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पूर्वान्ह सवा ग्‍यारह बजे यह स्थिति हो चुकी थी कि जयनारायण व्‍यास कॉलोनी, जो पोश कॉलोनियों में से एक है, का बाजार सुनसान हो चुका था।

मुझे याद है बचपन में मेरे पड़नानाजी से उनकी उम्र के कुछ लोग मिलने आया करते थे तो वे छड़ी के बजाय छाता टेकते हुए आते थे। मैंने उन्‍हें कभी छाता सिर के ऊपर ताने हुए नहीं देखा। हमारे घर में भी बचपन से कभी छाता नहीं रहा। फैशन के तौर पर कभी आया भी तो बच्‍चों के खेल के भेंट ही चढ़ा। मैं समझ नहीं पाता कि बीकानेर की भीषण गर्मी से बचाव के लिए लोग छाते का इस्‍तेमाल क्‍यों नहीं करते। ठीक है यहां बारिश अधिक नहीं होती, लेकिन तपती धूप तो हमें परेशान करती ही है।

नए दौर के लोगों के लिए कहा जा सकता है कि तेज रफ्तार वाहनों ने छाते को बेकार कर दिया है, लेकिन आज से बीस साल पहले जब इतने वाहन नहीं थे, तब भी लोग छाते का इस्‍तेमाल इतना नहीं कर रहे थे, जितनी कि यहां गर्मी पड़ती है। इसके बजाय लोग सिर से पांव तक खुद को सूती कपड़ों से ढंककर बाहर निकलते हैं। महिलाएं तो अपना मुंह तक ओढ़ने से ढके रखती हैं।

इस बारे में एक जोरदार वाकया भी है। मेरे मामा उस जमाने में रिपोर्टर हुआ करते थे। दिल्‍ली के एक राष्‍ट्रीय अखबार की रिपोर्टर बीकानेर आई और उसने मई जून की भीषण गर्मी में ग्रामीण क्षेत्रों का दौर कर निष्‍कर्ष निकाला कि अभी राजस्‍थान और विशेषकर बीकानरे, जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्रों में महिलाओं की बड़ी दयनीय स्थिति है। यहां घूंघट प्रथा इतना विकराल रूप ले चुकी है कि महिलाओं को न सिर्फ सिर ढकने के लिए बाध्‍य किया जाता है, बल्कि पूरा मुंह गले तक ढककर महिलाएं बाहर निकलती हैं। मामाजी के सामने उस महिला पत्रकार ने अपनी बात रखी तो मामाजी ने माथा ठोंक लिया। उन्‍होंने पत्रकार से पूछा कि क्‍या आपने उन महिलाओं से बात की थी, या केवल देखकर ही अपना निष्‍कर्ष निकाल रही हैं। पत्रकार ने कहा कि वे स्‍थानीय भाषा जानती नहीं हैं सो देखकर ही निष्‍कर्ष निकाला है। अब मामाजी ने स्‍पष्‍ट किया कि बीकानेर में गर्मियों के दिनों में लगातार धूलभरी हवाएं चलती हैं। ऐसे में अगर महिला का मुंह खुला होगा तो चेहरे पर गर्म रेत के झोंके लगेंगे। इससे गर्मी भी अधिक लगेगी और चेहरे का भी नुकसान होगा। इससे बचने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अपने ओढने से मुंह को भी पूरी तरह ढके रहती है। महिला पत्रकार के दिमाग की बत्‍ती जली तो उसने अपनी रिपोर्ट में आवश्‍यक सुधार किए।

और अब एक अनूठा प्रयोग

गर्मी है सो है, अब इससे बचने के लिए बीकानेर में कूलर का ही आसरा है। छठे वेतन आयोग का लाभ मिलने के बाद बीकानेर में एसी की ब्रिकी में भी जोरदार इजाफा हुआ है। तीन से पांच प्रतिशत आर्द्रता के बीच तेज गर्म हवाएं माहौल को बुरी तरह तपा देती हैं तो कूलर और एसी भी फेल साबित होते हैं। ऐेसे में प्रयोगधर्मी लोगों का दिमाग चालू रहता है। यही तो है थार की जीवटता। देखिए इसका एक नमूना। इसमें कूलर के आगे एक और पंखा लगा  दिया है। हवा दूनी रफ्तार से आती है। हालांकि इससे शोर तो बहुत हो रहा था, लेकिन हवा इतनी तेज और नम थी कि माहौल में गर्मी का असर कुछ कम हो गया।

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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

गुरुत्‍व प्रेम और उठना पैरों का

बीस साल की उम्र में बॉस्‍केटबॉल खेलना शुरू किया था। कुछ लोगों का विचार था, कि तब तक मेरी खेल शुरू करने की उम्र बीत चुकी है, लेकिन अगला एक साल मैंने खेल सीखा और तीन साल तक कोर्ट पर जमकर जलवे दिखाए। इससे एक वहम पक्‍का हो गया कि मैं जब भी खेलना शुरू करूंगा, तब ऐसा ही खेल लूंगा। पर, मेरे एक गुरुजी कहते थे कि वहम और खेल का आपस में वैर है। या तो वहम रहेगा या खेल। तब मैं समझा नहीं।

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खेल छोड़ने के छह साल बाद आखिर दस दिन पहले एक बार फिर बॉस्‍केटबॉल कोर्ट पर पहुंचा तो उसी अंदाज में खेलने की कोशिश करने लगा। इस बीच शरीर की काफी शक्ति और अभ्‍यास का नुकसान हो चुका था। ऐसे में हंस की चाल में चलते कौअे को नए खिलाडि़यों ने देखा। फिर भी ढिठाई के साथ वैसे ही प्रयास करता रहा। उस दिन का खेल खत्‍म होने के बाद खुद पर शर्म आई। घर आया तो शरीर का जोड़ जोड़ दुख रहा था। टांगें कांप रही थी और मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। पत्‍नीजी ने पूछा कि चाय बना लाऊं तो हां का जवाब भी नहीं निकल रहा था। आखिर कुछ देर में तंद्रा टूटी तो हौले से कहा नींबू पानी। सालों बाद यह पानी अमृत की तरह लग रहा था। दस मिनट बाद बोली खुली तो बताया कि हालत पस्‍त है। मेरी शक्‍ल से ऐसा नहीं लग रहा था, लेकिन शरीर अंदर से टूट गया था। रात को ढंग से नींद नहीं आई।

पहले दिन के झटके ने वहम को चकनाचूर कर दिया था। अगले दिन शाम को कोर्ट पर एक नौसिखिए खिलाड़ी की तरह पहुंचा। साथी खिलाडि़यों से पहले पहुंचा और कुछ देर वार्म अप किया। इसके बाद स्‍टेप बाइ स्‍टेप खेलना शुरू किया। पहले शूटिंग, फिर लैप शॉट और बाद में थ्री प्‍वाइंटर। लैप शॉट के दौरान तो जैसे जमीन मुझे नीचे की ओर खींच रही थी। किसी जमाने में जहां मेरा एयर स्‍टे मेरी शान हुआ करता था वहीं आज जमीन छोड़ना भी भारी महसूस हो रहा था।

आज दस दिन हो गए खेलते हुए। कल शाम एक नए खिलाड़ी ने कहा भाई ने दस दिन में अपना खेल ठीक सुधार लिया। किसी जमाने में मेरे कोच ने यही बात कही थी। टांगे कल शाम भी टूटी और शरीर का सत भी निकला हुआ था, लेकिन एक जूनियर खिलाड़ी के इन शब्‍दों ने जैसे शरीर को अतिरिक्‍त ताकत दे दी। अब आज शाम शायद और बेहतर खेल पाउं...

रविवार, 17 अप्रैल 2011

वो उसे क्‍या आता है... मैं बनाता हूं...

बीके स्‍कूल में मेरे साथ योगेन्‍द्र पढ़ता था। स्‍कूल छोड़ने के करीब पंद्रह साल बाद एक दिन योगेन्‍द्र मिला। मैं चहका, पूछा क्‍या कर रहे हो। उसने कहा चित्र बनाता हूं। मैंने कहा वो तो ठीक है, लेकिन करते क्‍या हो। वो सचमुच चिढ़ गया। मुझसे पूरी बात ही नहीं की। यानि जितनी भी बातचीत हुई उसमें वह मुझ पर झल्‍ला अधिक रहा था और बात कम कर रहा था।
मैंने उसके बारे में पता किया। पहले बीकानेर में चित्रकला में स्‍नातक किया। बाद में एमएफए करने के लिए जयपुर चला गया था। दिल्‍ली और मुम्‍बई में कई अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की प्रदर्शनियों का आयोजन करने के बाद उन दिनों बीकानेर में खाली बैठा था। जब वह अपनी रचनात्‍मकता के शीर्ष पर होता है तो सब काम धंधे छोड़कर खाली बैठ जाता है। बस सोचता रहता है। यह उसने बाद में बताया।
स्‍कूल के दिनों में वह काला और भद्दा था। पूरे चेहरे में केवल उसकी आंखें ही ऐसी थी जिन्‍हें आकर्षक कहा जा सकता है। आज बीस साल पीछे की ओर झांकता हूं तो लगता है कि उसने अपनी आंखों की चमक को बचाए रखा है। शायद बढ़ भी गई है। एक वही तो था जिसने अपने दिल की आवाज को सुना और उसी के रास्‍ते पर निकल पड़ा। छठी कक्षा में वह पूरे दिन चित्र बनाया करता था। अमिताभ बच्‍चन का वह जबरदस्‍त फैन था। सो पहले एक सादे कागज पर ग्राफ बनाता और एक सस्‍ता फोटो लेकर ग्राफ वाले कागज पर उसकी न‍कल बनाता था। दूसरे लड़के बहुत प्रभावित होते। मैं मुंह बना देता... इसमें क्‍या खास है। कोई भी बना सकता है। और चंपक में आए कार्टून मैं भी बना देता। सर से गुड भी मिल जाता। बाद में मैं चूहा दौड़ में शामिल हो गया और वह विशिष्‍ट बनता गया। पहली मुलाकात में हुई मुक्‍का लात के बाद में उसे मनाया और कहा कि मेरा भी एक पोर्टेट बना दे। यह बिल्‍कुल ऐसा आग्रह था जैसे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की फैशन डिजाइनर को पजामा सिलने के लिए दे दिया जाए। योगेन्‍द्र मुझे जानता था, सो मेरी बात का बुरा नहीं माना। बस टालता रहा। आज उसने एक गिफ्ट भेजा है। वही पोर्टेट.. अभी मैंने उससे बात नहीं की है, लेकिन शायद वह मेरी टकले वाली छवि को पसन्‍द नहीं करता था, सो अच्‍छी तस्‍वीर का इंतजार कर रहा था। मेरे तस्‍वीर बदलने के बाद उसने पोर्टेट बनाकर भेज दिया है। आप भी देखिए कैसा है...

छठी कक्षा में तो शायद उसे कुछ नहीं आता था, लेकिन बीस सालों की साधना के बाद कुछ तो निखार आया होगा.. मेरा तो अभ्‍यास छूट गया है।
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योगेन्‍द्र अब बच्‍चों को सिखाता भी है। पिछले दिनों पत्रिका इन एज्‍युकेशन के समर स्‍कूल में उसने कई बच्‍चों को सीधी लकीरें खींचना सिखाया। उसका एक फोटो उसकी आईडी में से उठाकर लगा रहा हूं...
योगेन्‍द्र अपने शिष्‍यों के साथ

अपने शिष्‍यों के बीच खड़ा है बाएं से तीसरा... मुझे तो वह अब भी बच्‍चा ही लगता है... मुस्‍कान

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

इरोम शर्मिला की भूख के मायने

जनरल स्‍मट जो नया कानून लागू कर रहे हैं उससे हमारे परिवारों की महिलाएं वेश्‍याएं और हम सभी नाजायज औलादें घोषित कर दिए जाएंगे। मैं इसका विरोध करता हूं। जान देने के लिए तैयार हूं, लेने के लिए नहीं। मेरे इस तरह के विरोध का शायद उपनिवेशी ताकत पर असर हो। वे मुझे बन्‍दी बना सकते हैं, मेरी हड्डियां तोड़ सकते हैं और हो सकता है मेरा मृत शरीर ले लें, लेकिन मेरी आज्ञाकारिता नहीं ले सकते।

गांधी फिल्‍म में दक्षिण अफ्रीका के उस हॉल का नजारा आज भी मुझे आंदोलित कर देता है। बैरिस्‍टर गांधी ने इसी हॉल से सॉफ्ट प्रोटेस्‍ट को सत्‍याग्रह का शक्तिशाली हथियार बना दिया था। आज साठ साल बाद उसी हथियार को सरकार ने आत्‍महत्‍या का प्रयास जैसा नाम देकर उसका भद्दा मजाक बना दिया है।

सत्‍य का आग्रह जब गांधीजी ने किया...

लोकपाल बिल की लड़ाई में आज भारत का आम आदमी खास बना है, तब एक बार फिर उसे इरोम शर्मिला की याद दिलाने का सही वक्‍त है। हिन्‍दुस्‍तान का तहरीर चौक बने जन्‍तर मन्‍तर में अन्‍ना हजारे की भूख ने सरकार की गहरी अंतडि़यों से भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने के लिए जरूरी राजपत्र निकलवा लिया। पर, पूर्वोत्‍तर के लिए स्‍मट कानून बने सेना के विशेष अधिकार कानून हटाने की मांग लिए इरोम शर्मिला की भूख अब भी अपने ही देश के शीर्ष नेतृत्‍व और आम जनता की नजरे इनायत का इंतजार कर रही है।

मणिपुर में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पावर्स एक्‍ट 1958 का उपयोग...

अपने शरीर को अपना हथियार बना चुकी इरोम शर्मिला ने वर्ष 2000 में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशनल पावर एक्‍ट 1958 का विरोध तब करना शुरू किया जब सेना ने उनके गांव में घुसकर निर्दोष लोगों की हत्‍या कर दी। तब से अब तक शर्मिला की भूख हड़ताल को आत्‍महत्‍या का प्रयास बताकर गांधी के सत्‍याग्रह का खुला मजाक बना दिया है। पूर्वोत्‍तर में पृथ्‍‍थकवादी ताकतों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए कई क्षेत्र सेना के हवाले कर दिए गए थे। इसके बाद हर खास और आम व्‍यक्ति सेना की कार्रवाई का शिकार हुआ। मणिपुर में आसाम राइफल के जवानों ने दस लोगों की गोली मारकर हत्‍या कर दी। इसके खिलाफ शर्मिला उठ खड़ी हुई। ग्‍यारह साल होने को आए हैं। शर्मिला और उसका सत्‍याग्रह चल रहा है। शर्मिला की भूख कहीं उसकी जान न ले ले, इसके लिए पुलिस और प्रशासन उसे लगातार गिरफ्तार रखता है और नली की सहायता से उसे खाना पहुंचाया जा रहा है।

मीडिया ने कई बार शर्मिला की आवाज को उठाया, लेकिन रम्‍स अदायगी से ज्‍यादा कुछ नहीं हो पाया। आज अन्‍ना की सफलता के बाद एक बार फिर दिल्‍ली के कान बजाने का समय है। समय रहते पुरजोर आवाज उठी तो शायद शर्मिला का अनशन भी खत्‍म हो जाए...

आइए... भारतवर्ष के एक हिस्‍से में आम आदमी की मांग को लेकर ग्‍यारह सालों से सत्‍य का आग्रह कर रही शर्मिला के लिए अपने हिस्‍से की चेतना का कुछ अंश अर्पित करें...

कैसे भी...

यह भी देखिएगा

फिल्‍ममेकर कविता जोशी का मार्च 2006 को लिखा गया लेख

बीबीसी पर इरोम की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी