रविवार, 11 सितंबर 2011

मैं अन्‍ना पर भरोसा करता हूं, लेकिन...

हालांकि जन लोकपाल बिल आने और उसके जमीनी तौर पर लागू होने में अभी बहुत समय बाकी है, लेकिन आम आदमी के चेहरे पर संतोष का भाव अभी से दिखाई देने लगा है। क्‍योंकि अन्‍ना उसके साथ है, अन्‍ना मेरे साथ है। जो व्‍यक्ति आज मुझसे जबरन भ्रष्‍टाचार के पैसे ले रहा है, कल वह मेरे समक्ष नतमस्‍तक खड़ा होगा और मैं फिर से मिमियाने के बजाय लोकतंत्र की पुख्‍ता जमीन पर सीना तानकर खड़ा होउंगा। मुझे अन्‍ना पर गर्व है... लेकिन....

कुछ सवाल पिछले कुछ दिन से मुझे परेशान करने लगे हैं। अखबारों, समाचार चैनलों और सूचना के अन्‍य माध्‍यमों के इतर नेट पर मैंने कुछ सवाल देखे, वह विचलित कर देने वाले लगते हैं, हालांकि अब भी मैं अन्‍ना और उनकी टीम को संदेह के घेरे में नहीं लेता, पर कहीं भविष्‍य में यह नूरा कुश्‍ती सिद्ध हुई तो सवा अरब भारतियों के साथ मैं भी गहरे अवसाद में चला जाउंगा। हो सकता है खुद ही भ्रष्‍टाचार के नए कीर्तीमान स्‍थापित करने लगूं। मेरा ईश्‍वर मुझे इसकी अनुमति नहीं देता, पर गीता में कृष्‍ण यह कहकर कि 'विवेक के अनुसार जो सही है वही सही है' मुझे भ्रष्‍टाचार का रास्‍ता अपनाने का विवेक दे देते हैं।

कुछ सवाल जिन पर अन्‍ना और उनकी टीम को जवाब देना ही चाहिए। हालांकि पूर्व में इस बारे में नेट पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन जिन सवालों ने मेरी श्रद्धा को विचलित किया उन पर तो मुझे चर्चा करनी ही होगी। ये सवाल हैं....

- रेलवे एक्‍सीडेंट से लेकर क्रिकेट मैच के स्‍कोर तक के बीच में विज्ञापन दिखाने वाली मीडिया ने बिना कमर्शियल विज्ञापनों के अन्‍ना के आंदोलन का निर्बाध प्रसारण किया... मीडिया कंपनियों ने इस घाटे को कैसे सहन किया?

- विशेषाधिकार हनन का नोटिस देने वाले सांसद को दिल्‍ली बम विस्‍फोट के बाद अचनाक ब्रह्मज्ञान हुआ और उसने विस्‍फोट के अगले ही दिन अपना प्रस्‍ताव वापस ले लिया।

- खुद के संपत्ति नहीं होने और सारी संपत्ति अपने ही ट्रस्‍ट को दान करने वाले अरविन्‍द केजरीवाल इनकम टैक्‍स विभाग से छूट मांग रहे हैं, और साथ में झूठ भी बोल रहे हैं। बाद में वे अपनी बात से मुकर जाते हैं, और कहते हैं कि इस प्रकरण का आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है। मैं भी यही मानता हूं, लेकिन इसका सीधा संबंध उस व्‍यक्ति के चरित्र से है, जो आंदोलन के प्रणेताओं में से एक होने का मान रखता है।

- अन्‍ना को अनशन करने के लिए जेपी पार्क दिया गया था, वहां उन्‍हें अनशन नहीं करने दिया गया और तिहाड़ जेल भेज दिया गया (कानून का हवाला देकर)। बाद में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अन्‍ना तीन दिन बिना किसी नियम और कानून के तिहाड़ जेल के अतिथि बने रहे और बाहर लोग और मीडिया डटे रहे। संवेदनशील इलाके को खाली कराने के लिए न राज्‍य सरकार ने कुछ किया न केन्‍द्र ने।

- भ्रष्‍टाचार के मुद्दे का जातिवाद से कोई लेना देना नहीं है। इसके बावजूद आंदोलन में ट्विस्‍ट लाने के लिए कुल जमा 35 मुसलमानों को आंदोलन स्‍थल पर लाया गया और नमाज पढ़वाई गई। क्‍या इसकी जरूरत थी। अगर थी भी तो उन्‍हें मंच के समक्ष नमाज पढ़वाने का नाटक क्‍यों किया गया।

- गुजराज के लोकायुक्‍त पद पर नियुक्‍त किए गए सेवानिवृत्त जज के नैतिक आचरण पर सालों पहले से कई सवाल उठते रहे हैं। यह व्‍यक्ति कांग्रेस के मीडिया प्रकोष्‍ठ में एक बाबू की हैसियत से दस साल से अधिक समय तक काम करता रहा, फिर राजनैतिक हैसियत का लाभ उठाकर उच्‍च न्‍यायालय का न्‍यायाधीश बना और अब उसे लोकायुक्‍त बनाया गया है। केवल पैसे खाना ही भ्रष्‍टाचार नहीं है, आचरण भी इसमें शामिल है। अप्रेल में आंदोलन के बाद मई माह में अन्‍ना हजारे इस लोकायुक्‍त के घर पर ठहरे थे। इस तथ्‍य ने मुझे अधिक चिंता में डाला...

- अरविन्‍द केजरीवाल ने अपने ही विभाग से मिले नोटिस को राष्‍ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास किया, इसके लिए बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की और लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास किया।

- अरुणा राय और दूसरे साथी जिन्‍होंने सूचना का अधिकार कानून को पास कराने के लिए पहले दौर में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया, इस बार उन्‍हें उपेक्षित रखा गया। क्‍या वे राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व के लायक नहीं हैं।

- केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के रेलवे स्‍टेशन पर सोते हुओं के चित्र नेट पर जारी किए गए। क्‍या इस तरह के मीडिया कैंपेन की जरूरत थी।

- राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि अन्‍ना और उनकी टीम की ओर से किए जा रहे इस आंदोलन की वे कड़े शब्‍दों में निंदा करते हैं, क्‍या टीम अन्‍ना के पास उनके लिए कोई जवाब नहीं था।

- बुखारी ने कहा कि मुस्लिम आंदोलन के साथ नहीं है, टीम अन्‍ना जो सरकार के हर कैल्‍कुलेटेड वार का जवाब देती रही, बुखारी के लिए एक भी शब्‍द नहीं मिला।

- आखिरी सवाल, भ्रष्‍टाचार के मुद्दे के साथ जुड़ी दो चीजों को सफाई से दरकिनार कर दिया गया है, एक भारत माता का चित्र और दूसरा बाबा रामदेव। बाबा की कई कमियां रही होंगी, लेकिन क्‍या उन्‍हें आंदोलन से अलग किया जा सकता है। एक साल तक बाबा पूरे देश में घूमकर काले धन की रट लगाता रहा, सोनिया गांधी को स्विट्जरलैण्‍ड जाकर धन का प्रबंधन करना पड़ा, लेकिन टीम अन्‍ना कुछ नहीं बोली। हो सकता है कि इससे विषयान्‍तर हो जाता, लेकिन क्‍या भर्त्‍सना भी नहीं की जा सकती।

- अन्‍ना ने कांग्रेस के ही तीन हथियार काम में लिए हैं। तिरंगा, गांधी टोपी और खुद गांधी। हर बार सरकार नहीं बदले जाने की बात कही है।

ये सभी तथ्‍य मिलकर एक बड़े नाटक के खेले जाने, वर्तमान सरकार के मुखिया को अयोग्‍य घोषित करने, कालेधन के मुद्दे को नेपथ्‍य में ले जाने, दूसरी पार्टियों (कांग्रेस के अलावा) को नुकसान पहुंचाने, राहुल गांधी का 2014 के चुनावों के लिए प्रोजेक्‍शन करने का आधार बनाते नजर आते हैं।

अब अगर अन्‍ना के आंदोलन के अगले चरण में राहुल गांधी निर्णायक भूमिका में बाहर आते हैं तो यह बात सिद्ध होगी, अगर कांग्रेस की सत्‍ता अल्‍पसंख्‍यक कार्ड और मनरेगा के साथ जातिगत वोटों को लेकर वापस भी आ जाती है तो देश खुद को ठगा हुआ महसूस करेगा। दुख की बात यह है कि लुंज पुंज विपक्ष भी विकल्‍प पेश नहीं कर पा रहा है।

हे भगवान...

रविवार, 4 सितंबर 2011

गुरु के बारे में... कुछ

गुरु, शिक्षक, पथ प्रदर्शक और ऐसे ही सैकड़ों नाम उस इंसान को दिए गए हैं जो हमारी जिंदगी का मार्ग प्रशस्‍त करता है। एक व्‍यक्ति के लिए उसे अपना गुरु मिल जाने से बेहतर और कोई नहीं है।

vyasaमैं पहले भी एक बार उल्‍लेख कर चुका हूं, लेकिन शिक्षक दिवस के उपलक्ष्‍य में एक बार फिर उन गुरुओं का स्‍मरण करते हुए मैं दोहराना चाहूंगा.. हालांकि जिंदगी का शुरूआती ज्ञान देने वाली माता होती है, और वही हमारी प्रथम शिक्षक होती है, फिर भी सामाजिक जीवन के लिए शिक्षा देने के लिहाज से गुरु चार प्रकार के होते हैं..

.................................................................................

अध्‍यापक: जो हमें शिक्षा का आरम्भिक ज्ञान देते हैं। ये शिक्षक क, ख, ग, घ, ड़ या ए, बी, सी, डी जैसे अक्षर ज्ञान, पढ़ने का तरीका और ऐसे ही शुरूआती ज्ञान से अवगत कराते हैं। आज के दौर में ऐसे शिक्षकों को प्राइमरी स्‍कूल टीचर कहा जाता है। नर्सरी से आठवीं कक्षा तक हम ऐसा ही शुरूआती ज्ञान प्राप्‍त करते हैं।

श्रोत्रिय : हमें आगामी जीवन में काम आने वाले विशिष्‍ट विषयों के बारे में विस्‍तार से किताबी जानकारी देते हैं। अब तक गुरुओं और ऋषियों द्वारा संचित ज्ञान श्रोत्रिय अपने शिष्‍यों पहुंचाते हैं। आज के दौर में माध्‍यमिक, उच्‍च माध्‍यमिक, कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्‍तर के शिक्षकों को श्रोतिय की श्रेणी में रखा जा सकता है। अब अंतर इतना है कि ऋषियों द्वारा अर्जित ज्ञान छात्रों तक पहुंचाने के बजाय बोर्ड और यूनिवर्सिटी द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम छात्रों तक पहुंचाने का उपक्रम होता है।

उपाध्‍याय : हमें अर्जित किए गए किताबी ज्ञान को दैनिक जीवन में उपयोग की विधियों के बारे में बताते हैं। वास्‍तव में किताबी ज्ञान और वास्‍तविक जिंदगी में कुछ अंतर होता है। समय के साथ यह अंतर भी बढ़ता जाता है। इस अंतर को समझाने और ज्ञान के व्‍यवहारिक उपयोग के लिए उपाध्‍याय ही शिष्‍यों को अपडेट करते हैं। आज के दौर में साइंटिस्‍ट, मैनेजमेंट गुरु और कुछ विश्‍वविद्यालयी शिक्षक निजी तौर यह प्रयास करते हैं, वरना इंजीनियरिंग और शिक्षा की दूसरी फैकल्‍टी से निकल रहे छात्र इंडस्‍ट्री के लिए उतने उपयोगी नहीं सिद्ध हो पा रहे हैं, क्‍योंकि वर्तमान शिक्षा व्‍यवस्‍था में उपाध्‍याय की उपादेयता करीब करीब समाप्‍त बता दी गई है।

आचार्य : शिक्षकों की शृंखला में यह आखिरी कड़ी है। पर मजे की बात यह है कि ये शिक्षक अपने शिष्‍यों को कुछ भी नहीं सिखाते हैं। शिष्‍य अपने आचार्य के साथ ही रहता है। आचार्य का आचरण ही शिष्‍य के लिए शिक्षा होता है। आचार्य के आचरण को सीख लेने के बाद शिष्‍य पारंगत हो जाता है। आज के दौर में आचार्य नहीं है। शिक्षक खुद निर्णय करें कि वे आचार्य की पदवी पर बैठने के कितने अधिकारी हैं।

------------------------------------------------------------------------------

हालांकि शिक्षक दिवस शिक्षकों का सम्‍मान किए जाने का दिन है, लेकिन शिक्षकों के क्रूर विश्‍लेषण का दायित्‍व भी स्‍वयं शिक्षकों का है। इस आत्‍मविश्‍लेषण से वे अगर बचने का प्रयास करेंगे तो न केवल स्‍वयं का नुकसान करेंगे, बल्कि राष्‍ट्र को अधिक नुकसान पहुंचाएंगे। क्‍यों न आज के दिन मेरी पोस्‍ट पर आने वाले शिक्षक अपना आत्‍मविश्‍लेषण करें। मैं खुद भी एक छात्र का शिक्षक हूं, सो मैं भी इसी प्रक्रिया से गुजर रहा हूं...

शब्‍दकोष में शिक्षक 

हरदेव बाहरी बताते हैं - शिक्षक- सं (पु.) विद्या या ज्ञान सिखाने वाला व्‍यक्ति (जैसे राजनीतिक शिक्षक, कला शिक्षक) 2 अध्‍यापक 3 गुरु

विकीपीडिया के अनुसार - A teacher (or, in the US, educator) is a person who provides education for pupils (children) and students (adults). The role of teacher is often formal and ongoing, carried out at a school or other place of formal education. In many countries, a person who wishes to become a teacher must first obtainspecified professional qualifications or credentials from a university or college. These professional qualifications may include the study of pedagogy, the science of teaching. Teachers, like other professionals, may have to continue their education after they qualify, a process known as continuing professional development. Teachers may use a lesson plan to facilitate student learning, providing a course of study which is called the curriculum. A teacher's role may vary among cultures. Teachers may provide instruction in literacy and numeracy, craftsmanship or vocational training, the arts,religion, civics, community roles, or life skills. A teacher who facilitates education for an individual may also be described as a personal tutor, or, largely historically, a governess. In some countries, formal education can take place through home schooling. Informal learning may be assisted by a teacher occupying a transient or ongoing role, such as a family member, or by anyone with knowledge or skills in the wider community setting. Religious and spiritual teachers, such as gurus, mullahs, rabbis, pastors/youth pastors and lamas, may teach religious texts such as the Quran, Torahor Bible.

मुफ्त डिक्‍शनरी कहती है - One who teaches, especially one hired to teach. (Business / Professions) a person whose occupation is teaching others, esp children. tuition - First meant taking care of something, then teaching or instruction, especially for a fee.

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

आखिर मुझसे ही सवाल पूछ लिया :)

पीटर आंसर्स डॉट कॉम वेबसाइट सभी सवालों के जवाब दे रही है और इतने सटीक जवाब दे रही है कि हम सब लोग आश्‍चर्यचकित हैं।

मेरे भांजे ने कल रात फोन करके मुझे यह जानकारी दी। मैं बहुत साल पहले इस वेबसाइट के बारे में सुन चुका था, लेकिन तब मैंने सुनकर अनसुना कर दिया था। इस बार मैंने सोचा कि चलो वेबसाइट को आजमाकर आते हैं। सो पहुंच गए वेबसाइट पर। वहां सवालों का सिलसिला तो शुरू हुआ, लेकिन पीटर बाबा मौन हो गए। हर बार सवाल पूछने पर उन्‍होंने अलग अलग जवाब दिए। इनमें से कुछ जवाब इस तरह थे .

- आपके इस सवाल का जवाब मैं बाद में दूंगा।

- आपके सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है।

- निजी सवाल मत पूछिए।

- आपका सवाल सही फार्मेट में नहीं है।

 

और आखिर में वही हुआ जिसका मुझे डर था, पीटर बाबा ने जवाब देने के बजाय सवाल ही पूछना शुरू कर दिया Smile 

 

उन्‍होंने कुछ सवाल मुझसे पूछे उनमें से एक सवाल को मैंने कैप्‍चर किया है। मुलाहिजा गौर फरमाइए...

peter Q me

पीटर बाबा ने पूछा क्‍या तुम मुझ पर विश्‍वास करते हो?

जवाब का कोई बक्‍सा बना हुआ नहीं है वरना मैं कहता नहीं, कदापि नहीं...

रविवार, 3 जुलाई 2011

लोकतंत्र की लाश पर लोकतंत्र की रक्षा

कल अजीत फाउण्‍डेशन की लाइब्रेरी गया था। वहां जयप्रकाश नारायण की जेल डायरी मिली। किताबों को खांमखां उलटने पलटने की प्रवृत्ति ने यहां भी जोर मारा। डायरी का पहला ड्राफ्ट पढ़ा तो लगा कि जैसे आज की ही बात की जा रही है। आज से 36 साल पहले कमोबेश यही परिस्थितियां और इन्‍हीं मांगों के साथ बिहार में शुरू हुआ छात्र आंदोलन जेपी के नेतृत्‍व में इतना उग्र हो गया कि केन्‍द्र सरकार के गिरने की नौबत आ गई। आज फिर उन्‍हीं मुद्दों पर एक बार फिर केन्‍द्र सरकार घिरी हुई है। हालांकि इस बार कोई जननेता नहीं बन पा रहा है और न ही फिलहाल आपातकाल लागू करने की स्थिति बनी है, लेकिन आंदोलन के दमन का कांग्रेस का वही रवैया है। मैं यहां डायरी के कुछ अंश दे रहा हूं।

वर्ष 1975 में राजपाल एण्‍ड संस द्वारा प्रकाशित इस डायरी के अंश साभार...

जेल डायरी

21 जुलाई 1975

“लोकतंत्र की प्रक्रिया में मैं पूरी तरह जनता को निरन्‍तर साथ लेकर चलने का यत्‍न करता रहा हूं। इसके दो तरीके हैं। एक, हमें किसी ऐसे तंत्र की व्‍यवस्‍था करनी चाहिए जिसके माध्‍यम से उम्‍मीदवारों को चुनते समय हम जनता से परामर्श प्राप्‍त कर सकें। दूसरे, पहले तरीकों की भांति तंत्र की व्‍यवस्‍था करके जिसके माध्‍यम से जनता अपने प्रतिनिधियों पर निगरानी रख सके और उनके ईमानदारी के साथ काम करने की मांग कर सके। यही वे दो मूल तत्‍व थे जो मैं बिहार के इस संघर्षपूर्ण आंदोलन से प्राप्‍त करना चाहता था और आज यहां (वे चण्‍डीगढ़ के एक अस्‍पताल में कैद थे) मैं लोकतंत्र के हनन के साथ अपनी कल्‍पना का हनन होते देख रहा हूं।”

“प्रधानमंत्री (पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी) ने लोकतंत्र की हत्‍या करने और अपने तानाशाही शासन के शिकंजे में कसने के लिए क्‍या कदम उठाए हैं, उन्‍हें फिर से गिनाने की आवश्‍यकता नहीं है। यही वही प्रधानमंत्री है जो बार बार हम  पर लोकतंत्र को तबाह करने और फासिस्‍टवाद स्‍थापित करने का आरोप लगाती रही हैं और हम देखते हैं कि वही प्रधानमंत्री लोकतंत्र को तबाह कर रही है (देश में आपातकाल लागू हो चुका था) और उसी लोकतंत्र के नाम पर स्‍वयं फासिस्‍टवाद स्‍थापित कर रही हैं। अपने हाथों से लोकतंत्र का गला घोंटकर ओर लोकतंत्र की लाश को नीचे गहरी कब्र में दफनाकर वह लोकतंत्र की रक्षा कर रही है।”

6 अगस्‍त 1975

जिसकी संभावना (आशंका) थी वही हुआ। उच्‍च न्‍यायालय द्वारा संभवत: विपरीत निर्णय लिए जाने के विरुद्ध श्रीमती गांधी ने लोक प्रतिनिधित्‍व अधिनियम में संशोधन कराकर अपने आपको सुरक्षित कर लिया है। भारी संवैधानिक संशोधन होने की संभावना है। यह सब-कुछ स्‍वयं नियुक्‍त देश उद्धारक के लिए तानाशाही पूरा करने के लिए है। और यह कहा जा सकता है कि यह सब कुछ संविधान के अनुरूप किया जा रहा है। हिटलर ने भी अपनी निर्णायक तानाशाही को कायम करने के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया था। क्‍या भारत को भी नरक में इसी तरह जाना है और फिर अंधकार से निकलना होगा? अब यह निश्चित दिखाई देता है किंतु भारत को इसके लिए जो मूल्‍य चुकाना होगा, वह बहुत महंगा होगा। ईश्‍वर इसकी सहायता करे।

7 अगस्‍त 1975

सम्‍पूर्ण क्रांति के बजाय हम विपरीत क्रांति के काले बादलों को देखते हैं। चारों ओर जिन उल्‍लू और गीदड़ों के चिल्‍लाने और गुर्राने की आवाजें हम सुनते हैं, उनके लिए यह दावत का दिन है। चाहे रात कितनी भी गहरी क्‍यों न हो, सुबह अवश्‍य होगी।

डायरी के बाकी हिस्‍से आगामी पोस्‍टों में देने की कोशिश करूंगा...

 

सर्च रिजल्‍ट

- भ्रष्‍टाचार पर गूगल बाबा ने About 3,860,000 results (0.17 seconds)  सर्च रिजल्‍ट बताए।

- "कांग्रेस भ्रष्‍टाचार" पर कुल 7,090 results (0.14 seconds)  सर्च रिजल्‍ट आए। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

- "रामदेव भ्रष्‍टाचार" पर 17,900 results (0.26 seconds) सर्च रिजल्‍ट मिले। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

- “कालाधन” शब्‍द के लिए कुल 220,000 results (0.15 seconds)  सर्च रिजल्‍ट मिले।

- "कांग्रेस काला धन" पर 1,960 results (0.13 seconds) सर्च रिजल्‍ट मिले। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

परिणाम - देश को इससे मतलब नहीं है कि विदेशी बैंकों में पड़ा काला धन किसका है, या कांग्रेस की इसमें क्‍या भूमिका है। इसके बजाय काले धन को देश में वापस लाने पर सभी एक राय है। दूसरी बात केवल काला धन वापस देश में लाना ही काफी नहीं होगा, भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने की मंशा आम भारतीय और मीडिया में अधिक बलवती है।

 

डिस्‍क्‍लेमर : मैंने अपने गूगल क्रोम एक्‍स्‍प्‍लोरर में से कुकीज और ब्राउजिंग डाटा साफ करने के बाद यह परिणाम हासिल किए हैं। इसके बावजूद अन्‍य ब्राउजर पर डाटा में कुछ बदलाव हो सकता है। सभी सर्च परिणाम हिन्‍दी के हैं अंग्रेजी के परिणाम अलग असर पैदा कर सकते हैं।

सोमवार, 20 जून 2011

नया रूप-रंग

मद्धम होते सितारों की  छांव में

ढलते चांद ने एक बार फिर

झूठा दिलासा दिया,

कल फिर मिलेंगे

तब मेरा यही रूप

और यही रंग होगा।

जेठ की गर्मी

नागौरण की तपिश

और लू से बेखबर

मैं सपने लेता रहा दिन में

रात को तारों की छांव में

चुपके से आए चांद ने फिर

दिखाया नया रूप, नया रंग

एक बार फिर मैं उसे

अपलक देखता रह गया...