शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

माइक्रो कचौरी - मेडिकेटेड है भाई...

बीकानेर के लोगों को खाने, खिलाने और विशिष्‍ट खाद्य उत्‍पादों का ऐसा शौक है कि पूछिए मत। खाने के मामले में मैं खुद भी कोई अपवाद नहीं हूं। अगर आप बीकानेर से बाहर के हैं तो आपने भुजिया के दो या तीन टेस्‍ट लिए होंगे, लेकिन बीकानेर में क्षेत्र और हलवाई की खासियतों के हिसाब से सौ से अधिक तरह के भुजिया बनते हैं, और हां, खाने के शौकीन लोग थोड़े से भुजिया चखकर बता सकते हैं कि आप कौनसी दुकान से भुजिया लाए हैं... इस पर पूरी किताब हो सकती है, लेकिन अभी बात मेडिकेटेड कचौरी की...

सुनने में ऐसा लगता है कि कचौरी बनाने के बाद उसका स्‍टरलाइजेशन किया गया होगा, लेकिन वास्‍तव में ऐसा नहीं है। संभाग के सबसे बड़े अस्‍पताल प्रिंस बिजय सिंह मैमोरियल अस्‍पताल के पास एक बाबा है, कचौरी वाला। अपेक्षाकृत कम मसाले, नमक और तेल भी कम (? पता नहीं कैसे) वाली कचौरी बनाता है। इसकी ढेरों कचौरियां खाने से चिकित्‍सक भी परहेज नहीं करते। दो सौ से अधिक चिकित्‍सकों और करीब एक हजार स्‍टाफ वाले अस्‍पताल में लंच टाइम में चाय के साथ हर कहीं बाबे की कचौरी मिल जाएगी। इसकी कीमत महज एक रुपया है, कीमत कम होने का खामियाजा कचौरी को ही भुगतना पड़ता है, अपने साइज के साथ कांप्रोमाइज करके। आप खुद ही देख लीजिए...

kachori

मेरी अंगुली और अंगूठे के बीच में कचौरी ही है। वर्ष 1995 में मैंने पहली बार यह कचौरी खाई तो यह 50 पैसे में मिलती थी, इसके बाद कीमत बढ़ाई गई और लोगों ने सहर्ष बढ़ी हुई कीमत को स्‍वीकार किया, लेकिन अब पिछले दस साल से बाबा कचौरी का साइज छोटा और छोटा होता गया और अब इस वर्तमान स्‍वरूप में पहुंच गई है। मैंने बाबे से कहा कि अब भाव दोगुना कर दो, यानी दो रुपया, लेकिन बाबा ने मना कर दिया, बोले सामने वाले लूट खाएंगे ग्राहकों को... बात उलझ गई।

दरअसल इस माइक्रो इकोनॉमी में कुछ ऐसे तत्‍व घुस आए हैं तो क्‍वालिटी और साफ सफाई से समझौता कर बाबे की कचौरी जैसी ही दिखने वाली कचौरियां बनाने लगे हैं। घटिया तेल, घटिया मैदा, घटिया मसाले इस्‍तेमाल कर ये लोग बाबे की क्रेडिट को भुना रहे हैं। अब जब तक बाबा अपनी कचौरी की कीमत को कम रखेगा, ये लोग अधिक नुकसान नहीं कर पाएंगे, इसके चलते बाबा ने कचौरी की कीमत को कम ही बना रखा है। पिछले तीन सालों में महंगाई बढ़कर दोगुनी से अधिक हुई तो कचौरी का साइज भी आधे से कम हो गया है। पता नहीं यह सूक्ष्‍य इकोनॉमी कितनी सूक्ष्‍म हो पाएगी।

वैसे आजकल आता क्‍या है एक रुपए में, बीकानेर के लोग कह सकते हैं एक स्‍वादिष्‍ट कचौरी... Smile 

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

एसएमएस के जरिए करोड़ों कमाएं

अगर आप एसएमएस करते हैं तो कुछ खोते हैं,  लेकिन पाते हैं तो यह धन कमाने का अच्‍छा जरिया है। कुछ लोग कमा भी रहे हैं, कितना ?

अरे करोड़ों में.... Smile  आप खुद ही देख लीजिए...

Every body is in temptation of earning 1 lac &  3 lac do this sms business but surprisingly you are not selected because you are not in their selection list even you send correct & fastest SMS. you have no time to track this & keep on trying ,trying,thinking that........... thik hai  panch rupiya per episod kuch nahi hai........ jane do.yar Pl pass on this msg to your friends Regards

Stop Spoiling & Wasting your money and stop SMS-ing to KBC or the OTHER TV CONTESTs

We all know KBC is Good Business.
But have you ever pondered...
How Good....????

Any guesses? Let's see...

Airtel, Idea & All other subscribers are charging Rs.5/- per SMS sent for this contest.
India have States: 28, Union Territories: 7, Districts: 640,
Population =1,210,193,422 (Survey On March 1, 2011),

Average Districts population is 18, 00,000
82,69,30,000 (82 Crore) Mobile User &

Telephone Subscribers (Wireless and Landline): 861480000 (86 Crore) (Apr’2011)
[Land Lines: 34550000 (3 Crore) (Apr’2011), Mobile Cell phones: 82,69,30,000 (82 Crore) (Spr’2011)]

Assuming 1% person are making call to KBC

5Rs/SMS X 8269300 (82Lac, 0.82 Crore) = Rs. 4,10,00,000 (4.1Crores)

4.1Crore in 20 minutes.
(People trying for the 2 Lac cash prize)

Imagine what if 10% person entries try out than it will be 41 Crores

And it does not stop there...

In practice it could be another multiple of 100 or a multiple of 1000 on an average.

In that case it is 4.1 x 30episode = 123 crores earnings in just 20 minutes on every episode!!!
So Total per month income from this KBC season is 123 crores from episode and 1230 crores from (People trying for the 2 Lac cash prize.) = 1353 Crores per months

And the prize money: A mere 2 crores...
(And from whose pocket?)

Smart Business by Siddharth Basu!

And the best part of this calculation is just the SMS earning!!

What about the Ad money?

A rough annual profit calculation goes like this:
Rs. 1353 Crores per months X 12 = Rs. 16263 Crores annually

Let even 50% get dissolved in taxes and other payments of mobile company, still you will be left with

Rs. 8118-crores profit!!! (Only from SMS)

Simple Question:
"KAUN BANEGA CROREPATI”
And your options are---

A) SONY TV
B) AIRTEL, IDEA, AND OTHER MOBILE COMPANY
C) AMITABH BACHAN
D) SIDDHARTH BASU
Computerji iska jawab bataiye....

Ans: All FOUR..!!!!
PS: Now you know why AB gets all emotional when the episodes end...........

So friends please ...... stop Spoiling & Wasting your money and stop SMSing to KBC or the OTHER TV/FM Radio  CONTESTs........... for such

Please Care for Your Money in this inflation & price high

अब क्‍या कहें कुछ दिन पहले घर बैठे चार लाख रुपए पाने के चक्‍कर में एक एसएमएस किया था, तब से गिल्‍टी हो रही थी, आज यह मेल मिली तो सोचा चस्‍पां कर ही दें... क्‍यों दूसरों को मूर्ख बनने दें..

रविवार, 25 सितंबर 2011

दो बहुत शानदार ब्‍लॉग

2007 से ब्‍लॉगिंग में सक्रिय हूं। कई दिन तक अकेले लिखते लिखते आखिर लगा कि मैं अकेला ही क्‍यों पीडि़त रहूं, सो अपनी जमात बढ़ाने की कोशिश करने लगा। हालांकि अकेले लिखने के कुछ फायदे भी हैं, मसलन मेरे एक भाईसाहब गूगल में डिस्टिंगुइश इंजीनियर हैं। अमरीका से कुछ दिन के लिए बीकानेर आए, मैं मिलने के लिए पहुंचा तो बोले कि तुम्‍हारा ब्‍लॉग पढ़ता रहता हूं। आप यकीन नहीं कर सकते कि मेरी खुशी का क्‍या ठिकाना रहा होगा। मैंने पूछा आपको कैसे पता, दुनिया में लाखों ब्‍लॉग हैं फिर आपको मेरा ब्‍लॉग कैसे मिला, उन्‍होंने जवाब दिया कि बीकानेर में ब्‍लॉग लिखने वाले और उनमें भी हिन्‍दी लिखने वाले बहुत कम है (यह वर्ष 2008 की बात है)

हालांकि एकछत्र राज्‍य का आनन्‍द ही अलग है फिर भी यह कसक थी कि अकेला भुगत रहा हूं सो अपनी जमात बढ़ाने के प्रयास करता रहा। पिछले दिनों दो ऐसे लोगों को जमात में शामिल कर लिया है जो धुरंधर लिक्‍खाड़ हैं और अब तक नेट के इस माध्‍यम को पेचकस से अधिक उपयोगी नहीं मान रहे थे। मैंने इस टूल का नया आयाम उन्‍हें पकड़ाने का प्रयास किया है। एक ने बिना नाम तो दूसरे ने अपने नाम के साथ लिखने पर हामी भरी है और यकीन मानिए शानदार लिख रहे हैं।

 पहला ब्‍लॉग है नचिकेता का (इन्‍होंने इसी नाम से लिखने की ठानी है)। यम और नचिकेता संवाद पर आधारित यह ब्‍लॉग नचिकेता  के लेखक भारतीय राजनीति पर अच्‍छी पकड़ रखते हैं। इस ब्‍लॉग में वे लगातार भीषण व्‍यंग्‍य लिख रहे हैं। अब नाम किसी को पता नहीं है तो जमकर पिलाई कर रहे हैं नेताओं की और व्‍यवस्‍था की। आप भी देखिए।

 

जिनेश जैन (यह लिंक है)

दूसरा ब्‍लॉग है राजस्‍थान पत्रिका के संपादकीय प्रभारी जिनेश जैन का। उन्‍होंने अपने ही नाम से ब्‍लॉग बना लिया है और लिखना शुरू किया है। एक बार पत्रिका ऑफिस में रात दो बजे हमारी बाचतीत के दौरान यह निर्णय हुआ कि एक बाहरी व्‍यक्ति बीकानेर को कैसे देखता है और उसकी तुलना अगर देश के अन्‍य शहरों (जहां जिनेश जैन रह चुके हैं) की तुलना में यह कैसे लगता है, इस पर एक पूरा ब्‍लॉग हो और समय के साथ इसमें नए लेख जुड़ते जाएं। उन्‍होंने अब तक कुल जमा पांच पोस्‍ट लिखी है, लेकिन हर एक पोस्‍ट बीकानेर के बारे में विस्‍तार से जानकारी देती है और यह भी कि यह शहर चंडीगढ़, बीकानेर, कानपुर, भोपाल या देश के कई दूसरे शहरों की तुलना में कैसे अलग है।

रविवार, 11 सितंबर 2011

मैं अन्‍ना पर भरोसा करता हूं, लेकिन...

हालांकि जन लोकपाल बिल आने और उसके जमीनी तौर पर लागू होने में अभी बहुत समय बाकी है, लेकिन आम आदमी के चेहरे पर संतोष का भाव अभी से दिखाई देने लगा है। क्‍योंकि अन्‍ना उसके साथ है, अन्‍ना मेरे साथ है। जो व्‍यक्ति आज मुझसे जबरन भ्रष्‍टाचार के पैसे ले रहा है, कल वह मेरे समक्ष नतमस्‍तक खड़ा होगा और मैं फिर से मिमियाने के बजाय लोकतंत्र की पुख्‍ता जमीन पर सीना तानकर खड़ा होउंगा। मुझे अन्‍ना पर गर्व है... लेकिन....

कुछ सवाल पिछले कुछ दिन से मुझे परेशान करने लगे हैं। अखबारों, समाचार चैनलों और सूचना के अन्‍य माध्‍यमों के इतर नेट पर मैंने कुछ सवाल देखे, वह विचलित कर देने वाले लगते हैं, हालांकि अब भी मैं अन्‍ना और उनकी टीम को संदेह के घेरे में नहीं लेता, पर कहीं भविष्‍य में यह नूरा कुश्‍ती सिद्ध हुई तो सवा अरब भारतियों के साथ मैं भी गहरे अवसाद में चला जाउंगा। हो सकता है खुद ही भ्रष्‍टाचार के नए कीर्तीमान स्‍थापित करने लगूं। मेरा ईश्‍वर मुझे इसकी अनुमति नहीं देता, पर गीता में कृष्‍ण यह कहकर कि 'विवेक के अनुसार जो सही है वही सही है' मुझे भ्रष्‍टाचार का रास्‍ता अपनाने का विवेक दे देते हैं।

कुछ सवाल जिन पर अन्‍ना और उनकी टीम को जवाब देना ही चाहिए। हालांकि पूर्व में इस बारे में नेट पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन जिन सवालों ने मेरी श्रद्धा को विचलित किया उन पर तो मुझे चर्चा करनी ही होगी। ये सवाल हैं....

- रेलवे एक्‍सीडेंट से लेकर क्रिकेट मैच के स्‍कोर तक के बीच में विज्ञापन दिखाने वाली मीडिया ने बिना कमर्शियल विज्ञापनों के अन्‍ना के आंदोलन का निर्बाध प्रसारण किया... मीडिया कंपनियों ने इस घाटे को कैसे सहन किया?

- विशेषाधिकार हनन का नोटिस देने वाले सांसद को दिल्‍ली बम विस्‍फोट के बाद अचनाक ब्रह्मज्ञान हुआ और उसने विस्‍फोट के अगले ही दिन अपना प्रस्‍ताव वापस ले लिया।

- खुद के संपत्ति नहीं होने और सारी संपत्ति अपने ही ट्रस्‍ट को दान करने वाले अरविन्‍द केजरीवाल इनकम टैक्‍स विभाग से छूट मांग रहे हैं, और साथ में झूठ भी बोल रहे हैं। बाद में वे अपनी बात से मुकर जाते हैं, और कहते हैं कि इस प्रकरण का आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है। मैं भी यही मानता हूं, लेकिन इसका सीधा संबंध उस व्‍यक्ति के चरित्र से है, जो आंदोलन के प्रणेताओं में से एक होने का मान रखता है।

- अन्‍ना को अनशन करने के लिए जेपी पार्क दिया गया था, वहां उन्‍हें अनशन नहीं करने दिया गया और तिहाड़ जेल भेज दिया गया (कानून का हवाला देकर)। बाद में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अन्‍ना तीन दिन बिना किसी नियम और कानून के तिहाड़ जेल के अतिथि बने रहे और बाहर लोग और मीडिया डटे रहे। संवेदनशील इलाके को खाली कराने के लिए न राज्‍य सरकार ने कुछ किया न केन्‍द्र ने।

- भ्रष्‍टाचार के मुद्दे का जातिवाद से कोई लेना देना नहीं है। इसके बावजूद आंदोलन में ट्विस्‍ट लाने के लिए कुल जमा 35 मुसलमानों को आंदोलन स्‍थल पर लाया गया और नमाज पढ़वाई गई। क्‍या इसकी जरूरत थी। अगर थी भी तो उन्‍हें मंच के समक्ष नमाज पढ़वाने का नाटक क्‍यों किया गया।

- गुजराज के लोकायुक्‍त पद पर नियुक्‍त किए गए सेवानिवृत्त जज के नैतिक आचरण पर सालों पहले से कई सवाल उठते रहे हैं। यह व्‍यक्ति कांग्रेस के मीडिया प्रकोष्‍ठ में एक बाबू की हैसियत से दस साल से अधिक समय तक काम करता रहा, फिर राजनैतिक हैसियत का लाभ उठाकर उच्‍च न्‍यायालय का न्‍यायाधीश बना और अब उसे लोकायुक्‍त बनाया गया है। केवल पैसे खाना ही भ्रष्‍टाचार नहीं है, आचरण भी इसमें शामिल है। अप्रेल में आंदोलन के बाद मई माह में अन्‍ना हजारे इस लोकायुक्‍त के घर पर ठहरे थे। इस तथ्‍य ने मुझे अधिक चिंता में डाला...

- अरविन्‍द केजरीवाल ने अपने ही विभाग से मिले नोटिस को राष्‍ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास किया, इसके लिए बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की और लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास किया।

- अरुणा राय और दूसरे साथी जिन्‍होंने सूचना का अधिकार कानून को पास कराने के लिए पहले दौर में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया, इस बार उन्‍हें उपेक्षित रखा गया। क्‍या वे राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व के लायक नहीं हैं।

- केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के रेलवे स्‍टेशन पर सोते हुओं के चित्र नेट पर जारी किए गए। क्‍या इस तरह के मीडिया कैंपेन की जरूरत थी।

- राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि अन्‍ना और उनकी टीम की ओर से किए जा रहे इस आंदोलन की वे कड़े शब्‍दों में निंदा करते हैं, क्‍या टीम अन्‍ना के पास उनके लिए कोई जवाब नहीं था।

- बुखारी ने कहा कि मुस्लिम आंदोलन के साथ नहीं है, टीम अन्‍ना जो सरकार के हर कैल्‍कुलेटेड वार का जवाब देती रही, बुखारी के लिए एक भी शब्‍द नहीं मिला।

- आखिरी सवाल, भ्रष्‍टाचार के मुद्दे के साथ जुड़ी दो चीजों को सफाई से दरकिनार कर दिया गया है, एक भारत माता का चित्र और दूसरा बाबा रामदेव। बाबा की कई कमियां रही होंगी, लेकिन क्‍या उन्‍हें आंदोलन से अलग किया जा सकता है। एक साल तक बाबा पूरे देश में घूमकर काले धन की रट लगाता रहा, सोनिया गांधी को स्विट्जरलैण्‍ड जाकर धन का प्रबंधन करना पड़ा, लेकिन टीम अन्‍ना कुछ नहीं बोली। हो सकता है कि इससे विषयान्‍तर हो जाता, लेकिन क्‍या भर्त्‍सना भी नहीं की जा सकती।

- अन्‍ना ने कांग्रेस के ही तीन हथियार काम में लिए हैं। तिरंगा, गांधी टोपी और खुद गांधी। हर बार सरकार नहीं बदले जाने की बात कही है।

ये सभी तथ्‍य मिलकर एक बड़े नाटक के खेले जाने, वर्तमान सरकार के मुखिया को अयोग्‍य घोषित करने, कालेधन के मुद्दे को नेपथ्‍य में ले जाने, दूसरी पार्टियों (कांग्रेस के अलावा) को नुकसान पहुंचाने, राहुल गांधी का 2014 के चुनावों के लिए प्रोजेक्‍शन करने का आधार बनाते नजर आते हैं।

अब अगर अन्‍ना के आंदोलन के अगले चरण में राहुल गांधी निर्णायक भूमिका में बाहर आते हैं तो यह बात सिद्ध होगी, अगर कांग्रेस की सत्‍ता अल्‍पसंख्‍यक कार्ड और मनरेगा के साथ जातिगत वोटों को लेकर वापस भी आ जाती है तो देश खुद को ठगा हुआ महसूस करेगा। दुख की बात यह है कि लुंज पुंज विपक्ष भी विकल्‍प पेश नहीं कर पा रहा है।

हे भगवान...

रविवार, 4 सितंबर 2011

गुरु के बारे में... कुछ

गुरु, शिक्षक, पथ प्रदर्शक और ऐसे ही सैकड़ों नाम उस इंसान को दिए गए हैं जो हमारी जिंदगी का मार्ग प्रशस्‍त करता है। एक व्‍यक्ति के लिए उसे अपना गुरु मिल जाने से बेहतर और कोई नहीं है।

vyasaमैं पहले भी एक बार उल्‍लेख कर चुका हूं, लेकिन शिक्षक दिवस के उपलक्ष्‍य में एक बार फिर उन गुरुओं का स्‍मरण करते हुए मैं दोहराना चाहूंगा.. हालांकि जिंदगी का शुरूआती ज्ञान देने वाली माता होती है, और वही हमारी प्रथम शिक्षक होती है, फिर भी सामाजिक जीवन के लिए शिक्षा देने के लिहाज से गुरु चार प्रकार के होते हैं..

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अध्‍यापक: जो हमें शिक्षा का आरम्भिक ज्ञान देते हैं। ये शिक्षक क, ख, ग, घ, ड़ या ए, बी, सी, डी जैसे अक्षर ज्ञान, पढ़ने का तरीका और ऐसे ही शुरूआती ज्ञान से अवगत कराते हैं। आज के दौर में ऐसे शिक्षकों को प्राइमरी स्‍कूल टीचर कहा जाता है। नर्सरी से आठवीं कक्षा तक हम ऐसा ही शुरूआती ज्ञान प्राप्‍त करते हैं।

श्रोत्रिय : हमें आगामी जीवन में काम आने वाले विशिष्‍ट विषयों के बारे में विस्‍तार से किताबी जानकारी देते हैं। अब तक गुरुओं और ऋषियों द्वारा संचित ज्ञान श्रोत्रिय अपने शिष्‍यों पहुंचाते हैं। आज के दौर में माध्‍यमिक, उच्‍च माध्‍यमिक, कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्‍तर के शिक्षकों को श्रोतिय की श्रेणी में रखा जा सकता है। अब अंतर इतना है कि ऋषियों द्वारा अर्जित ज्ञान छात्रों तक पहुंचाने के बजाय बोर्ड और यूनिवर्सिटी द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम छात्रों तक पहुंचाने का उपक्रम होता है।

उपाध्‍याय : हमें अर्जित किए गए किताबी ज्ञान को दैनिक जीवन में उपयोग की विधियों के बारे में बताते हैं। वास्‍तव में किताबी ज्ञान और वास्‍तविक जिंदगी में कुछ अंतर होता है। समय के साथ यह अंतर भी बढ़ता जाता है। इस अंतर को समझाने और ज्ञान के व्‍यवहारिक उपयोग के लिए उपाध्‍याय ही शिष्‍यों को अपडेट करते हैं। आज के दौर में साइंटिस्‍ट, मैनेजमेंट गुरु और कुछ विश्‍वविद्यालयी शिक्षक निजी तौर यह प्रयास करते हैं, वरना इंजीनियरिंग और शिक्षा की दूसरी फैकल्‍टी से निकल रहे छात्र इंडस्‍ट्री के लिए उतने उपयोगी नहीं सिद्ध हो पा रहे हैं, क्‍योंकि वर्तमान शिक्षा व्‍यवस्‍था में उपाध्‍याय की उपादेयता करीब करीब समाप्‍त बता दी गई है।

आचार्य : शिक्षकों की शृंखला में यह आखिरी कड़ी है। पर मजे की बात यह है कि ये शिक्षक अपने शिष्‍यों को कुछ भी नहीं सिखाते हैं। शिष्‍य अपने आचार्य के साथ ही रहता है। आचार्य का आचरण ही शिष्‍य के लिए शिक्षा होता है। आचार्य के आचरण को सीख लेने के बाद शिष्‍य पारंगत हो जाता है। आज के दौर में आचार्य नहीं है। शिक्षक खुद निर्णय करें कि वे आचार्य की पदवी पर बैठने के कितने अधिकारी हैं।

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हालांकि शिक्षक दिवस शिक्षकों का सम्‍मान किए जाने का दिन है, लेकिन शिक्षकों के क्रूर विश्‍लेषण का दायित्‍व भी स्‍वयं शिक्षकों का है। इस आत्‍मविश्‍लेषण से वे अगर बचने का प्रयास करेंगे तो न केवल स्‍वयं का नुकसान करेंगे, बल्कि राष्‍ट्र को अधिक नुकसान पहुंचाएंगे। क्‍यों न आज के दिन मेरी पोस्‍ट पर आने वाले शिक्षक अपना आत्‍मविश्‍लेषण करें। मैं खुद भी एक छात्र का शिक्षक हूं, सो मैं भी इसी प्रक्रिया से गुजर रहा हूं...

शब्‍दकोष में शिक्षक 

हरदेव बाहरी बताते हैं - शिक्षक- सं (पु.) विद्या या ज्ञान सिखाने वाला व्‍यक्ति (जैसे राजनीतिक शिक्षक, कला शिक्षक) 2 अध्‍यापक 3 गुरु

विकीपीडिया के अनुसार - A teacher (or, in the US, educator) is a person who provides education for pupils (children) and students (adults). The role of teacher is often formal and ongoing, carried out at a school or other place of formal education. In many countries, a person who wishes to become a teacher must first obtainspecified professional qualifications or credentials from a university or college. These professional qualifications may include the study of pedagogy, the science of teaching. Teachers, like other professionals, may have to continue their education after they qualify, a process known as continuing professional development. Teachers may use a lesson plan to facilitate student learning, providing a course of study which is called the curriculum. A teacher's role may vary among cultures. Teachers may provide instruction in literacy and numeracy, craftsmanship or vocational training, the arts,religion, civics, community roles, or life skills. A teacher who facilitates education for an individual may also be described as a personal tutor, or, largely historically, a governess. In some countries, formal education can take place through home schooling. Informal learning may be assisted by a teacher occupying a transient or ongoing role, such as a family member, or by anyone with knowledge or skills in the wider community setting. Religious and spiritual teachers, such as gurus, mullahs, rabbis, pastors/youth pastors and lamas, may teach religious texts such as the Quran, Torahor Bible.

मुफ्त डिक्‍शनरी कहती है - One who teaches, especially one hired to teach. (Business / Professions) a person whose occupation is teaching others, esp children. tuition - First meant taking care of something, then teaching or instruction, especially for a fee.