रविवार, 11 सितंबर 2011

मैं अन्‍ना पर भरोसा करता हूं, लेकिन...

हालांकि जन लोकपाल बिल आने और उसके जमीनी तौर पर लागू होने में अभी बहुत समय बाकी है, लेकिन आम आदमी के चेहरे पर संतोष का भाव अभी से दिखाई देने लगा है। क्‍योंकि अन्‍ना उसके साथ है, अन्‍ना मेरे साथ है। जो व्‍यक्ति आज मुझसे जबरन भ्रष्‍टाचार के पैसे ले रहा है, कल वह मेरे समक्ष नतमस्‍तक खड़ा होगा और मैं फिर से मिमियाने के बजाय लोकतंत्र की पुख्‍ता जमीन पर सीना तानकर खड़ा होउंगा। मुझे अन्‍ना पर गर्व है... लेकिन....

कुछ सवाल पिछले कुछ दिन से मुझे परेशान करने लगे हैं। अखबारों, समाचार चैनलों और सूचना के अन्‍य माध्‍यमों के इतर नेट पर मैंने कुछ सवाल देखे, वह विचलित कर देने वाले लगते हैं, हालांकि अब भी मैं अन्‍ना और उनकी टीम को संदेह के घेरे में नहीं लेता, पर कहीं भविष्‍य में यह नूरा कुश्‍ती सिद्ध हुई तो सवा अरब भारतियों के साथ मैं भी गहरे अवसाद में चला जाउंगा। हो सकता है खुद ही भ्रष्‍टाचार के नए कीर्तीमान स्‍थापित करने लगूं। मेरा ईश्‍वर मुझे इसकी अनुमति नहीं देता, पर गीता में कृष्‍ण यह कहकर कि 'विवेक के अनुसार जो सही है वही सही है' मुझे भ्रष्‍टाचार का रास्‍ता अपनाने का विवेक दे देते हैं।

कुछ सवाल जिन पर अन्‍ना और उनकी टीम को जवाब देना ही चाहिए। हालांकि पूर्व में इस बारे में नेट पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन जिन सवालों ने मेरी श्रद्धा को विचलित किया उन पर तो मुझे चर्चा करनी ही होगी। ये सवाल हैं....

- रेलवे एक्‍सीडेंट से लेकर क्रिकेट मैच के स्‍कोर तक के बीच में विज्ञापन दिखाने वाली मीडिया ने बिना कमर्शियल विज्ञापनों के अन्‍ना के आंदोलन का निर्बाध प्रसारण किया... मीडिया कंपनियों ने इस घाटे को कैसे सहन किया?

- विशेषाधिकार हनन का नोटिस देने वाले सांसद को दिल्‍ली बम विस्‍फोट के बाद अचनाक ब्रह्मज्ञान हुआ और उसने विस्‍फोट के अगले ही दिन अपना प्रस्‍ताव वापस ले लिया।

- खुद के संपत्ति नहीं होने और सारी संपत्ति अपने ही ट्रस्‍ट को दान करने वाले अरविन्‍द केजरीवाल इनकम टैक्‍स विभाग से छूट मांग रहे हैं, और साथ में झूठ भी बोल रहे हैं। बाद में वे अपनी बात से मुकर जाते हैं, और कहते हैं कि इस प्रकरण का आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है। मैं भी यही मानता हूं, लेकिन इसका सीधा संबंध उस व्‍यक्ति के चरित्र से है, जो आंदोलन के प्रणेताओं में से एक होने का मान रखता है।

- अन्‍ना को अनशन करने के लिए जेपी पार्क दिया गया था, वहां उन्‍हें अनशन नहीं करने दिया गया और तिहाड़ जेल भेज दिया गया (कानून का हवाला देकर)। बाद में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अन्‍ना तीन दिन बिना किसी नियम और कानून के तिहाड़ जेल के अतिथि बने रहे और बाहर लोग और मीडिया डटे रहे। संवेदनशील इलाके को खाली कराने के लिए न राज्‍य सरकार ने कुछ किया न केन्‍द्र ने।

- भ्रष्‍टाचार के मुद्दे का जातिवाद से कोई लेना देना नहीं है। इसके बावजूद आंदोलन में ट्विस्‍ट लाने के लिए कुल जमा 35 मुसलमानों को आंदोलन स्‍थल पर लाया गया और नमाज पढ़वाई गई। क्‍या इसकी जरूरत थी। अगर थी भी तो उन्‍हें मंच के समक्ष नमाज पढ़वाने का नाटक क्‍यों किया गया।

- गुजराज के लोकायुक्‍त पद पर नियुक्‍त किए गए सेवानिवृत्त जज के नैतिक आचरण पर सालों पहले से कई सवाल उठते रहे हैं। यह व्‍यक्ति कांग्रेस के मीडिया प्रकोष्‍ठ में एक बाबू की हैसियत से दस साल से अधिक समय तक काम करता रहा, फिर राजनैतिक हैसियत का लाभ उठाकर उच्‍च न्‍यायालय का न्‍यायाधीश बना और अब उसे लोकायुक्‍त बनाया गया है। केवल पैसे खाना ही भ्रष्‍टाचार नहीं है, आचरण भी इसमें शामिल है। अप्रेल में आंदोलन के बाद मई माह में अन्‍ना हजारे इस लोकायुक्‍त के घर पर ठहरे थे। इस तथ्‍य ने मुझे अधिक चिंता में डाला...

- अरविन्‍द केजरीवाल ने अपने ही विभाग से मिले नोटिस को राष्‍ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास किया, इसके लिए बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की और लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास किया।

- अरुणा राय और दूसरे साथी जिन्‍होंने सूचना का अधिकार कानून को पास कराने के लिए पहले दौर में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया, इस बार उन्‍हें उपेक्षित रखा गया। क्‍या वे राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व के लायक नहीं हैं।

- केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के रेलवे स्‍टेशन पर सोते हुओं के चित्र नेट पर जारी किए गए। क्‍या इस तरह के मीडिया कैंपेन की जरूरत थी।

- राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि अन्‍ना और उनकी टीम की ओर से किए जा रहे इस आंदोलन की वे कड़े शब्‍दों में निंदा करते हैं, क्‍या टीम अन्‍ना के पास उनके लिए कोई जवाब नहीं था।

- बुखारी ने कहा कि मुस्लिम आंदोलन के साथ नहीं है, टीम अन्‍ना जो सरकार के हर कैल्‍कुलेटेड वार का जवाब देती रही, बुखारी के लिए एक भी शब्‍द नहीं मिला।

- आखिरी सवाल, भ्रष्‍टाचार के मुद्दे के साथ जुड़ी दो चीजों को सफाई से दरकिनार कर दिया गया है, एक भारत माता का चित्र और दूसरा बाबा रामदेव। बाबा की कई कमियां रही होंगी, लेकिन क्‍या उन्‍हें आंदोलन से अलग किया जा सकता है। एक साल तक बाबा पूरे देश में घूमकर काले धन की रट लगाता रहा, सोनिया गांधी को स्विट्जरलैण्‍ड जाकर धन का प्रबंधन करना पड़ा, लेकिन टीम अन्‍ना कुछ नहीं बोली। हो सकता है कि इससे विषयान्‍तर हो जाता, लेकिन क्‍या भर्त्‍सना भी नहीं की जा सकती।

- अन्‍ना ने कांग्रेस के ही तीन हथियार काम में लिए हैं। तिरंगा, गांधी टोपी और खुद गांधी। हर बार सरकार नहीं बदले जाने की बात कही है।

ये सभी तथ्‍य मिलकर एक बड़े नाटक के खेले जाने, वर्तमान सरकार के मुखिया को अयोग्‍य घोषित करने, कालेधन के मुद्दे को नेपथ्‍य में ले जाने, दूसरी पार्टियों (कांग्रेस के अलावा) को नुकसान पहुंचाने, राहुल गांधी का 2014 के चुनावों के लिए प्रोजेक्‍शन करने का आधार बनाते नजर आते हैं।

अब अगर अन्‍ना के आंदोलन के अगले चरण में राहुल गांधी निर्णायक भूमिका में बाहर आते हैं तो यह बात सिद्ध होगी, अगर कांग्रेस की सत्‍ता अल्‍पसंख्‍यक कार्ड और मनरेगा के साथ जातिगत वोटों को लेकर वापस भी आ जाती है तो देश खुद को ठगा हुआ महसूस करेगा। दुख की बात यह है कि लुंज पुंज विपक्ष भी विकल्‍प पेश नहीं कर पा रहा है।

हे भगवान...

रविवार, 4 सितंबर 2011

गुरु के बारे में... कुछ

गुरु, शिक्षक, पथ प्रदर्शक और ऐसे ही सैकड़ों नाम उस इंसान को दिए गए हैं जो हमारी जिंदगी का मार्ग प्रशस्‍त करता है। एक व्‍यक्ति के लिए उसे अपना गुरु मिल जाने से बेहतर और कोई नहीं है।

vyasaमैं पहले भी एक बार उल्‍लेख कर चुका हूं, लेकिन शिक्षक दिवस के उपलक्ष्‍य में एक बार फिर उन गुरुओं का स्‍मरण करते हुए मैं दोहराना चाहूंगा.. हालांकि जिंदगी का शुरूआती ज्ञान देने वाली माता होती है, और वही हमारी प्रथम शिक्षक होती है, फिर भी सामाजिक जीवन के लिए शिक्षा देने के लिहाज से गुरु चार प्रकार के होते हैं..

.................................................................................

अध्‍यापक: जो हमें शिक्षा का आरम्भिक ज्ञान देते हैं। ये शिक्षक क, ख, ग, घ, ड़ या ए, बी, सी, डी जैसे अक्षर ज्ञान, पढ़ने का तरीका और ऐसे ही शुरूआती ज्ञान से अवगत कराते हैं। आज के दौर में ऐसे शिक्षकों को प्राइमरी स्‍कूल टीचर कहा जाता है। नर्सरी से आठवीं कक्षा तक हम ऐसा ही शुरूआती ज्ञान प्राप्‍त करते हैं।

श्रोत्रिय : हमें आगामी जीवन में काम आने वाले विशिष्‍ट विषयों के बारे में विस्‍तार से किताबी जानकारी देते हैं। अब तक गुरुओं और ऋषियों द्वारा संचित ज्ञान श्रोत्रिय अपने शिष्‍यों पहुंचाते हैं। आज के दौर में माध्‍यमिक, उच्‍च माध्‍यमिक, कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्‍तर के शिक्षकों को श्रोतिय की श्रेणी में रखा जा सकता है। अब अंतर इतना है कि ऋषियों द्वारा अर्जित ज्ञान छात्रों तक पहुंचाने के बजाय बोर्ड और यूनिवर्सिटी द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम छात्रों तक पहुंचाने का उपक्रम होता है।

उपाध्‍याय : हमें अर्जित किए गए किताबी ज्ञान को दैनिक जीवन में उपयोग की विधियों के बारे में बताते हैं। वास्‍तव में किताबी ज्ञान और वास्‍तविक जिंदगी में कुछ अंतर होता है। समय के साथ यह अंतर भी बढ़ता जाता है। इस अंतर को समझाने और ज्ञान के व्‍यवहारिक उपयोग के लिए उपाध्‍याय ही शिष्‍यों को अपडेट करते हैं। आज के दौर में साइंटिस्‍ट, मैनेजमेंट गुरु और कुछ विश्‍वविद्यालयी शिक्षक निजी तौर यह प्रयास करते हैं, वरना इंजीनियरिंग और शिक्षा की दूसरी फैकल्‍टी से निकल रहे छात्र इंडस्‍ट्री के लिए उतने उपयोगी नहीं सिद्ध हो पा रहे हैं, क्‍योंकि वर्तमान शिक्षा व्‍यवस्‍था में उपाध्‍याय की उपादेयता करीब करीब समाप्‍त बता दी गई है।

आचार्य : शिक्षकों की शृंखला में यह आखिरी कड़ी है। पर मजे की बात यह है कि ये शिक्षक अपने शिष्‍यों को कुछ भी नहीं सिखाते हैं। शिष्‍य अपने आचार्य के साथ ही रहता है। आचार्य का आचरण ही शिष्‍य के लिए शिक्षा होता है। आचार्य के आचरण को सीख लेने के बाद शिष्‍य पारंगत हो जाता है। आज के दौर में आचार्य नहीं है। शिक्षक खुद निर्णय करें कि वे आचार्य की पदवी पर बैठने के कितने अधिकारी हैं।

------------------------------------------------------------------------------

हालांकि शिक्षक दिवस शिक्षकों का सम्‍मान किए जाने का दिन है, लेकिन शिक्षकों के क्रूर विश्‍लेषण का दायित्‍व भी स्‍वयं शिक्षकों का है। इस आत्‍मविश्‍लेषण से वे अगर बचने का प्रयास करेंगे तो न केवल स्‍वयं का नुकसान करेंगे, बल्कि राष्‍ट्र को अधिक नुकसान पहुंचाएंगे। क्‍यों न आज के दिन मेरी पोस्‍ट पर आने वाले शिक्षक अपना आत्‍मविश्‍लेषण करें। मैं खुद भी एक छात्र का शिक्षक हूं, सो मैं भी इसी प्रक्रिया से गुजर रहा हूं...

शब्‍दकोष में शिक्षक 

हरदेव बाहरी बताते हैं - शिक्षक- सं (पु.) विद्या या ज्ञान सिखाने वाला व्‍यक्ति (जैसे राजनीतिक शिक्षक, कला शिक्षक) 2 अध्‍यापक 3 गुरु

विकीपीडिया के अनुसार - A teacher (or, in the US, educator) is a person who provides education for pupils (children) and students (adults). The role of teacher is often formal and ongoing, carried out at a school or other place of formal education. In many countries, a person who wishes to become a teacher must first obtainspecified professional qualifications or credentials from a university or college. These professional qualifications may include the study of pedagogy, the science of teaching. Teachers, like other professionals, may have to continue their education after they qualify, a process known as continuing professional development. Teachers may use a lesson plan to facilitate student learning, providing a course of study which is called the curriculum. A teacher's role may vary among cultures. Teachers may provide instruction in literacy and numeracy, craftsmanship or vocational training, the arts,religion, civics, community roles, or life skills. A teacher who facilitates education for an individual may also be described as a personal tutor, or, largely historically, a governess. In some countries, formal education can take place through home schooling. Informal learning may be assisted by a teacher occupying a transient or ongoing role, such as a family member, or by anyone with knowledge or skills in the wider community setting. Religious and spiritual teachers, such as gurus, mullahs, rabbis, pastors/youth pastors and lamas, may teach religious texts such as the Quran, Torahor Bible.

मुफ्त डिक्‍शनरी कहती है - One who teaches, especially one hired to teach. (Business / Professions) a person whose occupation is teaching others, esp children. tuition - First meant taking care of something, then teaching or instruction, especially for a fee.

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

आखिर मुझसे ही सवाल पूछ लिया :)

पीटर आंसर्स डॉट कॉम वेबसाइट सभी सवालों के जवाब दे रही है और इतने सटीक जवाब दे रही है कि हम सब लोग आश्‍चर्यचकित हैं।

मेरे भांजे ने कल रात फोन करके मुझे यह जानकारी दी। मैं बहुत साल पहले इस वेबसाइट के बारे में सुन चुका था, लेकिन तब मैंने सुनकर अनसुना कर दिया था। इस बार मैंने सोचा कि चलो वेबसाइट को आजमाकर आते हैं। सो पहुंच गए वेबसाइट पर। वहां सवालों का सिलसिला तो शुरू हुआ, लेकिन पीटर बाबा मौन हो गए। हर बार सवाल पूछने पर उन्‍होंने अलग अलग जवाब दिए। इनमें से कुछ जवाब इस तरह थे .

- आपके इस सवाल का जवाब मैं बाद में दूंगा।

- आपके सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है।

- निजी सवाल मत पूछिए।

- आपका सवाल सही फार्मेट में नहीं है।

 

और आखिर में वही हुआ जिसका मुझे डर था, पीटर बाबा ने जवाब देने के बजाय सवाल ही पूछना शुरू कर दिया Smile 

 

उन्‍होंने कुछ सवाल मुझसे पूछे उनमें से एक सवाल को मैंने कैप्‍चर किया है। मुलाहिजा गौर फरमाइए...

peter Q me

पीटर बाबा ने पूछा क्‍या तुम मुझ पर विश्‍वास करते हो?

जवाब का कोई बक्‍सा बना हुआ नहीं है वरना मैं कहता नहीं, कदापि नहीं...

रविवार, 3 जुलाई 2011

लोकतंत्र की लाश पर लोकतंत्र की रक्षा

कल अजीत फाउण्‍डेशन की लाइब्रेरी गया था। वहां जयप्रकाश नारायण की जेल डायरी मिली। किताबों को खांमखां उलटने पलटने की प्रवृत्ति ने यहां भी जोर मारा। डायरी का पहला ड्राफ्ट पढ़ा तो लगा कि जैसे आज की ही बात की जा रही है। आज से 36 साल पहले कमोबेश यही परिस्थितियां और इन्‍हीं मांगों के साथ बिहार में शुरू हुआ छात्र आंदोलन जेपी के नेतृत्‍व में इतना उग्र हो गया कि केन्‍द्र सरकार के गिरने की नौबत आ गई। आज फिर उन्‍हीं मुद्दों पर एक बार फिर केन्‍द्र सरकार घिरी हुई है। हालांकि इस बार कोई जननेता नहीं बन पा रहा है और न ही फिलहाल आपातकाल लागू करने की स्थिति बनी है, लेकिन आंदोलन के दमन का कांग्रेस का वही रवैया है। मैं यहां डायरी के कुछ अंश दे रहा हूं।

वर्ष 1975 में राजपाल एण्‍ड संस द्वारा प्रकाशित इस डायरी के अंश साभार...

जेल डायरी

21 जुलाई 1975

“लोकतंत्र की प्रक्रिया में मैं पूरी तरह जनता को निरन्‍तर साथ लेकर चलने का यत्‍न करता रहा हूं। इसके दो तरीके हैं। एक, हमें किसी ऐसे तंत्र की व्‍यवस्‍था करनी चाहिए जिसके माध्‍यम से उम्‍मीदवारों को चुनते समय हम जनता से परामर्श प्राप्‍त कर सकें। दूसरे, पहले तरीकों की भांति तंत्र की व्‍यवस्‍था करके जिसके माध्‍यम से जनता अपने प्रतिनिधियों पर निगरानी रख सके और उनके ईमानदारी के साथ काम करने की मांग कर सके। यही वे दो मूल तत्‍व थे जो मैं बिहार के इस संघर्षपूर्ण आंदोलन से प्राप्‍त करना चाहता था और आज यहां (वे चण्‍डीगढ़ के एक अस्‍पताल में कैद थे) मैं लोकतंत्र के हनन के साथ अपनी कल्‍पना का हनन होते देख रहा हूं।”

“प्रधानमंत्री (पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी) ने लोकतंत्र की हत्‍या करने और अपने तानाशाही शासन के शिकंजे में कसने के लिए क्‍या कदम उठाए हैं, उन्‍हें फिर से गिनाने की आवश्‍यकता नहीं है। यही वही प्रधानमंत्री है जो बार बार हम  पर लोकतंत्र को तबाह करने और फासिस्‍टवाद स्‍थापित करने का आरोप लगाती रही हैं और हम देखते हैं कि वही प्रधानमंत्री लोकतंत्र को तबाह कर रही है (देश में आपातकाल लागू हो चुका था) और उसी लोकतंत्र के नाम पर स्‍वयं फासिस्‍टवाद स्‍थापित कर रही हैं। अपने हाथों से लोकतंत्र का गला घोंटकर ओर लोकतंत्र की लाश को नीचे गहरी कब्र में दफनाकर वह लोकतंत्र की रक्षा कर रही है।”

6 अगस्‍त 1975

जिसकी संभावना (आशंका) थी वही हुआ। उच्‍च न्‍यायालय द्वारा संभवत: विपरीत निर्णय लिए जाने के विरुद्ध श्रीमती गांधी ने लोक प्रतिनिधित्‍व अधिनियम में संशोधन कराकर अपने आपको सुरक्षित कर लिया है। भारी संवैधानिक संशोधन होने की संभावना है। यह सब-कुछ स्‍वयं नियुक्‍त देश उद्धारक के लिए तानाशाही पूरा करने के लिए है। और यह कहा जा सकता है कि यह सब कुछ संविधान के अनुरूप किया जा रहा है। हिटलर ने भी अपनी निर्णायक तानाशाही को कायम करने के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया था। क्‍या भारत को भी नरक में इसी तरह जाना है और फिर अंधकार से निकलना होगा? अब यह निश्चित दिखाई देता है किंतु भारत को इसके लिए जो मूल्‍य चुकाना होगा, वह बहुत महंगा होगा। ईश्‍वर इसकी सहायता करे।

7 अगस्‍त 1975

सम्‍पूर्ण क्रांति के बजाय हम विपरीत क्रांति के काले बादलों को देखते हैं। चारों ओर जिन उल्‍लू और गीदड़ों के चिल्‍लाने और गुर्राने की आवाजें हम सुनते हैं, उनके लिए यह दावत का दिन है। चाहे रात कितनी भी गहरी क्‍यों न हो, सुबह अवश्‍य होगी।

डायरी के बाकी हिस्‍से आगामी पोस्‍टों में देने की कोशिश करूंगा...

 

सर्च रिजल्‍ट

- भ्रष्‍टाचार पर गूगल बाबा ने About 3,860,000 results (0.17 seconds)  सर्च रिजल्‍ट बताए।

- "कांग्रेस भ्रष्‍टाचार" पर कुल 7,090 results (0.14 seconds)  सर्च रिजल्‍ट आए। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

- "रामदेव भ्रष्‍टाचार" पर 17,900 results (0.26 seconds) सर्च रिजल्‍ट मिले। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

- “कालाधन” शब्‍द के लिए कुल 220,000 results (0.15 seconds)  सर्च रिजल्‍ट मिले।

- "कांग्रेस काला धन" पर 1,960 results (0.13 seconds) सर्च रिजल्‍ट मिले। (जिन लेखों में दोनों शब्‍द आवश्‍यक रूप से हों)

परिणाम - देश को इससे मतलब नहीं है कि विदेशी बैंकों में पड़ा काला धन किसका है, या कांग्रेस की इसमें क्‍या भूमिका है। इसके बजाय काले धन को देश में वापस लाने पर सभी एक राय है। दूसरी बात केवल काला धन वापस देश में लाना ही काफी नहीं होगा, भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने की मंशा आम भारतीय और मीडिया में अधिक बलवती है।

 

डिस्‍क्‍लेमर : मैंने अपने गूगल क्रोम एक्‍स्‍प्‍लोरर में से कुकीज और ब्राउजिंग डाटा साफ करने के बाद यह परिणाम हासिल किए हैं। इसके बावजूद अन्‍य ब्राउजर पर डाटा में कुछ बदलाव हो सकता है। सभी सर्च परिणाम हिन्‍दी के हैं अंग्रेजी के परिणाम अलग असर पैदा कर सकते हैं।

सोमवार, 20 जून 2011

नया रूप-रंग

मद्धम होते सितारों की  छांव में

ढलते चांद ने एक बार फिर

झूठा दिलासा दिया,

कल फिर मिलेंगे

तब मेरा यही रूप

और यही रंग होगा।

जेठ की गर्मी

नागौरण की तपिश

और लू से बेखबर

मैं सपने लेता रहा दिन में

रात को तारों की छांव में

चुपके से आए चांद ने फिर

दिखाया नया रूप, नया रंग

एक बार फिर मैं उसे

अपलक देखता रह गया...

रविवार, 12 जून 2011

क्‍या मैं ऐसा ही हूं... ?

आज रवि रतलामी जी ने चेताया कि आपको अपने ब्लॉगिंग व्यक्तित्व का अता-पता है भी? तो हम भी पहुंच गए यह जानने कि हमसे बेहतर हमें कौन जानता है। वहां पहुंचकर देखा कि महज लिंक पेश करना है और आपके व्‍यक्तित्‍व के बारे में विशद (?) जानकारी उपलब्ध है। पहले अपने एक ब्‍लॉग ज्‍योतिष दर्शन का पता किया तो शानदार परिणाम सामने आया। उत्‍साह के मारे अपने दूसरे ब्‍लॉग दिमाग की हलचल के जरिए भी खुद का परीक्षण कर लिया। वह तो और भी शानदार मिला। वाह... देखिए हमारे व्‍यक्तित्‍व के जो पहलु उभरकर सामने आए हैं। क्‍या वास्‍तव में मैं ऐसा ही हूं।

ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग के आधार पर मेरा विश्‍लेषण

The active and playful type. They are especially attuned to people and things around them and often full of energy, talking, joking and engaging in physical out-door activities. The Doers are happiest with action-filled work which craves their full attention and focus. They might be very impulsive and more keen on starting something new than following it through. They might have a problem with sitting still or remaining inactive for any period of time.

sidharth

 

दिमाग की हलचल ब्‍लॉग से मिले विश्‍लेषण का निष्‍कर्ष

The independent and problem-solving type. They are especially attuned to the demands of the moment and are highly skilled at seeing and fixing what needs to be fixed. They generally prefer to think things out for themselves and often avoid inter-personal conflicts. The Mechanics enjoy working together with other independent and highly skilled people and often like seek fun and action both in their work and personal life. They enjoy adventure and risk such as in driving race cars or working as policemen and firefighters.

sidharth d

अपनी इतनी तारीफें पढ़ने के बाद एक वाकया याद आ गया....

एक बार राजस्‍थान के प्रार‍ंभिक शिक्षा निदेशक का सम्‍मान किया गया। उन्‍हें स्‍टेज पर बैठा दिया गया और पढे लिखे और वाकपटु शिक्षकों ने दो घंटे से अधिक समय तक उनकी तारीफों के ऐसे पुल बांधे कि सूरज देवता छिप गए। (मेरा ध्‍यान सूरज देवता पर ही था, क्‍यों‍कि भोज में विलम्‍ब हुआ जा रहा था)। आखिर तारों की रोशनी में निदेशक महोदय उठ खड़े हुए। उन्‍होंने डायस पर आते ही सभी शिक्षकों और कर्मचारियों को तहेदिल से आभार व्‍यक्‍त किया, लेकिन इसके साथ ही अपनी पीड़ा भी व्‍यक्‍त कर दी। उन्‍होंने बताया कि प्राचीन काल में किसी राजा के दरबारियों में किसी व्‍यक्ति को लज्जित करना होता तो राजा उसे सभा में खड़ा कर देता और दूसरे सभासदों से कहता कि इनकी तारीफ में कसीदे गढ़े। जिस व्‍यक्ति की तारीफ राजा के सामने होती वह लज्जित होता रहता। निदेशक महोदय ने कहा कि ज्ञानी लोगों और ईश्‍वर से पहले पूछे जाने वाले गुरुजनों के समक्ष अपनी तारीफें सुनकर उन्‍हें भी लज्‍जा महसूस हो रही है। तबादलों और दूसरे कामों की उम्‍मीद लिए कर्मचारी सकते में आ गए। बाद में निदेशक महोदय ने खुद ही माहौल को हल्‍का कर दिया। ये निदेशक थे श्‍यामसुंदर बिस्‍सा। रिपोर्टर के तौर पर मेरे साथ इनके कई खट्टे मीठे अनुभव रहे, लेकिन इस घटना के बाद मैं निजी तौर पर उनका मुरीद हो गया।

आपने ऊपर मेरी तारीफ तो नहीं पढ़ी ना... मुस्‍कान 

शनिवार, 11 जून 2011

बीकानेर में छाते नहीं बिकते

आप भी कहेंगे कि ये क्‍या बात हुई, लेकिन मुझे अपना पक्ष तो स्‍पष्‍ट करने दीजिए। बीकानेर में छाते नहीं बिकते क्‍योंकि यहां बारिश नहीं होती। यह भी कोई खास बात नहीं है, लेकिन गौर करें तो पाएंगे कि बीकानेर में बेरहम गर्मी तो होती है, फिर छाते क्‍यों नहीं बिकते। पिछले साल पत्रिका के एक वरिष्‍ठ साथी राहुल शर्माजी ने मुझे यह जानकारी दी थी। वे मूलत राजस्‍थान के हिण्‍डौनसिटी के हैं। पिछले साल छुट्टियों पर वे अपने गांव गए तो उनके पिता ने कहा कि बीकानेर में इतनी गर्मी पड़ती है तो छाते भी खूब बनते होंगे। कोई अच्‍छा सा छाता मिले तो अगली बार लेकर आना। राहुलजी ने बीकानेर आकर पता किया तो पता चला कि बीकानेर में कोई भी दुकान खासतौर पर छाता बनाने वालों की नहीं है। (मैं खुद बीकानेर का हूं, लेकिन मैंने कभी यह गौर नहीं किया, यहां तक कि सोचा भी नहीं)। वरिष्‍ठ साथी ने कई जगह चक्‍कर निकाले और कुछ दुकानों में जहां मिले तो वे भी दूसरे शहरों या राज्‍यों के बने हुए छाते बिक रहे थे। दुकानदारों ने भी बताया कि बीकानेर में छातों की बिक्री नहीं होती। कुछ लोग शौक के लिए बस खरीदकर ले जाते हैं। लौटकर आने वाले ग्राहक तो हैं ही नहीं।

पिछले एक महीने से तापमापी का पारा 45 से 49 के बीच घूम रहा है। मौसम विज्ञानियों की मानें तो आदर्श परिस्थितियों में मापे गए पारे की तुलना में सड़क पर तापमान इससे तीन या चार डिग्री ऊपर होता है। यानि बीकानेर में इस साल पारा कई बार पचास डिग्री के पार पहुंच चुका है, लेकिन फिर भी सिर पर छाता ताने लोगों को मैंने इस बार भी नहीं देखा। हां दिखाई दिए तो ये तीन बच्‍चे एक ही छाते को लेकर जा रहे थे। मैंने अपने मोबाइल कैमरे से यह “दुर्लभ” फोटो खींचा है।

 08062011232

पूर्वान्ह सवा ग्‍यारह बजे यह स्थिति हो चुकी थी कि जयनारायण व्‍यास कॉलोनी, जो पोश कॉलोनियों में से एक है, का बाजार सुनसान हो चुका था।

मुझे याद है बचपन में मेरे पड़नानाजी से उनकी उम्र के कुछ लोग मिलने आया करते थे तो वे छड़ी के बजाय छाता टेकते हुए आते थे। मैंने उन्‍हें कभी छाता सिर के ऊपर ताने हुए नहीं देखा। हमारे घर में भी बचपन से कभी छाता नहीं रहा। फैशन के तौर पर कभी आया भी तो बच्‍चों के खेल के भेंट ही चढ़ा। मैं समझ नहीं पाता कि बीकानेर की भीषण गर्मी से बचाव के लिए लोग छाते का इस्‍तेमाल क्‍यों नहीं करते। ठीक है यहां बारिश अधिक नहीं होती, लेकिन तपती धूप तो हमें परेशान करती ही है।

नए दौर के लोगों के लिए कहा जा सकता है कि तेज रफ्तार वाहनों ने छाते को बेकार कर दिया है, लेकिन आज से बीस साल पहले जब इतने वाहन नहीं थे, तब भी लोग छाते का इस्‍तेमाल इतना नहीं कर रहे थे, जितनी कि यहां गर्मी पड़ती है। इसके बजाय लोग सिर से पांव तक खुद को सूती कपड़ों से ढंककर बाहर निकलते हैं। महिलाएं तो अपना मुंह तक ओढ़ने से ढके रखती हैं।

इस बारे में एक जोरदार वाकया भी है। मेरे मामा उस जमाने में रिपोर्टर हुआ करते थे। दिल्‍ली के एक राष्‍ट्रीय अखबार की रिपोर्टर बीकानेर आई और उसने मई जून की भीषण गर्मी में ग्रामीण क्षेत्रों का दौर कर निष्‍कर्ष निकाला कि अभी राजस्‍थान और विशेषकर बीकानरे, जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्रों में महिलाओं की बड़ी दयनीय स्थिति है। यहां घूंघट प्रथा इतना विकराल रूप ले चुकी है कि महिलाओं को न सिर्फ सिर ढकने के लिए बाध्‍य किया जाता है, बल्कि पूरा मुंह गले तक ढककर महिलाएं बाहर निकलती हैं। मामाजी के सामने उस महिला पत्रकार ने अपनी बात रखी तो मामाजी ने माथा ठोंक लिया। उन्‍होंने पत्रकार से पूछा कि क्‍या आपने उन महिलाओं से बात की थी, या केवल देखकर ही अपना निष्‍कर्ष निकाल रही हैं। पत्रकार ने कहा कि वे स्‍थानीय भाषा जानती नहीं हैं सो देखकर ही निष्‍कर्ष निकाला है। अब मामाजी ने स्‍पष्‍ट किया कि बीकानेर में गर्मियों के दिनों में लगातार धूलभरी हवाएं चलती हैं। ऐसे में अगर महिला का मुंह खुला होगा तो चेहरे पर गर्म रेत के झोंके लगेंगे। इससे गर्मी भी अधिक लगेगी और चेहरे का भी नुकसान होगा। इससे बचने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अपने ओढने से मुंह को भी पूरी तरह ढके रहती है। महिला पत्रकार के दिमाग की बत्‍ती जली तो उसने अपनी रिपोर्ट में आवश्‍यक सुधार किए।

और अब एक अनूठा प्रयोग

गर्मी है सो है, अब इससे बचने के लिए बीकानेर में कूलर का ही आसरा है। छठे वेतन आयोग का लाभ मिलने के बाद बीकानेर में एसी की ब्रिकी में भी जोरदार इजाफा हुआ है। तीन से पांच प्रतिशत आर्द्रता के बीच तेज गर्म हवाएं माहौल को बुरी तरह तपा देती हैं तो कूलर और एसी भी फेल साबित होते हैं। ऐेसे में प्रयोगधर्मी लोगों का दिमाग चालू रहता है। यही तो है थार की जीवटता। देखिए इसका एक नमूना। इसमें कूलर के आगे एक और पंखा लगा  दिया है। हवा दूनी रफ्तार से आती है। हालांकि इससे शोर तो बहुत हो रहा था, लेकिन हवा इतनी तेज और नम थी कि माहौल में गर्मी का असर कुछ कम हो गया।

26052011169

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

गुरुत्‍व प्रेम और उठना पैरों का

बीस साल की उम्र में बॉस्‍केटबॉल खेलना शुरू किया था। कुछ लोगों का विचार था, कि तब तक मेरी खेल शुरू करने की उम्र बीत चुकी है, लेकिन अगला एक साल मैंने खेल सीखा और तीन साल तक कोर्ट पर जमकर जलवे दिखाए। इससे एक वहम पक्‍का हो गया कि मैं जब भी खेलना शुरू करूंगा, तब ऐसा ही खेल लूंगा। पर, मेरे एक गुरुजी कहते थे कि वहम और खेल का आपस में वैर है। या तो वहम रहेगा या खेल। तब मैं समझा नहीं।

basketball4

 

खेल छोड़ने के छह साल बाद आखिर दस दिन पहले एक बार फिर बॉस्‍केटबॉल कोर्ट पर पहुंचा तो उसी अंदाज में खेलने की कोशिश करने लगा। इस बीच शरीर की काफी शक्ति और अभ्‍यास का नुकसान हो चुका था। ऐसे में हंस की चाल में चलते कौअे को नए खिलाडि़यों ने देखा। फिर भी ढिठाई के साथ वैसे ही प्रयास करता रहा। उस दिन का खेल खत्‍म होने के बाद खुद पर शर्म आई। घर आया तो शरीर का जोड़ जोड़ दुख रहा था। टांगें कांप रही थी और मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। पत्‍नीजी ने पूछा कि चाय बना लाऊं तो हां का जवाब भी नहीं निकल रहा था। आखिर कुछ देर में तंद्रा टूटी तो हौले से कहा नींबू पानी। सालों बाद यह पानी अमृत की तरह लग रहा था। दस मिनट बाद बोली खुली तो बताया कि हालत पस्‍त है। मेरी शक्‍ल से ऐसा नहीं लग रहा था, लेकिन शरीर अंदर से टूट गया था। रात को ढंग से नींद नहीं आई।

पहले दिन के झटके ने वहम को चकनाचूर कर दिया था। अगले दिन शाम को कोर्ट पर एक नौसिखिए खिलाड़ी की तरह पहुंचा। साथी खिलाडि़यों से पहले पहुंचा और कुछ देर वार्म अप किया। इसके बाद स्‍टेप बाइ स्‍टेप खेलना शुरू किया। पहले शूटिंग, फिर लैप शॉट और बाद में थ्री प्‍वाइंटर। लैप शॉट के दौरान तो जैसे जमीन मुझे नीचे की ओर खींच रही थी। किसी जमाने में जहां मेरा एयर स्‍टे मेरी शान हुआ करता था वहीं आज जमीन छोड़ना भी भारी महसूस हो रहा था।

आज दस दिन हो गए खेलते हुए। कल शाम एक नए खिलाड़ी ने कहा भाई ने दस दिन में अपना खेल ठीक सुधार लिया। किसी जमाने में मेरे कोच ने यही बात कही थी। टांगे कल शाम भी टूटी और शरीर का सत भी निकला हुआ था, लेकिन एक जूनियर खिलाड़ी के इन शब्‍दों ने जैसे शरीर को अतिरिक्‍त ताकत दे दी। अब आज शाम शायद और बेहतर खेल पाउं...

रविवार, 17 अप्रैल 2011

वो उसे क्‍या आता है... मैं बनाता हूं...

बीके स्‍कूल में मेरे साथ योगेन्‍द्र पढ़ता था। स्‍कूल छोड़ने के करीब पंद्रह साल बाद एक दिन योगेन्‍द्र मिला। मैं चहका, पूछा क्‍या कर रहे हो। उसने कहा चित्र बनाता हूं। मैंने कहा वो तो ठीक है, लेकिन करते क्‍या हो। वो सचमुच चिढ़ गया। मुझसे पूरी बात ही नहीं की। यानि जितनी भी बातचीत हुई उसमें वह मुझ पर झल्‍ला अधिक रहा था और बात कम कर रहा था।
मैंने उसके बारे में पता किया। पहले बीकानेर में चित्रकला में स्‍नातक किया। बाद में एमएफए करने के लिए जयपुर चला गया था। दिल्‍ली और मुम्‍बई में कई अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की प्रदर्शनियों का आयोजन करने के बाद उन दिनों बीकानेर में खाली बैठा था। जब वह अपनी रचनात्‍मकता के शीर्ष पर होता है तो सब काम धंधे छोड़कर खाली बैठ जाता है। बस सोचता रहता है। यह उसने बाद में बताया।
स्‍कूल के दिनों में वह काला और भद्दा था। पूरे चेहरे में केवल उसकी आंखें ही ऐसी थी जिन्‍हें आकर्षक कहा जा सकता है। आज बीस साल पीछे की ओर झांकता हूं तो लगता है कि उसने अपनी आंखों की चमक को बचाए रखा है। शायद बढ़ भी गई है। एक वही तो था जिसने अपने दिल की आवाज को सुना और उसी के रास्‍ते पर निकल पड़ा। छठी कक्षा में वह पूरे दिन चित्र बनाया करता था। अमिताभ बच्‍चन का वह जबरदस्‍त फैन था। सो पहले एक सादे कागज पर ग्राफ बनाता और एक सस्‍ता फोटो लेकर ग्राफ वाले कागज पर उसकी न‍कल बनाता था। दूसरे लड़के बहुत प्रभावित होते। मैं मुंह बना देता... इसमें क्‍या खास है। कोई भी बना सकता है। और चंपक में आए कार्टून मैं भी बना देता। सर से गुड भी मिल जाता। बाद में मैं चूहा दौड़ में शामिल हो गया और वह विशिष्‍ट बनता गया। पहली मुलाकात में हुई मुक्‍का लात के बाद में उसे मनाया और कहा कि मेरा भी एक पोर्टेट बना दे। यह बिल्‍कुल ऐसा आग्रह था जैसे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर की फैशन डिजाइनर को पजामा सिलने के लिए दे दिया जाए। योगेन्‍द्र मुझे जानता था, सो मेरी बात का बुरा नहीं माना। बस टालता रहा। आज उसने एक गिफ्ट भेजा है। वही पोर्टेट.. अभी मैंने उससे बात नहीं की है, लेकिन शायद वह मेरी टकले वाली छवि को पसन्‍द नहीं करता था, सो अच्‍छी तस्‍वीर का इंतजार कर रहा था। मेरे तस्‍वीर बदलने के बाद उसने पोर्टेट बनाकर भेज दिया है। आप भी देखिए कैसा है...

छठी कक्षा में तो शायद उसे कुछ नहीं आता था, लेकिन बीस सालों की साधना के बाद कुछ तो निखार आया होगा.. मेरा तो अभ्‍यास छूट गया है।
sidharth joshi

योगेन्‍द्र अब बच्‍चों को सिखाता भी है। पिछले दिनों पत्रिका इन एज्‍युकेशन के समर स्‍कूल में उसने कई बच्‍चों को सीधी लकीरें खींचना सिखाया। उसका एक फोटो उसकी आईडी में से उठाकर लगा रहा हूं...
योगेन्‍द्र अपने शिष्‍यों के साथ

अपने शिष्‍यों के बीच खड़ा है बाएं से तीसरा... मुझे तो वह अब भी बच्‍चा ही लगता है... मुस्‍कान

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

इरोम शर्मिला की भूख के मायने

जनरल स्‍मट जो नया कानून लागू कर रहे हैं उससे हमारे परिवारों की महिलाएं वेश्‍याएं और हम सभी नाजायज औलादें घोषित कर दिए जाएंगे। मैं इसका विरोध करता हूं। जान देने के लिए तैयार हूं, लेने के लिए नहीं। मेरे इस तरह के विरोध का शायद उपनिवेशी ताकत पर असर हो। वे मुझे बन्‍दी बना सकते हैं, मेरी हड्डियां तोड़ सकते हैं और हो सकता है मेरा मृत शरीर ले लें, लेकिन मेरी आज्ञाकारिता नहीं ले सकते।

गांधी फिल्‍म में दक्षिण अफ्रीका के उस हॉल का नजारा आज भी मुझे आंदोलित कर देता है। बैरिस्‍टर गांधी ने इसी हॉल से सॉफ्ट प्रोटेस्‍ट को सत्‍याग्रह का शक्तिशाली हथियार बना दिया था। आज साठ साल बाद उसी हथियार को सरकार ने आत्‍महत्‍या का प्रयास जैसा नाम देकर उसका भद्दा मजाक बना दिया है।

सत्‍य का आग्रह जब गांधीजी ने किया...

लोकपाल बिल की लड़ाई में आज भारत का आम आदमी खास बना है, तब एक बार फिर उसे इरोम शर्मिला की याद दिलाने का सही वक्‍त है। हिन्‍दुस्‍तान का तहरीर चौक बने जन्‍तर मन्‍तर में अन्‍ना हजारे की भूख ने सरकार की गहरी अंतडि़यों से भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने के लिए जरूरी राजपत्र निकलवा लिया। पर, पूर्वोत्‍तर के लिए स्‍मट कानून बने सेना के विशेष अधिकार कानून हटाने की मांग लिए इरोम शर्मिला की भूख अब भी अपने ही देश के शीर्ष नेतृत्‍व और आम जनता की नजरे इनायत का इंतजार कर रही है।

मणिपुर में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पावर्स एक्‍ट 1958 का उपयोग...

अपने शरीर को अपना हथियार बना चुकी इरोम शर्मिला ने वर्ष 2000 में आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशनल पावर एक्‍ट 1958 का विरोध तब करना शुरू किया जब सेना ने उनके गांव में घुसकर निर्दोष लोगों की हत्‍या कर दी। तब से अब तक शर्मिला की भूख हड़ताल को आत्‍महत्‍या का प्रयास बताकर गांधी के सत्‍याग्रह का खुला मजाक बना दिया है। पूर्वोत्‍तर में पृथ्‍‍थकवादी ताकतों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए कई क्षेत्र सेना के हवाले कर दिए गए थे। इसके बाद हर खास और आम व्‍यक्ति सेना की कार्रवाई का शिकार हुआ। मणिपुर में आसाम राइफल के जवानों ने दस लोगों की गोली मारकर हत्‍या कर दी। इसके खिलाफ शर्मिला उठ खड़ी हुई। ग्‍यारह साल होने को आए हैं। शर्मिला और उसका सत्‍याग्रह चल रहा है। शर्मिला की भूख कहीं उसकी जान न ले ले, इसके लिए पुलिस और प्रशासन उसे लगातार गिरफ्तार रखता है और नली की सहायता से उसे खाना पहुंचाया जा रहा है।

मीडिया ने कई बार शर्मिला की आवाज को उठाया, लेकिन रम्‍स अदायगी से ज्‍यादा कुछ नहीं हो पाया। आज अन्‍ना की सफलता के बाद एक बार फिर दिल्‍ली के कान बजाने का समय है। समय रहते पुरजोर आवाज उठी तो शायद शर्मिला का अनशन भी खत्‍म हो जाए...

आइए... भारतवर्ष के एक हिस्‍से में आम आदमी की मांग को लेकर ग्‍यारह सालों से सत्‍य का आग्रह कर रही शर्मिला के लिए अपने हिस्‍से की चेतना का कुछ अंश अर्पित करें...

कैसे भी...

यह भी देखिएगा

फिल्‍ममेकर कविता जोशी का मार्च 2006 को लिखा गया लेख

बीबीसी पर इरोम की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी 

मंगलवार, 29 मार्च 2011

पगे लागूं महाराज

बचपन में मैं महाराजों को बहुत देखता था। इन सालों में महाराजों की संख्‍या कुछ कम हो गई है। कुछ परिभाषा में भी आंशिक बदलाव आ गया तो महाराज की इतनी गरिमा भी नहीं रही। जब उन महाराजों को देखता था तो सोचता था कि एक दिन मैं भी महाराज बनूंगा। मैंने किसी समझदार से पूछ भी लिया कि महाराज कैसे बनते हैं। समझदार मेरी उम्‍मीद से ज्‍यादा समझदार था, उसने बताया जो अपना घर फूंककर तमाशा बनते हैं वे महाराज बन जाते हैं। उनसे वही लोग बराबरी कर सकते हैं जो अपना खुद का घर फूंकना जानते हो या फूंक चुके हों। यह परिभाषा सुनकर पांव के नीचे से जमीन सरक गई। खैर बाद में मैंने एक महाराज को करीब से भी देखा... आज उनकी याद आ गई...

हालांकि मैं उनका वास्‍तविक नाम भी बता सकता हूं लेकिन नाम से अधिक उनकी कहानी में दम है सो सुनिए...

महाराज के पिता नायब तहसीलदार थे। करीब चालीस साल पहले यह बहुत शानदार पोस्‍ट हुआ करती थी। पटवारी से शुरू हुए थे और दसवीं पास होने के कारण तेजी से तरक्‍की करते हुए तहसीलदार के पद पर पहुंच गए थे। अपने रुआब से अच्‍छी खासी जमीनें, गहने और जायदाद जमा कर लिए थे। महाराज को इन सबकी जानकारी थी। सो कभी पढ़ने में मन नहीं लगाया। ऐसा नहीं था कि पढ़ने जितना दिमाग न हो, लेकिन शुरू से ही पढ़ाई को डिस्‍कार्ड ही कर दिया। खेलने का शौक था। फुटबॉल खेलने के लिए जाते थे, सो एक दिन बात की बात में टीम से अलग हो गए और अपनी अलग फुटबॉल टीम बना ली। कोच से लेकर अर्दली तक रिक्रुट कर लिए। जितनी टीम उतना ही स्‍टाफ। खैर टीम में भी ऊंची कीमतों पर एक से बढ़कर एक खिलाडि़यों को शामिल किया। कुछ महीने तक बीकानेर में ही प्रेक्टिस की और चले विश्‍वविजय को। बीकानेर से सीधे कलकत्‍ता गए। मैत्री मैच हुआ और मोहनबागान को टिका दिया। जमकर वाह वाह हुई। महाराज पक्‍के महाराज बन गए। घर फुंक रहा था, लेकिन महाराज के पिता खुश थे, कि बेटा नाम कमा रहा है। धीरे धीरे खेल से अलग हुए तो घोड़ों का शौक पाल लिया। टीम में शामिल खिलाडि़यों के खाने के लाले पड़े तो खिलाडि़यों ने छोटे मोटे धंधे करना शुरू कर दिया और दिन रात महाराज के गुण गाते। इधर महाराज का घोड़ों का शौक बढ़ता जा रहा था। तेल का पीपा घोड़े के मुंह के आगे ही खोल कर रखा जाता। जब तेल खत्‍म हो जाता और घोड़ा मुंह मारता रहता तो तेल के खुले पीपे में घी उंडेल दिया जाता। महाराज के घोड़े शहर की शान बन गए।

इसी दौरान समयचक्र ने पलटा खाया। महाराज की किसी बात पर पिता से लड़ाई हो गई। अपनी आन पर जिंदा रहने वाले महाराज ने पिता से पैसा लेना बन्‍द कर दिया। परिवार में बीबी बच्‍चों थे, सो उनको लेकर अलग हो गए। महाराज के पिता कमरे बन्‍द कर कर के खूब रोए लेकिन महाराज को नहीं मना पाए। सोने और चांदी का चम्‍मच मुंह में लेकर पैदा हुए महाराज के बच्‍चों के सामने दोनों समय के खाने का जुगाड़ मुश्किल हो रहा था। महाराज ने अपने किसी यारबाज से पैसा लेकर जीप खरीद ली। महाराज मेहनती तो थे ही जीप का काम भी अच्‍छा चल पड़ा। एक बार सड़क पर लाश पड़ी देखी तो उसे जीप में डालकर ले आए। खबर आग की तरफ फैली तो लोगों ने मांगलिक कार्यों के लिए जीप में किराए पर लेना बन्‍द कर दिया। महाराज कहां हार मानने वाले थे, उन्‍होंने लाशें ढोने के काम में ही खुद को खपा दिया। इसी दौरान पता चला कि महाराज के बड़े बेटे ने अपने दादा से सांठ-गांठ कर सारी संपत्ति अपने नाम करा ली है। महाराज ने आव देखा न ताव, अपने पिता के घर से बाहर चल पड़े। अपना अलग घर बना लिया। छोटा बेटा महाराज के ही नक्‍शे कदम पर चल रहा था, सो संगीत का शौक पाल बैठा। हालांकि कहीं से तालीम नहीं ली, लेकिन दिन महीने और साल तबले, हारमोनियम, सितार और मंजीरे बजाते हुए ही निकल रहे थे। ऐसे में गृहस्‍थी का सारा बोझ महाराज के कंधों पर ही रहा। एक दिन महाराज टूट गए। बीमार होकर बिस्‍तर पर पड़े तो वापस उठ नहीं पाए। सालों की मेहनत से बनाई आन और गृहस्‍थी टुकड़ा टुकड़ा कर टूटती नजर आ रही थी। तीन साल तक बिस्‍तर में रहे। बीबी ने खूब सेवा की। आखिर यमराज ने महाराज को उठा लिया। जब महाराज अंतिम सांसें गिन रहे थे तो एक लकड़ी के पाटे पर निश्‍तेज पड़े थे और आंखें पथरा रही थी। करोड़ों रुपए की संपत्ति पर बड़ा पुत्र काबिज था और छोटा बेटा संगीत की धुनों में खोया हुआ था...

महाराज तो फिर भी महाराज ही रहे। जिसे भी पता चला कि महाराज का निधन हो गया है, अपना काम छोड़ सीधा उनके घर की ओर भागता हुआ आया। जिन लोगों को पैसा दिया वे लौटे नहीं और जिन्‍हें प्‍यार लुटाया वे सम्‍मान लुटाने आ पहंचे। मैं भी कई बार उनके प्‍यार की बारिश में नहाया था। सो मैं भी उनकी अंतिम यात्रा में साथ था। कंधा देने के बाद मैं शवयात्रा में पीछे लौटा तो लोग आपस में बात कर रहे थे...

महाराज तो महाराज थे, उनकी तरह अपना सबकुछ फूंककर कौन दूसरों पर प्‍यार लुटा सकता है...

नहीं कोई नहीं लुटा सकता...

शनिवार, 15 जनवरी 2011

जाकिर भाई से मौज

मेरा ब्‍लॉगिंग के जरिए जाकिर जी से पुराना रिश्‍ता है। वे ज्‍योतिष की पूछ फाड़ने में लगे रहते हैं और मैं साइंस की पूछ पकड़ने की कोशिश करता रहता हूं। किसी जमाने में फ्रीडम फाइटर हुआ करते थे, फिर सर्विस फाइटर और पीएमटी और पीईटी फाइटर हुए। आजकर ब्‍लॉगर फाइटर होते हैं। ऐसे ही मैं और जाकिर अली रजनीश जी ब्‍लॉगर फाइटर हैं। और आप पाठकगण तो हम दोनों की मौज तो लेते ही रहते हैं। खैर मैं पहले क्‍लीयर कर देना चाहता हूं कि मैं जाकिर अली रजनीश जी से मौज ले रहा हूं। वे बुरा न मानें...


उन्‍होंने कुछ माह पहले मुझे जन्‍मदिन की शुभकामनाएं दी। निश्‍चय ही हृदय से दी... मैं उनका शुक्रगुजार हूं, लेकिन चार दिन से बिस्‍तर पकड़े पकड़े आखिर मैंने उन शुभकामनाओं को दोबारा देख लिया तो तगड़ा झटका लगा... आप भी देखिए...
आपकी दुआएं भी सांप के काटने जैसी लगेंगी तो सांप से कटवाकर ही खुश हो जाएंगे, कुछ भी नहीं करेंगे :)

शक्ति के नियम और पतंगबाजी...

हर बार मकर संक्रांति पर जयपुर वाले जमकर पतंगें उड़ातें हैं और बीकानेर वाले आखातीज को याद करते हैं। आपको क्‍या लगता है, इस बार कुछ नया हुआ होगा, नहीं बिल्‍कुल नहीं। इस बार भी वही हुआ।
लेकिन मैंने कुछ अलग करने की ठानी है।
पतंगबाजी के बीच से कुछ छानकर
निकालने को छननी तानी है।
गौर किया तो पता लगा कि पतंगबाजी में शक्ति के कुछ नियम छिपे हैं। सर्दी से जकड़कर तीन दिन से घर में पड़ा हूं, सो शक्ति के नियमों और पतंगबाजी का घालमेल ही क्‍यों न तैयार कर लिया जाए। तो पेश है कुछ नियम...


पहला नियम
कभी हवा के खिलाफ जाकर पेंच मत लड़ाओ... हमेशा आपकी ही पतंग कटेगी, हां आपमें अगर माद्दा है कि आप लपाते (खींचते) रह सकते हैं आखिरी हाथ तक तो ही आप विरोधी की पतंग काट पाएंगे। वरना हवा के रुख के खिलाफ जाते ही आपकी पतंग ढीली पड़ जाएगी।

दूसरा नियम
फटी हुई पतंग से अपनी पतंग दूर रखो... इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे कोई बिजनेस डूब रहा हो और आप उसे लेकर ट्रेड में कूद पड़ें। आपका पैसा डूबना तय है। नैतिकता और आत्‍मविश्‍वास जैसे पहलुओं से भी इसे जोड़ा जा सकता है।

तीसरा नियम
अपने पीछे वाले से लम्‍बे पेंच मत लो... पीछे वाले पतंगबाज की पतंग हमेशा आपकी पतंग से भारी रहेगी। ऐसे में या तो पेंच करने से बचो या एक बार में ही पतंग काट दो, लम्‍बे पेंच लिए तो आपकी पतंग कटनी तय है।

चौथा नियम
पासे वाली पतंग आपको सक्रिय रखेगी... ऐसी पतंग जो मैन्‍युफैक्‍चरिंग डिफेक्‍ट के कारण एक ओर झुक रही हो, वह हमेशा आपको सक्रिय रखेगी, लैस प्रिडिक्‍टेबल होने के कारण उसके कटने की आशंका भी कम रहेगी।

पांचवा नियम
हवा न हो तो पतंग उतार लो.. हवा का बहाव अचानक बंद हो जाए तो बढ़ी हुई पतंग को समय रहते उतार लेना चाहिए, वरना मांझा झोळ खा जाता है, इससे पतंग लुटने का डर बना रहता है। बढ़ी हुई पतंग का लोभ न करें और हवा आने पर दोबारा उड़ा लें।

छठा नियम
कटी हुई पतंग का आकर्षण... कटी हुई पतंग मुफ्त माल की तरह होती है, उसे कभी जाने मत दो। कटी हुई पतंग का धागा सही पिरोया हुआ होता है, तभी तो वह उड़कर कटती है। दूसरी ओर कटी पतंग के साथ आए मांझे को भली भांति चैक करने के बाद ही काम में लें, अगर उपयुक्‍त धागा नहीं है तो लोभ न करें उसे फेंक दें और बढि़या धागे के साथ उड़ाएं।

सातवां नियम
विजय उत्‍सव जोर से मनाएं... एक या दो पतंग काट लेने के बाद अपनी पतंग को आसमान में ऊंचा टांग दें। दूसरे पतंगबाज जिन्‍होंने पहले दो पेंच देखें होगे वे करीब नहीं आएंगे और नए पतंगबाज पहले नीचे की पतंगों से उलझेंगे। ऐसे में आपकी पतंग देर तक आसमान में टिकी रहेगी। ऐसा आप बिना एक भी पतंग काटे भी कर सकते हैं।

आठवां नियम
आखिर में सादा लगाना ही पड़ेगा... आप अगर बढि़या सुता हुआ मांझा इस्‍तेमाल करते हैं तो भी आपको पतंग के काफी बढ़ जाने पर आखिर में सादा सफेद धागा लगाना ही पड़ेगा। वरना पतंग के जोर से खुद की ही अंगुलियां कटेंगी। ऐसे में ध्‍यान रखें कि किसी को दिखाने की बजाय समय पर सफेद धागा जोड़ दिया जाए, ताकि सुते हुए मांझे का अधिक नुकसान नहीं हो।

मकर संक्रांति की शुभकामनाएं...

रविवार, 28 नवंबर 2010

राजा हसन के साथ एक और फोटो

राजा हसन के साथ एक और फोटोग्राफ। कल मैंने इसका इंटरव्‍यू लिया था। कई नई बातें सामने आई...



Posted by Picasa

शनिवार, 20 नवंबर 2010

उसने ईश्‍वर के लिए गाया था

हां मैंने देखा एक बच्‍चा वह किसी को खुश करने या किसी लालच में नहीं बल्कि अपनी धुन में गा रहा था। रेगिस्‍तान की मिट्टी न केवल जीवटता देती है बल्कि राग का भी वरदान बिना मांगे दे देती है। मैं इस बच्‍चे का नाम नहीं जानता, जाति नहीं जानता... हां यह गडरिया है जो बकरियां लिए घूम रहा था। एक जगह किसी बन्‍द घर के आगे बैठा कागजों के छोटे टुकड़ों से खेल रहा था और गाता जा रहा था। कॉलोनी के लोग मंत्रमुग्‍ध खड़े उसे सुन रहे थे। केवल मैंने धृष्‍टता की ईश्‍वर की उस आवाज को रिकॉर्ड करने की। मैंने सोचा आप भी आनन्‍द ले सकेंगे इस शुद्ध आवाज का। सुनिएगा... यह मेरा पहला वीडियो कास्‍ट है... 



मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

एक महत्‍वपूर्ण वीडियो एड्स से सम्‍बन्धित...

साइंस ब्‍लॉगर्स एसोसिएशन की वेबसाइट पर यह महत्‍वपूर्ण वीडियो दिखाई दिया। मुझे लगा कि लोगों को इस बारे में पता लगना चाहिए। सो मैंने इसे अपने ब्‍लॉग पर भी लगाने का विचार बनाया। आप देखिए कि क्‍या हकीकत है एड्स की... कुछ बातें सोचने के लिए मजबूर करती हैं। हो सकता है एड्स से लोग मर रहे हों, लेकिन क्‍या यह वही एड्स है जिसे लेकर पूरी दुनिया में तहलका मचा हुआ है।

गूगल वीडियोज पर इसके साथ के अन्‍य वीडियो भी मिल जाएंगे।

रविवार, 1 अगस्त 2010

सतत क्रांति के दौर में...

एक जगह ओशो ने लिखा कि भारत सतत क्रांति के दौर से गुजर रहा है। मैं भी क्रांति करने के मूड में आ गया। कई तरह की क्रांतियां की। जिस जमाने में बच्‍चों को साइकिल भी नहीं दी जाती थी, उन दिनों में एम-80 चलाई। यानि ग्‍यारह साल की उम्र में चार फीट की हाइट के साथ अपनी अस्‍सी किलोग्राम वजनी नानी को पीछे बैठाकर पांच किलोमीटर दूर स्थित स्‍कूल में छोड़कर आता था। इसके बाद दूसरी क्रांति तब हुई जब दसवीं पास करने पर साइकिल खरीदने का फैशन आउट होने के बाद साइकिल खरीदकर लाया। घर वालों ने दिलाने से मना कर दिया तो, खुद अकेला जाकर खरीद लाया। भले ही बाद में अपने उस निर्णय पर पछतावा हुआ। ग्‍यारहवीं और बारहवीं कक्षा में जितने ट्यूशन थे सब साइकिल पर आ गए। घर में मोटर वाले वाहन होने के बावजूद पैरों का पानी गन्‍ने की तरह निकल गया। टांगें भी कमोबेश गन्‍ने की तरह हो गई। लेकिन एक सच्‍चे क्रांतिकारी की तरह दूसरे सभी युवकों और युवतियों को वाहनों पर जाते देख न केवल व्‍यंग्‍य से मुस्‍कुराया करता बल्कि अपने साइकिल चलाने की सार्थकता पर भी लगातार सोचता रहता।
27072010135
फोटो - साभार कान्‍हा जोशी


पुरातनपंथियों ने भी मुझे बरगलाने में कोई कसर नहीं रखी। मुझे बताया गया कि ज्‍यादा साइकिल चलाने से घुटने खराब हो जाते हैं, पाइल्‍स की समस्‍या हो जाती है। एक ने तो आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि इससे हृदय गति तक रुक जाती है।
खैर कुछ सालों बाद एक पुराने स्‍कूटर ने मुझे बदलाव का रास्‍ता दिखाया। नई नौकरी के साथ मिला पुराना स्‍कूटर मेरी बहुत कड़ी परीक्षा लेता और मैं फिर से साइकिल के बारे में सोचने लगता। शादी के साथ पल्‍सर मिली। तब से लेकर छह दिन पहले तक किक मारने के लिए भी टांग नहीं हिलाई। लम्‍बे समय तक आराम की अवस्‍था ने एक बार फिर क्रांति की स्थितियां पैदा कर दी।
कई दिन तक सोचने, कसमें खाने, वादे करने और मन को कड़ा करने की कार्रवाई के बाद एक ऐतिहासिक दिन (डेट तो रसीद में लिखी हुई होगी, उठकर देखूंगा तो फ्लो टूट जाएगा) मैं फिर से साइकिल खरीद लाया। इस बार थोड़ी स्‍टाइलिश है। थोड़ी इसलिए कि भाई साथ में था। वह पुरातनपंथियों की साजिश में हमेशा साथ रहता है। उसने गियर और शॉकर वाली साइकिल के विरोध में अपना वीटो पावर पेश कर दिया। सो दोनों तरह की खासियत इस साइकिल में शामिल नहीं कर पाया। जो भी हो इसके हैण्‍डल सीधे-सीधे नहीं है, यानि सीधे हैं पुरानी साइकिलों की तरह टेढ़े नहीं हैं।
पांच दिन से साइकिल चलाकर बीकानेर में सतत क्रांति के दौर को फिर से जगाने का प्रयास कर रहा हूं। अब तक कुल जमा 23 लोगों ने साइकिल का ट्रायल लिया है। दस मीटर से लेकर सत्‍तर मीटर तक के ट्रायल हुए हैं। मेरे कपड़ों, मोबाइल, घड़ी और दूसरे सहायक उपकरणों की तुलना में पांच ही दिनों में साइकिल ने दस गुना कमेंट बटोर लिए हैं।
इसी के साथ एक रहस्‍योद्घाटन भी हुआ है कि गरीब, दलित, पिछडि़त, दया का पात्र व्‍यक्ति साइकिल चलाए तो उस पर कोई ध्‍यान नहीं देता, लेकिन एक मोटा, चमकते चेहरे वाला, जींस टीशर्ट पहना आदमी तबियत से धीरे-धीरे साइकिल चलाता जाए और उसके चेहरे पर खुशी के भाव हो तो पास से मोटर वाले दुपहिया या चार पहिया वाहन पर निकल रहा व्‍यक्ति भी पहले तो गौर से देखता है फिर ईर्ष्‍या से भर उठता है। ऐसे लोगों के भाव तो अधिक मुखरता से सामने आते हैं जिनके वाहन का पैट्रोल खत्‍म हो चुका होता है और वे सामने से अपनी गाड़ी घसीटते हुए आ रहे होते हैं।

जो भी हो एक और क्रांति का सूत्रपात हो चुका है, जल्‍द ही बीकानेर में साइकिल चलाने वालों की संख्‍या बढ़ी हुई दिखाई देने लगेगी। मैंने यह नहीं कहा कि संख्‍या बढ़ जाएगी...

यह सावन के अंधे वाली बात भी हो सकती है... :)

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

सुपरमैन का कंफ्यूजन और सुपर ब्‍लॉगर

मुझे लगता है सुपरमैन शुरू से ही कंफ्यूज है। पहले तो लगता था कि कंफ्यूज है लेकिन अब लगता है कि उस पर जानबूझकर इस प्रकार का द्वंद्व थोपा गया है। सुपरमैन खाली उड़ने वाला सुपरमैन नहीं है। मेरे सुपरमैनों में स्‍पाइडरमैन, बैटमैन, हीमैन, सुपर कमाण्‍डो ध्रुव, नागराज, फैण्‍टम, मैण्‍ड्रेक, लोथार, साबू और भी जो नाम आपको याद आते हों और जिनके पास अपनी खुद की शक्तियां हों, इसमें जोड़ सकते हैं।
अब आप कहेंगे ये लोग तो बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट तरीके से अपना काम करते हैं। अच्‍छे लोगों की रक्षा करते हैं और बुरे लोगों को दण्डित करते हैं। लेकिन मुझे यह बात इतनी सीधी नहीं लगती है। इसमें कुछ लोचा है। ये सभी लोग पहले की बनाई गई व्‍यवस्‍था को ही फॉलो कर रहे हैं। न तो उसमें बदलाव ला रहे हैं न व्‍यवस्‍थापकों को बदलाव लाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। और तो और पिछले दिनों आए एक्‍समैन ने भी अच्‍छी ताकतों के साथ मिलकर अच्‍छे काम में सहयोग देना शुरू कर दिया।

ऐसा क्‍यों

उन्‍हें क्‍यों पहले से बनी व्‍यवस्‍था को ही फॉलो करना चाहिए जबकि
- उनके पास नैसर्गिक ताकत है
- पूर्व के किसी भी आम इंसान की तुलना में अधिक बुद्धि है
- पहले से अर्जित किसी भी ज्ञान से अधिक ज्ञान है
- किसी भी सत्ता के प्रति जवाबदेही नहीं है
- पृथ्‍वी के भीतर या ब्रह्माण्‍ड में कहीं उन्‍हें रुकना नहीं है
- ताकत और बुद्धि के अलावा कम जरूरतें उन्‍हें स्‍वतंत्र प्रभुसत्ता देती हैं
- वे खुद बेहतरीन न्‍याय कर सकते हैं
- उन्‍हें सलाखों में कैद नहीं किया जा सकता
- राजनीति से वे परे हैं
- सामाजिक बंधन उन्‍हें बांध नहीं सकते
-  वे पलक झपकते ही कहीं भी पहुंच सकते हैं
और भी ऐसी हजारों विशेषताएं जो किसी आम मानव की तुलना में उन्‍हें श्रेष्‍ठ बनाती है। इसके बावजूद वे उसी व्‍यवस्‍था का हिस्‍सा बनते हैं जो व्‍यवस्‍था पहले से बनी हुई है। वे उसमें बदलाव नहीं लाते, बल्कि व्‍यवस्‍था को तोड़ने वाले लोगों को दण्डित करते हैं। पिछले दिनों हैनकॉक आया और उसके बारे में पढ़ा तो लगा कि हां यह है असली सुपरमैन, लेकिन फिल्‍म के अंत तक वह भी आम सुपरमैन बन गया। अच्‍छे कपड़े पहन लिए और समाज की सेवा करने लगा। तो क्‍या सुपरमैन केवल समाज की सेवा के लिए अतिरिक्‍त शक्तियां लेकर आते हैं।

वास्‍तव में सुपरमैन कर क्‍या रहे हैं-
- कानून तोड़ने वालों को दण्‍ड देते हैं
- व्‍यवस्‍था को बनाए रखने में सहयोग देते हैं
- निर्बल लोगों को समस्‍याओं से बाहर निकालते हैं
- अंडर कवर बने रहकर सामान्‍य जिंदगी जीते हैं
- कानून का पालन करते हैं
- राजनीतिज्ञों, पुलिस, प्रशासन, समाज के ठेकेदारों, बॉस, परिवार जैसी इकाइयों का सम्‍मान करते हैं
- सुंदर बने रहते हैं और सुंदर और सभ्‍य लोगों का सम्‍मान करते हैं
- लोगों की केवल उतनी मदद करते हैं कि वे फिर से खड़े होकर पूर्व स्‍थापित व्‍यवस्‍था के लिए काम कर सकें
- बुरे लोगों को पकड़ते हैं और उन्‍हें पुलिस के हवाले कर देते हैं
- पुल को गिरने से बचाते हैं, रेल को ट्रेक पर बनाए रखते हैं, ट्रॉली को नदी में गिरने से रोकते हैं
ये सभी काम तो पहले से स्‍थापित व्‍यवस्‍था के लोग कर ही रहे हैं। सुपरमैनों के इन कामों को देखकर तो लगता है कि लोगों का व्‍यवस्‍था से जुड़े कार्मिकों पर से विश्‍वास उठ गया है। अब आम जनता को ऐसे लोग चाहिए तो तन-मन और धन से उनकी सेवा तो करें, लेकिन अंडर कवर रहकर कुछ भी बदले में नहीं मांगे। ऐसा क्‍यों, भगवान का अवतार अधर्म को खत्‍म कर धर्म को फिर से स्‍थापित करने के लिए ही होता है। इंसान की बनाई व्‍यवस्‍था ढहने लगती है तो वह उसे सुधारने के बजाय भगवान को याद करता है। उन्‍हें कहता है आओ और मुझे फिर से अपने कंफर्ट जोन में लौटा दो। जब से भगवान ने आना बंद किया है इंसान ने सुपरमैन को बुलाना शुरू कर दिया है।

तो सुपरमैन ऐसा क्‍यों नहीं करते कि-
- वे अपनी शक्तियों के इस्‍तेमाल का राज्‍य और सरकार से कर वसूलना शुरू कर दें
- अंडर कवर रहने के बजाय एक नई व्‍यवस्‍था बनाएं जो राज्‍य के सामानान्‍तर चले
- वे खुद अपने स्‍तर पर न्‍याय करें। जो लोग सही है उन्‍हें प्रशय दें और जो गलत हैं उन्‍हें अपने स्‍तर पर ही दण्डित कर दें
- वे ऐसे विचार लेकर आएं जो हर जगह क्रांति कर दे
- वे ऐसे लोग तैयार करें जो उनकी तरह ही अपनी सामान्‍तर सत्ता चलाएं
- वे लोगों को सुपरमैन बनने के लिए प्रशिक्षित करें
वे खूब बच्‍चे पैदा करें और पूरी पृथ्‍वी को सुपरमैन की नई प्रजाति से भर दें, ताकि अक्षम और नाकारा हो चुके इंसान पूरी तरह खत्‍म हो जाएं जैसा कि होमो सैपियंस ने नियंडरथल मानव के साथ किया होगा। यह नई सुपरमैन प्रजाति ही पृथ्‍वी पर राज करे और किसी दूसरे को विकसित ही नहीं होने दे। बिल्‍कुल वैसे जैसे बरगद अपने नीचे किसी दूसरे पौधे को विकसित नहीं होने देता।

पर ऐसा नहीं होगा- क्‍योंकि आखिर सुपरमैन भी तो इंसान ने ही बनाए हैं। और जब इंसान ने अपने लिए सुपरमैन बनाए हैं तो वे इंसान की ही सेवा करेंगे, न कि उन्‍हें मारकर अपनी दुनिया बनाएंगे।

तो कैसा होगा सुपर ब्‍लॉगर
- पहले से स्‍थापित ब्‍लॉगरों को फॉलो करने वाला
- पहेलिया लिखने के दौर में पहेलिया लिखने वाला
- भड़ास निकालने वाला
- पुरानी डायरी से निकालकर कविता लिखने वाला
- दूसरे के ब्‍लॉग पर केवल अच्‍छे अच्‍छे कमेंट लिखकर उन्‍हें प्रोत्‍साहित करने वाला
- आस-पास के लोगों को प्रेरित कर उनके भी ब्‍लॉग शुरू कराने वाला


या मन की बातें बिंदास होकर लिखने वाला.....:) 

रविवार, 13 जून 2010

प्रेम का शिकारा

मैंने शिकार नहीं शिकारा ही लिखा है। दरअसल पति और पत्‍नी शादी के तुरंत बाद गृह‍स्‍थी के शिकारे पर आ गिरते हैं। कश्‍मीर की वादियों जैसी खूबसूरत लगने वाली दुनिया में घर एक डल झील बन जाता है और पति और पत्‍नी शिकारे में...
LadyinShikara
अब शिकारे में तो एक ही व्‍यक्ति बैठ सकता है तो दूसरे का क्‍या होता है... यही तो सबसे महत्‍वपूर्ण बिंदू है। वास्‍तव में शिकारे में एक ही आदमी होता है। दूसरा तो पानी में उतराता रहता है। कभी पति शिकारे में तो पत्‍नी पानी में और कभी पत्‍नी शिकारे में तो पति पानी में दिखाई देते हैं। कब, कौन, किसे और कैसे पानी में धकेलने में कामयाब होता है यह व्‍यक्तिगत स्किल पर निर्भर करता है। आमतौर पर पुरुषों को ही अधिकतर पानी में देखा गया है, लेकिन कई बार पत्नियां भी पानी में आ गिरती हैं। पर, मूढ़ पुरुषों की तुलना में वे पानी में कम वक्‍त बिताती हैं। यही नहीं जब पत्‍नी शिकारे में होती है तो झील में भ्रमण को दौरान शिकारे को धक्‍का भी पतिदेव से ही लगवाती हैं। आप अगर शादीशुदा हैं तो इस स्थिति से रोजाना ही रूबरू होते होंगे।

दरअसल शिकारे की सवारी के कई नियम हैं। पता नहीं ये शाश्‍वत हैं कि नहीं, लेकिन शादी के बाद से अब तक पिछले पांच सालों में मुझे इनकी इटरनिटी पर कोई संदेह नहीं रहा है। आप भी विश्‍वास कर सकते हैं।
पहला नियम: शिकारे में एक बार में केवल एक ही खिलाड़ी बैठ सकता है, इसमें बैठने का आपके पास ठोस कारण होना चाहिए, वरना आप खुद ब खुद पानी में आ गिरेंगे।
दूसरा नियम: पानी से निकलने के लिए सही समय का इंतजार करें, समय से पहले बाहर निकल आए तो शिकारा भरा हुआ मिलेगा और फिर से पानी में जा गिरेंगे।
तीसरा नियम: एक बार शिकारे पर जमने के बाद पानी में गिरे साथी को शिकारे में पहुंचने के लिए हाथ देने का उपक्रम करें, भले ही आपके हाथ में तेल ही क्‍यों न लगा हो।
चौथा नियम: जितनी बार आप फिसलकर पानी में गिरेंगे आपके शिकारे में लौटने का प्रयास करने की समयावधि भी बढ़ती जाएगी।
पांचवा नियम: एक बार पानी में गिर ही पड़ें तो कुछ देर वहीं बने रहें, बिना वजह खुद को शिकारे में होने का धोखा न दें... आखिर हार मानने का जज्‍बा भी तो होना चाहिए।

नोट: ध्‍यान रखें कि जब आप दोनों ये खेल खेल रहे हों तो किसी और को आपके शिकारे या पानी में होने की स्थिति का पता नहीं चले। इससे केवल जगहंसाई ही हो सकती है। सॉल्‍यूशन नहीं मिलेगा। सो निजी प्रयासों से खेल को चालू रखें और बाहर के लोगों को बाहर रखें। आखिर खेल आपका है और खेल का मजा भी आपका निजी है... :)

सोमवार, 24 मई 2010

उफ़ ये गर्मी

इन दिनों बीकानेर में पारा ४७ डिग्री के पार है और हवा में नमी ५ से ७ प्रतिशत बनी हुई है. 
ऐसे में मटकी का ठंडा पानी अमृत की तरह लगता है. 

रविवार, 16 मई 2010

सूनी-सूनी अक्षय तृतीया

आज मैं अपने अनुज आनन्‍द के साथ शहर की तंग गलियों के बीच घूम रहा था तो कुछ पुराने घर दिखाई दिए। अपने नानी के खाली पड़े घर के करीब से गुजरते हुए भी उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की। पास ही एक घर में हम कुछ दिन किराए पर रहे थे, उसकी छत पर आज दूसरे लोग दिखाई दिए। परकोटे में शहर खाली पड़ा था। गलियों और मोहल्‍लों में छाया सूनापन जैसे दिल में उतर गया।

आज अक्षय तृतीया थी, सुबह चार बजे लोग छतों पर चढ़ गए और दिन ढलने पर नीचे उतरे। करीब पच्‍चीस साल तक मेरा भी यही क्रम रहा, लेकिन इस साल कब अक्षय तृतीया आ गई और गुजर गई पता ही नहीं चला। पंद्रह सौ पैतालीस विक्रम संवत में राव बीका ने बीकानेर शनिवार के दिन अक्षय तृतीया पर बीकानेर रियासत की नींव रखी थी। इसी दिन को लोग स्‍थापना दिवस के रूप में 523 साल बाद भी उसी जोश और उमंग के साथ मना रहे हैं।

जिन घरों के करीब से गुजरा था वहां की छतों की खूब यादें जेहन में उमड़ रही हैं। अक्षय तृतीया से पंद्रह दिन पहले से ही मेरे जैसे नौसिखिए पतंगबाजी करनी शुरू कर देते थे।

...बोई काट्या हे,

उडा रे उडा,

थारी नाकड़ ऊपर

घूम रयो, घूमाय रयो

उडा रे उडा....

सालों-साल छत पर चढ़े हुए कई अनुभवों से गुजरा। पहले सिर्फ पतंगबाजी करने के लिए छत पर चढ़ता था। बाद में आस-पड़ोस की सुंदर कन्‍याएं भी देखने लगा। उसके बाद ज्‍योतिष के अध्‍ययन के दौरान हवा का रुख देखता रहता था। तीन-चार साल तक उसी आधार पर खरी-खोटी भविष्‍यवाणियां भी की। कुछ सही रही तो कुछ सिरे से ही गलत हो गई। दोस्‍तों से लड़ाई और दुश्‍मनों से दोस्‍ती तक के काम छतों पर निपट जाते। कभी सी-28 या बरेली का सॉलिड मांझा हाथ लग जाता तो, अश्‍वमेघ यज्ञ शुरू हो जाता। हवा की दिशा की सारी पतंगे काटने तक चुपचाप पेच लड़ाते जाते और अंत में पूरी ताकत से चिल्‍लाते.. बोई काट्या हे...

इस साल ऐसा कुछ नहीं हुआ। बीती रात ऑफिस में काम की अधिकता के चलते देर से घर पर आया, फिर देर तक सोता रहा, फिर गर्मी बढ़ गई। मौसम विभाग में लगे थर्मामीटर में पारा 45:5 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया। छतों पर इससे तीन डिग्री तक अधिक तापमान होता है। यानि 49 के करीब। ऐसी गर्मी पहले भी रहती थी, लेकिन महसूस नहीं होती थी, लेकिन आज तो छत पर चढ़ने की हिम्‍मत ही नहीं कर पाया। शाम को अकेला छत पर चढ़ा। दोस्‍त तो सारे बीकानेर छोड़ चुके हैं। भाई को शौक नहीं रहा। सो दो-तीन पतंगें उड़ाकर नीचे चला आया। अब पोस्‍ट लिख रहा हूं। मैं सोचता था, पतंग उड़ाने वाले खुद भी ऊंची उड़ाने भरते हैं, लेकिन आज लगा जैसे जमाना ठहर गया हो...

काश अगली आखातीत कुछ मस्‍त गुजरे...

रविवार, 2 मई 2010

और मैं बन गया इल्‍ली

मैं सच्‍ची मुच्‍ची इल्‍ली बन गया था। जब तक मुझे अपनी गलती का तब तक तो मैं पेस्टिसाइड से त्रस्‍त इल्‍ली की तरह तड़प रहा था। बहुत साल पहले शरद जोशी का व्‍यंग्‍य पढ़ा था, जीप में सवार इल्लियां, तब चने के खेत में घूम रहे सरकारी अधिकारियों पर कटाक्ष करते हुए शरद जोशी ने उन्‍हें फसल को तबाह करने वाली इल्लियों की संज्ञा दी थी। तब पढ़ते हुए मुझे सरकारी अधिकारियों से घृणा होने लगी थी, लेकिन बाद में मैंने भी वही गलती की...

ber

हुआ यूं कि, कुछ साल पहले हमारे एक वरिष्‍ठ साथी के अवकाश पर जाने के कारण मुझे यहां राष्‍ट्रीय शुष्‍क बागवानी संस्‍थान की रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी दी गई। मैंने सोचा शोध संस्‍थान है तो निश्‍चय ही शोध संबंधी अच्‍छी खबरें मिलेंगी। सो पहले दिन ही पूरे जोश से पहुंच गया और प्रधान वैज्ञानिक के कमरे में बैठकर काफी देर तक उनसे कभी यह कभी वह पूछता रहा। पता नहीं अधिकारी ने क्‍या समझा, उन्‍होंने बातों के बीच मुझे बताया कि हमने बेर की सैकड़ों किस्‍में विकसित की हैं। और इन दिनों उनमें से काफी में फल आए हुए हैं। चलिए मैं आपको दिखा देता हूं।

वैज्ञानिक महोदय मुझे लेकर पहुंच गए संस्‍थान के रिसर्च फील्‍ड में, जहां बेर की छोटी-बड़ी झाडि़यों पर लाल, पीले बेर लगे हुए थे। कुछ बिल्‍कुल बेर थे, तो कुछ नींबू जितने और कुछ छोटे सेव के आकार के भी थे। मैं उनके बारे में कुछ जानकारी लेता, उन्‍होंने झाड़ी के सबसे अच्‍छे बेर उतारकर मुझे दिए। मैंने मना कर दिया...

लेकिन उनका आग्रह चलता रहा, कुछ देर बाद ही बेर के स्‍वाद और क्‍वालिटी के बखान के साथ आग्रह प्रबल हो गया, मैंने बेर खाने शुरू कर दिए। करीब पंद्रह प्रजातियों के तीस से अधिक बेर खाने के बाद रिपोर्ट लेकर ऑफिस आ गया।

अभी स्‍टोरी बना ही रहा था कि पेट में दर्द शुरू हो गया। कुछ देर तक मैंने इग्‍नोर किया, लेकिन दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था। कुछ देर में तो ऐसी ऐंठन हुई कि सीधा भी बैठ नहीं पा रहा था। आखिर उठा और पास के मेडिकल स्‍टोर पर जाकर पेटदर्द की दवा ली। इसके बाद भी घंटेभर तक ऐंठन वाला दर्द बना रहा। रात आठ बजे तक मेरी स्थिति में कुछ सुधार हुआ।

अब सोचने का मौका मिल रहा था। कुछ देर सोचने के बाद मेरी हंसी छूट गई। हमारे वरिष्‍ठ साथी ने पूछा क्‍या हुआ तो मैंने कहा आज मैं इल्‍ली बन गया था। शरद जोशी की इल्लियां जीप में सवार होकर चने को खराब करने पहुंची थी, भले ही मैंने ज्‍यादा नुकसान नहीं पहुंचाया लेकिन काम तो वैसा ही किया था।

आज ये किस्‍सा ध्‍यान में दोबारा इसलिए आया कि पिछले दिनों मुझे राष्‍ट्रीय उष्‍ट्र अनुसंधान केन्‍द्र की बीट सौंपी गई, पहली विजिट में ही वहां के पीआरओ ने मुझे कैमल मिल्‍क से बनी आइसक्रीम खिलाने का ऑफर दिया... इल्‍ली वाला किस्‍सा ध्‍यान में आते ही मैंने आइसक्रीम के लिए सख्‍ती से मना कर दिया...

वह पीआरओ अब भी सोच रहा है कि मैं केन्‍द्र से नाराज हूं जबकि मैं इल्‍ली बनने से बचने की कोशिश कर रहा हूं...

पता नहीं भलमानस में या आग्रह नहीं टाल पाने के कारण कितने लोग इल्‍ली बन जाते होंगे... क्‍या आप भी बने हैं कभी इल्‍ली... 

गुरुवार, 25 मार्च 2010

सर्वाधिक मूर्खताएं - माइक्रोपोस्‍ट

इंसान तीन जगहों पर सर्वाधिक मूर्खताएं करता है

बच्‍चे के साथ

शीशे के सामने

और प्रेमिका के साथ उसके सामने...

रविवार, 14 मार्च 2010

नींद - एक और कविता पुरानी डायरी से

जैसा कि मैं स्‍वीकारोक्ति कर चुका हूं कि मुझे पद्य की समझ नहीं है इसके बावजूद मैंने कुछेक धृष्‍टताएं इस क्षेत्र में की हैं।
ऐसी ही एक कविता... पता नहीं कैसी है...

प्‍यारी नींद


आज फिर तैयार हो निकला मैं
इस संग्राम में
नई भोर में नया जीवन लिए
भिड़ने को तैयार मैं
दिनभर जूझा, दिनभर लड़ा
थक गया उस शाम मैं
फिर सुहानी रुपहली उस शाम को
मस्‍ती में डूबा रहा मैं
फिर अकेले बैठ बिताए
कुछ तन्‍हाई के पल मैंने
खो गया चैन,
ले ली बेचैनी मैंने
उड़ गई नींद
जागता रहा सारी रात मैं
समझ न पाया समझ में
क्‍या खो दिया कुछ पाने में
घावों को भरने वाली
नींद को छोड़ दिया मैंने
जो मीठी नींद दे सकती थी
फिर लड़ने की ताकत मुझे
तोड़ा उस नींद से नाता
जागता रहा सारी रात मैं...

सिद्धार्थ - 13-4-2002

एक अभिव्‍यक्ति

आज पुरानी डायरी में दो पंक्तियां दिख गई... 
सफाई का काम छोड़कर पहले उन्‍हें ही पोस्‍ट करने बैठा हूं... 
मेरी पद्य की दो-चार रचनाओं में से एक.... 



वक्‍त की मौज ने हमको देखा है एक बार 
अब तो हमीं याद करते हैं बिताए पलों को बार-बार









मंगलवार, 9 मार्च 2010

फिर जुड़ गया होम्‍योपैथी से

सालों पहले, यानि वर्ष 1997 और उससे पहले मेरे दिन के कुछ घंटे चाहे-अनचाहे होम्‍योपैथी के साथ गुजरते थे। रोग हो या न हो, सत्‍यव्रत सिद्धांतावलंकार, बोरिक और नैश पढ़ने को मिल जाते थे। कई बार क्‍लार्क की रैपरेटरी के पन्‍ने भी उलटने पड़ते। यह सब होता मेरे पड़नानाजी स्‍वर्गीय माधोदासजी व्‍यास के सानिध्‍य के कारण। मेरे नानीजी के पिताजी। कभी उन पर पूरी पोस्‍ट लिखूंगा। यहां बस यह उल्‍लेख कर देना चाहता हूं कि 78 साल की उम्र में उन्‍हें एक बार लगा कि होम्‍योपैथी दवाएं भी कारगर हो सकती हैं, और उन्‍होंने होम्‍योपैथी पढ़नी शुरू कर दी और बाद में एक रोगी को तो मृत्‍युशैय्या से लौटा लाए थे। वर्ष 1999 में उनके निधन के साथ होम्‍योपैथी का सफर भी थम गया। उनके बारे में बाकी बातें बाद में,

हां, मैं फिर से लौट आया हूं होम्‍योपैथी के साथ।

कुछ दिन पहले पैट्रोल पम्‍प से महज बीस कदम की दूरी पर पैट्रोल खत्‍म हो गया। मैंने सोचा जय गणेश, और उत्‍साह में अपनी पल्‍सर से उतरा और उसे घसीटने लगा। अभी पांच सात कदम ही गया होउंगा कि ब्‍लैक आउट हो गया। आंखों के आगे अंधेरा। मैं जहां का तहां खड़ा रह गया। इसके कुछ दिन बाद शिक्षा निदेशालय की सीढि़या तेजी से चढ़ गया, ऊपर के माले पर पहुंचकर फिर वही स्थिति हुई। मैंने किसी को कहा तो नहीं लेकिन ऑफिस में कचौरी समोसे खाने बंद कर दिए, जो रोजाना शाम को किसी न किसी बहाने आ जाते हैं।

निदेशालय में ही मिले शिवकुमार आचार्यजी उर्फ भाईजी, एक दिन वहां की कैंटीन में ही कचौरी की शर्त लग गई। मैंने कहा खाउंगा तो नहीं लेकिन हार गया तो खिला दूंगा। इस पर भाईजी ने पूछा क्‍यों, पहले तो मैं टाल मटोल करता रहा लेकिन बाद में मैंने उन्‍हें बता दिया। उन्‍होंने मुझे कहा एक बार मेरे घर आना। तब तक मुझे पता नहीं था कि वे होम्‍योपैथी का अध्‍ययन करते हैं। उन्‍हें सेंट्रल नर्वस का कोई डिसऑर्डर हुआ था बीसेक साल पहले, तब ऐलोपैथी के सभी ईलाज आजमाने के बाद उन्‍होंने होम्‍योपैथी पढ़नी शुरू कर दी थी। नर्वस डिसऑर्डर तो अभी भी वहीं है लेकिन दूसरे कई रोगों को ठीक करने में उन्‍होंने महारत हासिल कर ली है।

भाईजी के यहां गया तो वहां भाभीजी ने चाय के साथ भुजिया और खाखरे परोसे। मैंने चाय पी ली लेकिन दूसरी किसी चीज को हाथ नहीं लगाया। इस पर भाभीजी तो नाराज हो गए लेकिन भाईजी मुझे अपने कमरे में ले गए। वहां उनकी अलमारी में होम्‍योपैथी की दवाओं का भण्‍डार बना हुआ था। उन्‍होंने मुझे गैस मिक्‍सचर नाम की एक दवा की खुराक दी। गैस के कारण सिरदर्द हो रहा था। वह तुरंत ठीक हो गया। तुरंत से मतलब पांच-सात मिनट में। इसके बाद उन्‍होंने मुझे नक्‍स वोमिका 200 लाकर दी। कहा रात को सोते समय कुछ दिन ले ले। तनाव के कारण तेरा शरीर खराब हो रहा है। गैस मिक्‍सचर और नक्‍स ने तीन दिन में मुझे सिरे से बदल दिया। गर्दन और पेट के किनारे बढ़ रही चर्बी एक साथ खत्‍म हो गई और शरीर में पुरानी फुर्ती लौट आई।

अब फिर से सफेद हो रहे बालों के लिए एसबीएल का जोबरांडी का तेल और शैम्‍पू ले आया हूं। एक-दो दिन में फाइव फॉस भी फिर से ले आउंगा। पुरानी सब बातें वापस याद आने लगी हैं। हो सका तो अगले कुछ दिन में होम्‍योपैथी के कुछ और पक्षों के बारे में लिखने को मिल जाएगा।

मेरे पड़नानाजी माधोदासजी व्‍यास को नमन् और भाईजी को दिल से धन्‍यवाद...

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

अच्‍छी रही इस बार की होली...

- साल दर साल होली बेहतर होती जा रही है। इस बार भी होली अच्‍छी रही।

- सौहार्द बना रहा: सुनारों, लोहारों, ब्राह्मणों, राजपूतों, नाइयों, नायकों सहित सबने अपनी-अपनी होली जलाई। किसी ने एक दूसरे की पंचायती नहीं की।

- दिल मिल गए- कॉलोनियों में जहां लोग एक-दूसरे को जानते नहीं वहां सभी ने होलिका दहन के लिए पांच से दस रुपए दिए और होलिका को देखने भी गए।

- साफ-सुथरी: अधिकांश लोग घरों में बंद रहे, जो निकले आस-पड़ोस के लोगों को थोड़ी सी गुलाल लगाकर फिर घरों में घुस गए।

- प्रदूषण भी नहीं- युवाओं ने घर-घर जाकर दो तीन हजार रुपए तो एकत्रित किए लेकिन इतनी संख्‍या में लकडि़यां लेकर नहीं आए। आस-पास का कचरा भी होलिका की भेंट चढ़ा दिया। वातावरण भी साफ हुआ और कुछ पेड़ भी कटने से बच गए।

- सितारों के साथ रहे: टीवी पर लगातार कार्यक्रम आते रहे, शोले से लेकर हाल ही में रिलीज अक्षय कुमार की फिल्‍मों के गानों में खेली गई होली को दर्शकों ने सितारों के साथ जीया। साफ सुथरी और संगीतमय होली ने फाग की रंगत को बढ़ा दिया।

- मुस्‍कुराहटों के दौर: होलिका दहन के बाद धुलण्‍डी से पहले ही कॉलोनी के लोग एक-दूसरे को रास्‍ते में देखकर होली की शुभकामनाएं देने लगे। मिलने पर एक दाढ़ से दूसरी दाढ़ तक दिखाकर विश किया। शाम ढलने तक मुस्‍कुराहटों के दौर दिखाई दिए।

- पीछे छूटा आतंक- गली मोहल्‍लों में पानी की बाल्टियों और पिचकारी लिए बच्‍चों के आतंक से भी इस बार रूबरू नहीं हुए। वह आतंक को कहीं पीछे छूट चुका है। बच्‍चों ने भी सलीके से होली खेलना सीख लिया है और बड़ों को पानी का महत्‍व समझ में आने लगा है।

- मजाक की सीमाएं तय- होली में किससे कितनी मजाक करनी है यह भी अब समझ में आने लगा है, किसी को भी ऐसे ही नहीं छेड़ सकते। सभी आपके दोस्‍त तो नहीं है, पता नहीं कौन चिढ़ जाए, बाद में लेने के देने पड़े। इसलिए सभी ने मजाक की सीमाएं तय कर ली है और छेड़ने के अंदाज भी बदल गए हैं।

गंदे शब्‍द भी नहीं- कई लोगों ने दुकानों पर डेक लगवा लिए हैं, जहां फिल्‍मी पैरोडी पर आधारित भजन बज रहे हैं, होली के नए पुराने गीत बज रहे हैं, लोग पान खाकर होली के गीत सुनकर रवाना हो रहे हैं। कहीं गंदे और भद्दे शब्‍द सुनने को नहीं मिल रहे।

मेरा दिल रोता है यह सब देखकर, क्‍यों न लौटा लाएं पुराने दिन
काश एक बार फिर पहले सी होली लौट आए, सप्‍ताहभर पहले ही उसकी रौनक शुरू हो जाए, गली मोहल्‍लों में चंग की थाप के बीच कहीं पानी की फुहार तो कहीं रंगों की मार एक बार फिर भिगो दे, कोई तो हो जो चुभती हुई निजी बातों को दीवार पर लिख दे, भले ही हर कोई मुझ पर हंसता हुआ गुजरे लेकिन मुझे मेरे होने का अहसास तो कराए, क्‍यों कान्‍हा गोपियों का मिजाज देखकर होली खेले...

काश एक बार फिर वही बिंदास अंदाज फिर दिखाई दे, किसी की परवाह नहीं, जो आएगा वहीं लपेट दिया जाएगा। मैं ना नुकर करता रहूं और सिर से पांव तक पानी में भीगा ठिठुराता रहूं और रंग फेंकने वाले एक बार फिर मुझे रिरियाने को मजबूर कर दे...
एक बार फिर वही होली लौट आए...

ऐसो बंशी बजाई रे कान्‍हा महलां में सुणीजे रे
महलां माई मोरनी अर नाचण लागी रे... ऐसो...

सुंई हो जा रे सोनारण थारो कांई बिगड़े रे... सुंई हो जा रे...

तहजीब और तमीज के लिए तो बाकी पूरा साल पड़ा ही है। तो क्‍यों न तोड़ दे सभी बंधन और छोड़ दें सारी वर्जनाएं...

सोमवार, 11 जनवरी 2010

New ATM machine

MALE VS. FEMALE AT THE ATM MACHINE

A new sign in the Bank Lobby reads--- Please note that this Bank is installing new Drive-through ATM machines enabling customers to withdraw cash without leaving their vehicles. Customers using this new facility are requested to use the procedures outlined below when accessing their accounts.
After months of careful research, MALE &FEMALE Procedures have been developed. Please follow the Appropriate steps for your gender.'

MALE PROCEDURE:
1. Drive up to the cash machine.
2. Put down your car window.
3. Insert card into machine and enter PIN.
4. Enter amount of cash required and withdraw.
5. Retrieve card, cash and receipt.
6. Put window up.
7. Drive off.

FEMALE PROCEDURE:
1. Drive up to cash machine.
2. Reverse and back up the required amount to align car window with the machine.
3. Set parking brake, put the window down.
4. Find handbag, remove all contents on to passenger seat to locate card.
5. Tell person on cell phone you will call them back and hang up..
6. Attempt to insert card into machine...
7. Open car door to allow easier access to machine due to its excessive distance from the car.
8.. Insert card.
9. Re-insert card the right way.
10. Dig through handbag to find diary with your PIN written on the inside back page.
11. Enter PIN.
12. Press cancel and re-enter correct PIN.
13. Enter amount of cash required.
14. Check makeup in rear view mirror.
15. Retrieve cash and receipt..
16. Empty handbag again to locate wallet and place cash inside.
17. Write debit amount in check register and place receipt in back of checkbook.
18. Re-check makeup.
19. Drive forward 2 feet.
20. Reverse back to cash machine.
21. Retrieve card.
22. Re-empty hand bag, locate card holder, and place card into the slot provided!
23. Give dirty look to irate male driver waiting behind you.
24. Restart stalled engine and pull off.
25. Redial person on cell phone..
26. Drive for 2 to 3 miles.
27. Release Parking Brake


ENJOY :)...