शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

बहुत सोचा अब लिख रहा हूं

थ्री इडियट्स देखी, फिर चकरी ले आया, फिर बार बार देखी, कई बार देखी, बीच- बीच में से देखी। कई सीन दोहराकर देखे, फिर सोचा कि अब लिखूं तो देखा कि लोगों ने जमकर पहले ही लिख दिया है। सुकून की बात यह है कि मैं जो सोचा वह यहां कहीं मिला नहीं और कहीं लिखा भी गया है तो मुझे दिखा नहीं। सो इस बार नए विचार के साथ विशेष तरह से सोचने वालों की बात की जा सकती है।

मेरा विचार यह है कि रैंचो हम में से हर एक में है, फिल्‍म को पहली बार देखते समय हम दो लोग साथ थे, मैं लो प्रोफाइल था और मेरा साथी मुझसे अधिक प्रोफाइल का था। मेरी खासियत यह है कि मैं आपे में बने रहने का भरसक प्रयास करता हूं और मेरा साथी अपनी प्रोफाइल से भी काफी नीचे बना रहकर छोटे से छोटा काम बड़ी तल्‍लीनता से करता है। हम दोनों ने फिल्‍म के दौरान ही यह बात शिद्दत से महसूस की कि हम अपनी-अपनी जिंदगी के एक खास समय में रैंचो थे। बाद में हमने खुद को ढाल लिया और राजू बन गए। ऐसा नहीं है कि हमारा राजूलाइजेशन हो गया बल्कि हमने उसे होना स्‍वीकार किया। फिल्‍म में सभी का ध्‍यान रैंचो की तरह है और सूत्रधार फरहान बना हुआ है इसके बावजूद सबसे तीखा परिवर्तन राजू में होता है।

हम भी राजू ही बनना चाहते हैं, क्‍योंकि रैंचो का तरीका कुछ दिन तो काम कर जाएगा लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में राजू वाली किल्‍लर इंस्टिंक्‍ट ही काम आएगी। ऐसा कब क्‍यों और कैसे होता है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन आप खुद सोचेंगे तो पाएंगे कि कभी न कभी आपकी जिंदगी में भी ऐसा काल आया होगा जब आपने स्‍थापित नियमों और सिद्धांतों को चुनौती दी और बाकी लोग एकटक पहले से खींची हुई लकीर को देखते हुए उसे ही पीटने की तैयारी कर रहे थे और आप आसानी से आगे निकल गए। वास्‍तव में थिंक आउट ऑफ द बॉक्‍स एक आदत होती है, यह हमें लुभाती है, लेकिन यह अनिश्चित भविष्‍य की ओर लेकर जाती है, इसी अनिश्चितता का डर हमें पूर्व में लिए गए फैसलों जैसे फैसले लेने को बाध्‍य करती है। मैं दोबारा बात करना चाहूंगा तीनों पात्रों की...

रैंचो की अलग सोच

रैंचो के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उसने तो अपनी जिंदगी शुरू भी नहीं की है लेकिन वह ऐसा बैकअप रखता है जो ढाई करोड़ रुपए महीने के कमाता है और रैंचो की इंजीनियरिंग के लिए उन रुपयों को भी दांव पर लगा सकता है। रैंचो को डिग्री से भी कुछ हासिल नहीं करना है। अब सफल कैसे होगा, वह भविष्‍य के गर्भ में है। अगर रैंचो जीनियस न हो और उसमें वह जज्‍बा न हो तो वह कहां पहुंचेगा। पहले उसने अपने दिल की बात सुनी बाद में पॉल कोएलो आ गए और कहा जब आप किसी चीज को चाहते हैं तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने की साजिश करने लगती है (शाहरुख खान की फिल्‍म में यह डॉयलॉग बाद में आया था), और रैंचो को अपना भविष्‍य मिल जाता है, लेकिन कोई भी उम्रभर कंवारा रहकर अपने दोस्‍तों से अलग नहीं रहना चाहेगा। सो रैंचो का पात्र फिल्‍म बीतने तक कमजोर होने लगता है।

फरहान की दिल की बात

फरहान भी जीनियस है। वह वाइल्‍ड लाइफ फोटोग्राफी करता है। मजे की बात यह है कि उसके फोटोग्राफ हंगरी के आंद्रे इस्‍तवान को पसंद आ जाते हैं। अब मान लीजिए कि मैं एक ब्‍लॉगर हूं और किसी को भी मेरा लिखा पसंद नहीं आता। अब भले ही मैं कितनी भी दिल की क्‍यों न सुन लूं, आटा और दाल लाने के लिए तो रिपोर्टिंग ही करनी पड़ेगी। खबर लाउंगा तो हाजिरी गिनी जाएगी और उसी से तनख्‍वाह मिलेगी। एक सूत्रधार के दिल का सुकून है कि वह जो बनना चाहता था उसे वह बनने में रैंचों ने मदद की लेकिन मैं खुद को देखूं तो लगता है कि बचपन से किसी ऐसी चीज का सपना नहीं रहा। तो अब क्‍या बनूंगा। क्‍या करूंगा। न आंद्रे है न कैमरा न कमरे में एसी। यह कैरेक्‍टर बनाया ही कमजोर गया था। बस सूत्रधार जो रैंचो और राजू को देखता रहता है।

raju

राजू मेरा यार...

सिस्‍टम को दोष देना और जीभरकर गालियां निकाल लेना आसान है लेकिन अपने सिद्धांतों के साथ उसी सिस्‍टम को रूल करना उससे अधिक कठिन काम है। जिन लोगों ने यह किया है वे इसे समझ सकते हैं। एक वाकया याद आता है। किसी चेले ने गुरू से पूछा कि विवेकानन्‍द और रामकृष्‍ण परमहंस में क्‍या अंतर है। तो गुरू ने कहा कि विवेकानन्‍द इतने बड़े हो गए कि माया का जाल उनके लिए छोटा पड़ गया लेकिन परमहंस इतने सूक्ष्‍म हो गए कि माया का जाल उन्‍हें पकड़ नहीं पाया। वास्‍तव में सांसारिक आदमी को... जो शादी करना चाहता है, अपने मां-बाप का ऋण चुकाना चाहता है, अपने लिए प्रॉपर्टी बनाना चाहता है, दुनिया में अपना नाम करना चाहता है, देश के विकास में भागीदार बनना चाहता है, इज्‍जत और शोहरत के लिए कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार है वह विवेकानन्‍द नहीं बन सकता जो इज्‍जत को भारत में छोड़कर गए और सिर्फ राष्‍ट्र को ऊंचा उठाने के लिए खत्‍म हो गए। पीछे सिवाय विचारों के कुछ नहीं। वैसे परमहंस ने भी पीछे कुछ नहीं छोड़ा सिवाय विचारों के... लेकिन माया के जाल से बचने का रामकृष्‍ण का तरीका मुझे अधिक श्रेष्‍ठ लगता है। जहां रैंचो खुद को सिस्‍टम से बड़़ा बना लेता है वहीं राजू उसी सिस्‍टम में अपनी पैठ बनाता है। अंगूठियां पहनकर और भगवान से भीख मांगकर पास होने वाला राजू जब कांफिडेंस में आता है तो सलेक्‍टर्स को कहता है आप अपनी नौकरी रखिए मैं अपना एटीट्यूट रखता हूं।

क्‍या हम भी ऐसा ही नहीं चाहते...

फरहान बनकर सपनों के पीछे ब्राजील के रेन फोरेस्‍ट में जाने का ख्‍वाब मेरा तो नहीं है

रैंचो की तरह लद्दाख में गुमनामी की जिंदगी भी नहीं जी सकता

हां राजू की तरह सिस्‍टम को सिस्‍टम के भीतर रहकर चैलेंज कर सकता हूं और अपने लिए बेहतर जगह बना सकता हूं.... बिना डरे...

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

ब्‍लॉगिंग में संप्रेषणीय आग्रहता

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में लेखकों का उत्‍साह लगातार बढ़ता हुआ देख रहा हूं। एक तरफ पचासों लोग हैं जो आमतौर पर भी कुछ भी लिख दें तो पूरी शिद्दत के साथ पढ़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी लेखकों की मिसालें भी हैं जो ऐसा लिखते हैं कि पाठक पढ़ना चाहते हुए भी पढ़ नहीं पाते। हालांकि पाठकों और टिप्‍पणीकारों का लगातार आग्रह रहता है कि ऐसी भाषा में लिखा जाए जिसे आम आदमी आसानी से पढ़ और समझ सके। इसके बावजूद लिखने में सिद्धहस्‍त लोग अपनी धुन में उत्‍कृष्‍ट साहित्‍य नेट पर रच रहे हैं।

ठीक है, भले ही आज किसी को समझ में न आए लेकिन किसी न किसी दिन किसी न किसी पाठक को तो ये लेख समझ में आएंगे ही।

मैं सीधा-सीधा किसी का नाम नहीं लूंगा लेकिन विषय आधारित और कई जगह विषय से हटकर कुछ लोग ऐसी भाषा लिख रहे हैं जो कम से कम मुझे एक बार में समझ में ही नहीं आती। जरूरी नहीं है कि मैं सभी विषयों का अच्‍छा जानकार होउं और यह भी जरूरी नहीं है कि सबकुछ मेरे लिए ही लिखा जा रहा है। इसके बावजूद संप्रेषण को सुगम बनाने की आग्रहता बनी रहती है।

मैं सोचता हूं कि किसी हैडिंग को पढ़ने के बाद मेरी इच्‍छा होती है कि इस विषय पर जो लेख लिखा गया है उसे पढूं और समझूं कि इसमें नया क्‍या है। हो सकता है इस बारे में बाजार में कई किताबें उपलब्‍ध हों लेकिन जब एक ब्‍लॉगर लिख रहा है तो समझने के बाद नेट के पाठकों को समझाने के इरादे से लिख रहा होगा। मैं उस पोस्‍ट में पहुंचता हूं, तो पाता हूं कि अब तक जिस अंदाज में विषय को पढ़ा और समझा था उससे कहीं अधिक दुरुह अवस्‍‍था में यह नेट पर मिल रहा है। किसी लेख विशेष को एक दो या तीन बार पढ़ने के बाद भी मेरी उलझन खत्‍म नहीं होती, तो कुछ देर उलझा रहने के बाद अंतरजाल के किसी दूसरे कोने की ओर चल देता हूं।

आमतौपर नेट पर जमे हुए अधिकांश पाठकों की भी यही स्थिति होती होगी।

जो बातें किताबों में लिखी जा चुकी हैं उन्‍हें ज्‍यों का त्‍यों नेट पर हिन्‍दी में डाल देना न केवल हिन्‍दी की सेवा है बल्कि नेट पर हिन्‍दी के वर्चस्‍व की ओर एक और कदम है लेकिन यह कदम कितना प्रभावी है, यह सोचना भी महत्‍वपूर्ण लगता है। कई लोग अपनी बात लिख रहे हैं, सादे शब्‍दों में, कई बार कुछ कठिन शब्‍दों का भी इस्‍तेमाल करते हैं, लेकिन वे इतने कठिन नहीं होते कि पढ़ने पर सिर चकरा जाए, लेकिन सोचिए कि क्‍या बिना किसी विषय विशेष को केन्‍द्र में रखे ये लोग क्लिष्‍ट भाषा लिखते, तो क्‍या आज उन्‍हें इतनी लोकप्रियता मिल पाती।

मैं सोचता हूं,  नहीं।

... इससे हिन्‍दी और इसके क्लिष्‍ट शब्‍दों का महत्‍व भी कम नहीं होता।

जनकवि हरीश भादाणीजी की कविताओं की समीक्षा में एक बार जगदीश्‍वर चतुर्वेदीजी ने कहा था कि ये कविताएं केवल गाने के लिए हैं। आम आदमी सुनेगा और भुला देगा। जब तक खुद हरीशजी गाएंगे ये कविताएं जिंदा रहेगी लेकिन खुद हरीशजी के सीन से हटने के साथ ही कविता का भी लोप हो जाएगा। उनका संदर्भ हरीश भादाणीजी की कविताओं में आ रहे बिंब और बिंब के विचार में रिड्यूस होने के बारे में था। इस पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंदकिशोर आचार्यजी ने कहा था कि हरीशजी आम जनता से संप्रेषणीय आग्रहता के चलते बिंब के साथ कविता का सृजन करते हैं। और यह बिंब आम आदमी की समझ में आए इसलिए कविता के अंत तक बिंब यानि इमेज को विचार तक रिड्यूस कर देते हैं। यह कमी नहीं बल्कि हरीशजी की खासियत है।

आज उस घटना के करीब दो साल बाद मैं देख रहा हूं कि ब्‍लॉगिंग में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

एक ज्‍योतिष विद्यार्थी के रूप में जब लिखना शुरू किया तो लगा कि क्‍या लिखा जाए जो आम आदमी को समझ में आए। विषय को लेकर सैकड़ों सवाल दिमाग में थे और अब भी हैं लेकिन उनमें से कुछ विषयों का जुड़ाव आम आदमी से सीधे होता है। अब नवमांश और सबलॉर्ड में से किसे अधिक सटीक माना जाए इस पर बहस की गुंजाइश अभी नेट पर नहीं है लेकिन ज्‍योतिष में अंधविश्‍वास या साढे़साती की समस्‍या पर हर पाठक पढ़ने को तैयार मिलेगा। ऐसे में मैं सरल शब्‍दों में अपनी बात रख पाता हूं तो पाठक भी उस विचार से खुद को जुड़ा हुआ पा सकेगा। जितने अधिक पाठक जुड़ेंगे विषय से नजदीकी भी उतनी ही बढ़ती जाएगी।

शुरूआती दौर में एक रास्‍ते पर कुछ दूरी तक पाठक को खींच लेने के बाद विषय को क्लिष्‍ट बना लिया जाए तो शायद किसी को आपत्ति नहीं होगी लेकिन शुरूआत ही ऐसे शब्‍दों से हो जिन्‍हें समझने के लिए हर पंक्ति के बाद रुककर डिक्‍शनरी निकालनी पड़े तो क्‍या नेट पर ब्‍लॉग पढ़ना सजा की तरह नहीं हो जाएगा...

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

एक नया अध्‍याय शुरू हुआ बीकानेर में

मैं संयोगों पर यकीन करता हूं। ये बार बार होते हैं। हर बार होते हैं और मुझे पहले से अधिक आश्‍चर्यचकित छोड़ जाते हैं। इस बार फिर ऐसे ही संयोग हुए जिन्‍होंने ने न केवल मुझे सोचने पर मजबूर किया बल्कि कई दूसरे लोग भी इन संयोगों की चपेट में आए। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं कि मैं सक्रामक हो चुका हूं। इस बार तो मैंने संक्रमण के बीच ही बो दिए। या कहूं कि समय ने कुछ ऐसा चक्रव्‍यूह रचा कि संक्रमण के बीज खुद ब खुद आए और बीकानेर की मानस धरती पर समा गए। बीकानेर में ब्‍लॉग संगोष्‍ठी हुई। इसके लिए दो दिन से एक शब्‍द तलाश रहा हूं। पर घूमफिरकर एक ही सही शब्‍द दिमाग में आता है वह है...

ब्‍लॉग आमुखीकरण कार्यशाला

चलिए पहेलिया छोड़कर सीधे मुद्दे पर चलते हैं। अहमदाबाद से वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर संजय बेगाणीजी सपरिवार बीकानेर आए। मैं बता दूं कि बीकानेर के पास के एक छोटे से गांव बीदासर से निकला बेगाणी परिवार करीब पैंतीस साल से सूरत और अहमदाबाद में स्‍थापित है। तो जड़ों की ओर लौटने के लिए संजय जी को बहाना मिला अपने साले साहब की शादी का। वे बीकानेर आ रहे थे उन्‍हीं दिनों उनसे मेरा संवाद स्‍थापित हुआ। इसी संवाद के दौरान उन्‍होंने मुझे बताया कि वे 27 नवम्‍बर को बीकानेर पधार रहे हैं। मैंने ब्‍लॉगर मीट के सपने देखने शुरू कर दिए। एक भरा हुआ हॉल और एक के बाद एक ब्‍लॉगर आए और अपने अनुभव दूसरों के साथ बांटता चला जाए। जो पहले से ब्‍लॉगर हैं वे तालियां बजाएं और जिन लोगों ने अब तक ब्‍लॉग शुरू नहीं किया है वे मुंह बाएं देखते रहें। खैर, दिन का सपना था सो जल्‍दी टूट गया। संयज जी के बीकानेर आने से ठीक एक दिन पहले तक बीकानेर में पहले महापैार फिर उपमहापौर के चुनाव सिर पर रहे। मैं शुरूआती एक दो दिन तैयारी के निकालने के बाद ऐसा व्‍यस्‍त हुआ कि बेगाणीजी की अगली मेल से तंद्रा टूटी और फिर से ब्‍लॉग मीट की तैयारी करने लगा। हकीकत तो यह है कि अपने दमघोंटू दिनचर्या में से मैंने कुछ ही घंटे निकाले।

डॉ. कटारिया की स्‍नेहपूर्ण कृपा

मैं खुद कभी किसी का अच्‍छा मित्र नहीं रहा हूं लेकिन मुझे हमेशा अच्‍छे मित्र मिले। इसी कड़ी में एक और नाम है डॉ. प्रताप कटारिया। वे बीकानेर संभाग के सबसे बड़े कॉलेज में प्राणीशास्‍त्र के व्‍याख्‍याता हैं और शौकिया पक्षीविज्ञानी। मैंने उन्‍हें बताया कि अहमदाबाद से वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर आ रहे हैं उनके लिए एक संगोष्‍ठी का आयोजन कराने की कोशिश कर रहा हूं। उन्‍होंने कहा ठीक है मैं मदद कर दूंगा। बाद में तो यह स्थिति हुई कि शुरू से आखिर तक की सारी व्‍यवस्‍थाएं उन्‍होंने ही कराई। समय कम होने के कारण कॉलेज के तीन एलसीडी प्रोजेक्‍टर किसी न किसी कारण से हमारी पहुंच से दूर थे। माइक भी ईद की छुट्टी की वजह से अरेंज नहीं हो पाया। इन सबके बावजूद न तो किसी के उत्‍साह में कमी थी न उत्‍सुकता में।

मौजूद लोग

इनके बारे में मैं इसलिए जानकारी देना चाहता हूं कि संजयजी का भाषण और उपस्थिति श्रोताओं का तारतम्‍य समझा जा सके। डॉ. कटारिया के अलावा डॉ। नवदीप बैंस डूंगर कॉलेज के व्‍याख्‍याता हैं,

डिफेंस रिसर्च डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक डॉ. हनुमानप्रसाद व्‍यास जो कि महात्‍मा गांधी और विवेकानन्‍द पर राष्‍ट्रीय स्‍तर की कई कांफ्रेंस में भाषण देते रहे हैं, और अंतरराष्‍ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ समझे जाते हैं इन्‍होंने अपने जिंदगी के बीस साल अमरीका में गैलियम आर्सेनाइड पर रिसर्च में लगाए और भारत में आकर तकनीक विकसित करने पर पाथ ब्रेकिंग अवार्ड लिया,

शंकर लाल हर्ष भी मौजूद थे, हर्ष जी एशियन शतरंज संघ के उपाध्‍यक्ष रहे हैं और बीकानेर में शतरंज की अंतरराष्‍ट्रीय प्रतियोगिताएं करवा चुके हैं। अब भी हर साल दुनिया के कई देशों की यात्राएं करते हैं शतरंज टूर्नामेंटों को लेकर क्‍योंकि वे इंटरनेशनल ऑर्बिटर हैं,

विनय कौड़ा जो कि देश के प्रमुख आठ अखबारों के एडीटोरियल में नियमित रूप से छपते हैं, इनमें अमर उजाला, प्रभात खबर, राजस्‍थान पत्रिका जैसे नाम शामिल हैं, ये अंतरराष्‍ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं,

पुखराज चोपड़ा जी अंतरराष्‍ट्रीय ट्रेड पर गहरी नजर रखते हैं और इनकी सलाह देश के सभी प्रमुख चैनल और अखबार सुनते हैं। इनके ब्‍लॉग की हर नई पोस्‍ट को ऑन लाइन ट्रेडिंग से जुड़े लोग तुरंत पढ़ते हैं।

इनके अलावा इन्‍हीं लोगों से संबंधित कुछ और लोग थे।

मेरी सीमाएं

कार्यक्रम के लिए मैंने भरसक प्रयत्‍न किया कि कम से कम पचास लोग तो आएं ही, लेकिन पूरी कोशिश करने के बावजूद भी शादियों का दिन, ईद की छुट्टी और अन्‍य कई कारणों से कई लोग चाहकर भी पहंच नहीं पाए। अगली कांफ्रेंस तक मैं कोशिश करूंगा कि कम से कम सौ लोग तो शामिल हों ही। वैसे मैं सोचता हूं कि खाने का प्रबंध किया जाएगा तो भोजनप्रिय बीकानेर के लोग अवश्‍य पहुंच जाएंगे। यह व्‍यवस्‍था कैसे होगी आगे बताउंगा।

तो शुरू हुआ कार्यक्रम

मेरी पंचायती में यह पहला कार्यक्रम था। सो ऑफीशियली कैसे शुरू करते हैं मुझे पता नहीं था। मैंने सबसे पहले कॉल किया संजय बेगाणीजी को, बेगाणी जी बस तैयार हो ही रहे थे कि डूंगर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पी.आर. ओझा ने घड़ी देखते हुए कहा कि पहले मैं बोलूंगा। अब डॉ. ओझा ब्‍लॉग तो लिखते नहीं हैं लेकिन हिन्‍दी पढ़े हुए हैं। उनके पिताजी भी हिन्‍दी के विद्वान थे। उन्‍होंने जो कुछ भी बोला उसका संबंध ब्‍लॉगिंग से कतई नहीं था। सो आपका समय भी मैं खराब नहीं करूंगा।

अब बारी थी संजय जी की...

उन्‍होंने जो कहा उसका मंतव्‍य था कि इंटरनेट पर भाषाओं की जंग छिड़ी हुई है। इसमें अंग्रेजी भाषा के बाद अब चीन अपना वर्चस्‍व स्‍थापित करने में लगा हुआ है। सन 2020 तक इंटरनेट की प्रथम भाषा चीनी होगी और दूसरे स्‍थान पर हिंदी होगी। भले ही हम इससे खुश हो जाएं लेकिन ऐसा क्‍यों नहीं हो सकता कि हम पहले स्‍थान पर रहें। इसके लिए हर प्रबुद्ध व्‍यक्ति को ब्‍लॉग लिखना चाहिए। अब ब्‍लॉग पर क्‍या लिखा जा रहा है और क्‍या लिखा जा सकता है। इस बारे में उन्‍होंने कहा कि साहित्यिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ब्‍लॉग कचरे से अधिक कुछ नहीं हैं। क्‍योंकि यहां लिखने वाले लोग साहित्‍यकार नहीं हैं। अधिकांश लोगों को तो हिन्‍दी भी सही लिखनी नहीं आती। लेकिन इससे ब्‍लॉग का महत्‍व कम नहीं हो जाता। दुनिया में ऐसे कई प्रकरण हुए हैं जहां देशों की सरकारों के दमनचक्र को ब्‍लॉग के माध्‍यम से पूरी दुनिया ने जाना। यही कारण है कि तानाशाह देशों की सरकारें ब्‍लॉग से डरती हैं और इस पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही हैं। बेगाणीजी ने इसे आम आदमी की आवाज की ताकत बताते हुए कहा कि चाहे कुछ भी लिखिए लेकिन लिखिए जरूर। अन्‍य किसी माध्‍यम से लिखेंगे तो उस प्रकाशित रचना का जीवनकाल अधिक से अधिक एक दिन या एक महीना होगा लेकिन इंटरनेट पर आप जो कुछ लिखेंगे वह शाश्‍वत होगा। इससे आप अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी कुछ छोड़ जाएंगे। अब कौन क्‍या लिखे के बिंदू पर उन्‍होंने कहा कि जो अपने विषय के विशेषज्ञ हैं वे अपने विषय के बारे में लिखें वरना यह भी लिख सकते हैं कि आज दिन कैसा रहा। आज कैसे लोग मिले। उन्‍होंने एक चायवाले का उदाहरण देते हुए बताया कि एक चायवाला भी ब्‍लॉग लिख सकता है। उसमें वह लिखेगा कि आज तो ऐसे ऐसे अजीब लोग मिले।

कुछ सीखने की बातें

यहां तक पहुंचने के बाद लोगों में उत्‍सुकता थी कि ब्‍लॉग कैसे बनता है और हम कैसे इस जमात में शामिल हो सकते हैं। इस पर कुछ लोगों का मत था कि मैं खुद उन लोगों के पास जाउं और उनके ब्‍लॉग बनाकर लिखने की विधि समझा दूं लेकिन बाद में उपस्थित लोगों के आग्रह पर गोष्‍ठी को औपचारिक की बजाय अनौपचारिक बना दिया गया। तस्‍वीरों में जो सिटिंग दिखाई गई है उसे क्रम को तोड़कर सभी आगे आकर एकत्रित हो गए और बेगाणीजी भी मंच से नीचे उतर आए। यहां उन्‍होंने अपने लेपटॉप पर अपने मोबाइल से चल रहे इंटरनेट से लोगों को ब्‍लॉगर डॉट कॉम के दर्शन कराए और ब्‍लॉग बनाने के तीन आसान चरणों की जानकारी दी। इसके बाद उन्‍होंने ऑन लाइन हिन्‍दी टूल और वर्तनी शुद्धि वाले सॉफ्टवेयर्स की जानकारी भी दी।

एक बार भी ताली नहीं बजी

संजय जी के भाषण के दौरान एक बार भी ताली नहीं बजी। पूरे सदन में केवल मैं ही था जो उपस्थित श्रोताओं को बेगाणीजी को पर्सनली जानता था। इसलिए मैं देख सकता था कि हिन्‍दी और हिन्‍दुस्‍तान के वर्चस्‍व के संबंध, अंतरराष्‍ट्रीय मामलों पर बेगाणीजी के बोलने के साथ ही प्रमुख श्रोता अपनी तलवारें निकाल चुके थे। वे यह सुनने को तैयार ही नहीं थे कि चीन हमसे आगे है। डॉ. व्‍यास ने अपने शोध से चीन को धूल चटाई थी, कौड़ाजी जानते थे कि चीन हमसे किन मामलों में पिछड़ रहा है, पुखराज जी भारत की मजबूत अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में सोच रहे थे और हर्षजी विश्‍वनाथन आनन्‍द और अन्‍य भारतीय शतरंज मास्‍टरों के बारे में सोचने लगे थे। यानि भाषण की शुरूआत ही कुछ ऐसी थी कि बेगाणीजी ने श्रोताओं को एक्टिवेट कर दिया था। इसलिए बाकी के भाषण के दौरान श्रोता उनके शुरूआती कथन के विश्‍लेषण में ही उलझे रहे। इसलिए एक बार भी तालियां नहीं बजी।

चाय और कचौरियां

कार्यक्रम करीब आधे घण्‍टे देरी से शुरू हुआ। भाषण के पहले भाग के अंत तक डॉ. कटारिया के आज्ञाकारी शिष्‍य चाय और गर्मागरम कचौरिया लेकर पहुंच चुके थे। हॉल के पीछे से खुशबू आनी शुरू हो गई। मैं सुबह से बिना नाश्‍ता किए निकला हुआ था। दोपहर एक बजे तक तो पेट जवाब दे गया। मैंने गुजारिश की कि चलिए चाय पी लेते हैं। बाकी लोगों के पीछे पहुंचने से पहले मैं दो कचौरिया निगल चुका था। चाय के ब्रेक के दौरान ब्‍लॉग, इसकी ताकत, बनाने के तरीके और चीन के वर्चस्‍व को लेकर लगातार होती रहीं। मेरा ध्‍यान पूरी तरह से कचौरियों की तरफ था।

श्रोताओं के विचार

जैसा कि मैंने पहले से सोच रखा था, मैंने कुछ श्रोताओं को बोलने के लिए आमं‍त्रित किया। सबसे पहले आए डॉ. व्‍यास उन्‍होंने अपने डीआरडीओ के अनुभव के आधार पर बताया कि केवल हिंदी की बात करने से अन्‍य भाषाओं वाले लोग चिढ़ सकते हैं। उत्‍तर भारत में तो ठीक है लेकिन दक्षिण भारतियों के समक्ष तो हिन्‍दी तो प्रमुखता की बजाय कनेक्टिंग लैंग्‍वेज के रूप में परोसना ही उचित रहेगा। इससे हिन्‍दी का भी विकास होगा और दूसरी भाषाओं को भी उचित सम्‍मान मिलेगा। शंकरलाल हर्ष ब्‍लॉग में लिखे गए किसी भी अंट शंट के लिटिगेशन के बारे में पूछना चाह रहे थे। उनका सवाल था कि इसके लिए जुरिस्डिक्‍शन जोन कौनसा होगा। मैं बीकानेर से कुछ लिखता हूं और एक आदमी आपत्ति करके मुझे बैंगलोर की अदालत में हाजिर करवा लेगा तो ब्‍लॉगिंग तो पीछे रह जाएगी, नौकरी धंधे का भी संकट हो जाएगा। हालांकि उनका सवाल अनुत्‍तरित रहा लेकिन संगोष्‍ठी जारी रही। चाय के दौरान डॉ. व्‍यास ने रजनीश परिहार जी से पूछा था कि आप क्‍या लिखते हैं ब्‍लॉग में... मैंने दोबारा यही सवाल उठाते हुए उन्‍हें बोलने के लिए आमंत्रित किया। परिहारजी ने बताया कि वे जो कुछ रोजाना की जिंदगी में देखते हैं। उसे ही लिखते हैं। पिछले दिनों उन्‍होंने अंधी मां के दो बच्‍चों की कहानी लिखी थी, जिस पर देशभर में पढ़ा गया और कई लोगों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाए। इस पर तालियां बजी

अगली संगोष्‍ठी का प्रपोजल

बीकानेर में अगली संगोष्‍ठी के लिए मुझे दो प्रपोजल मिले हैं। एक तो यहां के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सेमिनार हॉल का और दूसरा बीकानेर के उपनगर गंगाशहर स्थित तेरापंथ भवन का। पुखराज जी ने तो दो लाख रुपए तक के खर्च की सीमा भी पेश की है। अगर सबकुछ सही रहा तो छह महीने बाद ही अलगी संगोष्‍ठी आयोजित करने का प्रयास करूंगा। जिसमें देश के अन्‍य क्षेत्रों से प्रमुख ब्‍लॉगरों को बुलाने की कोशिश रहेगी। और प्रमुख वक्‍ताओं में संजय बेगाणीजी तो होंगे ही...

संगोष्‍ठी के दौरान मैं अपना कैमरा लेकर पहुंचा नहीं, सो मीडिया द्वारा लिए गए फोटो से ही काम चलाना होगा। ये वही फोटो हैं जो संयजजी ने अपने ब्‍लॉग जोगलिखी पर लगाए हैं...

sanjay begani1

dungar college auditorium1 

dungar college auditorium2

शनिवार, 28 नवंबर 2009

बीकानेर में हुई ब्‍लॉग कार्यशाला वक्‍ता संजय बेगाणी

अहमदाबाद से बीकानेर आए संजय बेगाणी को मुख्‍य वक्‍ता के रूप में रखकर एक ब्‍लॉग गोष्‍ठी का आयोजन शनिवार को किया गया। इसमें डिफेंस रिसर्च डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक डॉ. एच.पी. व्‍यास, एशियन चैस एसोसिएशन के पूर्व उपाध्‍यक्ष एस.एल. हर्ष और एनसीडीईएक्‍स और एमसीएक्‍स की एडवाइजरी कमेटी के सदस्‍य पुखराज चोपड़ा सहित कई गणमान्‍य लोग मौजूद थे। इस गोष्‍ठी की झलकियां और फोटो के साथ कल सुबह एक पोस्‍ट चस्‍पा करूंगा। क्‍योंकि संजयजी के साथ संवाद के उत्‍साह में फोटो खुद ने लिए नहीं और मीडिया में गए फोटो आज मिले नहीं। सो कल मिलेंगे फोटो और कल ही पेश करूंगा
इस गोष्‍ठी में ब्‍लॉगिंग का इतिहास, वर्तमान और भविष्‍य के बारे में तो चर्चा की ही गई, साथ ही स्‍थानीय ब्‍लॉगरों जैसे रजनीश पडि़हार, पुखराज चोपड़ा और डॉ. प्रताप कटारिया के विचारों से भी अवगत हुए।

फोटो मिल जाएंगे तो रविवार को पोस्‍ट पूरी बनाकर पेश करूंगा। तब तक तो इंतजार करना ही पड़ेगा। संगोष्‍ठी शुरू हुई तो मुझे लानतें मिल रही थी और खत्‍म होने तक शाबाशियां। साथ ही अगली गोष्‍ठी के लिए प्रपोजल भी...

क्‍या कैसे कब और क्‍यों हुआ जानिए अगले अंक में...

सोमवार, 23 नवंबर 2009

मानसिक स्‍तरों में विचरण

शुरू से मैं यह जानता नहीं था या कह दूं कि मानता नहीं था कि मानसिक स्‍तरों में उतार चढ़ाव होता है और कई बार यह खतरनाक भी हो सकता है। बहुत छोटा था तब मुझे कॉमिक्‍स पढ़ते देख मेरे पड़नानाजी स्‍वर्गीय डॉ. माधोदासजी व्‍यास मुझे टोका करते थे। वे कहते कि एक बार हल्‍के साहित्‍य में उतर गए तो कभी गंभीर साहित्‍य पढ़ नहीं पाओगे। मुझे कॉमिक्‍स अच्‍छी लगती थी। सो उनकी बात थोड़ी कम पचती थी। यह स्‍वाभाविक भी था। पर इसे मैंने एक चैलेंज की तरह लिया और उन्‍हीं दिनों नागराज और सुपर कमाण्‍डो ध्रुव के साथ प्रेमचंद को भी पढ़ा। सच कहूं रोलर कोस्‍टर राइड थी। एक तरफ आभासी दुनिया थी और दूसरी तरफ जमीनी सच्‍चाई। नागराज अपने हाथों से निकले सापों से परदे खड़े कर रहा था और प्रेमचंद का परदा बिल्‍कुल गल गया था, जिसके पीछे अधनंगी सच्‍चाई खड़ी थी। शायद इन्‍हीं दिनों में मेरा एक ही समय में अलग अलग मानसिक स्‍तरों में विचरण का क्रम शुरू हो गया था।

लाइक डिजाल्‍व लाइक की तर्ज पर मुझे मिला आशीष। वह जीनियस होने का भ्रम पाले जबरदस्‍ती मानसिक स्‍तरों का विचरण कर रहा था। भले ही मेरी स्थिति भी जबरदस्‍ती वाली ही थी लेकिन मेरे पास इसके लिए सुविधाएं और साधन मुहैया थे। सबकुछ घर पर ही और आशीष इनके लिए भटक रहा था। हम दोस्‍त थे, बाद में इस विचरण के साथी भी बन गए। हमारे कई तरह के प्रयासों के बावजूद निजता बरकरार रही। बाद में एक दिन आशीष ने इक्‍कीसिया गणेश मंदिर के पास बने खेल मैदान की हमारी बैठक में कहा कि ये मानसिक स्‍तरों का विचरण खतरनाक हो सकता है। मैं बेफिक्र था। मैंने ध्‍यान ही नहीं दिया।

इसी दौर में मैं मानसिक रोगों के बारे में पढ़ना शुरू कर चुका था। मेडिकल स्‍टूडेंट समझ सकते हैं कि मैं क्‍या कहना चाहता हूं, कि रोगों को पढ़ने के साथ मैंने उनमें से कई रोगों को महसूस करने की कोशिश शुरू कर दी। या कहें वे खुद को महसूस कराने लगे। वास्‍तव में यह स्थिति बहुत खतरनाक होती है। मेरा सबसे पसंदीदा विषय स्‍कीजोफ्रीनिया है। जब मैंने उसे पढ़ना शुरू किया तो रोग को समझना ही टेढ़ी खीर लगा। जैकाल हाइड वाली कहानी से मिलता जुलता यह रोग है। यानि भेड़ की खाल में छिपा भेडि़या। ये रोगी वैसे नहीं होते कि अच्‍छी सामाजिक छवि हो और नौकरानी का बलात्‍कार करे। बल्कि ये रोगी सामान्‍य दिखने वाले ऐसे लोग होते हैं जो लगातार मर रहे होते हैं। अब मरना क्‍या है इसे समझना भी बहुत मुश्किल है। सही कहूं तो असंभव है। लेकिन मरने के करीब होने की कल्‍पना करना उससे कुछ आसान है। यहां मैं कह रहा हूं कि कुछ आसान है यानि असंभव से कुछ आसान। ठीक है उस स्थिति को महसूस करने के बाद अगली स्‍टेज नहीं आ सकती क्‍योंकि वह लगातार चलने वाला प्रोसेस है। ऐसे में आप नीयर डेढ एक्‍पीरियंस की कल्‍पना तो कर सकते हैं लेकिन उसके प्रभावों की नहीं। उसके प्रभाव तक एक बार पहुंच भी गए तो उससे अगली स्‍टेज मिलना तो असंभव है, बिना रोग हुए। फिर भी मैंने लम्‍बे काल के लिए उस स्थिति को बनाए रखने की कोशिश की तो कुछ ऐसे अनुभव होने शुरू हुए जिसमें शक होने लगता है। यहां मैं एक बार सावधान हुआ और खुद को दूसरे कामों में मोड़कर बाहर आ गया। लेकिन इस प्रयास ने मुझे समझने का सूत्र थमा दिया। अब मैं इस रोगी को समझ सकता था। इस दौर के बाद मुझे दो बार शक हुआ कि कहीं मैं भी इसका रोगी तो नहीं हूं। सो यहां थोड़े अंतराल में दो अलग अलग मानसिक रोग विशेषज्ञों को दिखाकर आया। दोनों में मुझे क्‍लीन चिट दी। बाद वाले ने मुझे पंद्रह दिन की एंटी डिप्रेसेंट लिख दी। वो मैंने नहीं ली और घर आकर प्राणायाम में जुट गया। कुछ दिन में वह अवस्‍था खत्‍म हो गई तो मैंने दोबार मुड़कर देखा। अब मैं मुस्‍कुरा सकता था।

यह सब मुझे याद आया समय की टिप्‍पणी से। वे छद्म और अंध विश्‍वास में अंतर नहीं कर पाए। यह एक प्रकार के माइंड सेटअप की समस्‍या है। वे खुद को‍ क्लिष्‍ट शब्‍दों और तार्किक ज्ञानयोग में झोंक रहे हैं। ऐसे में जब अंधविश्‍वास की बात आती है तो वे उसे आमतौर पर बताया जाने वाला ईश्‍वरीय विश्‍वास मान रहे हैं। यही छद्म विश्‍वास भी है। उनकी उलझाहट में मानसिक स्‍तर में विचरण नहीं कर पाने की विवशता दिखाई देती है। उनके ब्‍लॉग पर जाकर मैंने दो बार आगाह भी किया लेकिन वे अपने इस विश्‍वास के साथ बने हुए हैं कि दर्शन ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन मैं अब भी उन्‍हें यही सलाह देना चाहता हूं कि वे शब्‍दों की क्लिष्‍टता और ज्ञान की तार्किकता के परे आकर आम बोलचाल की भाषा में दर्शन की बात करें। यह लोगों की समझ में भी जल्‍दी आएगा और वे खुद भी स्‍वाभाविक मानसिक अवस्‍था में रह पाएंगे। वैसे उनका ब्‍लॉग है और उनका दिमाग... वे जैसा उचित समझे करें।

उनके लिए स्‍पष्‍ट कर रहा हूं कि एक सामान्‍य अंधविश्‍वासी बिना जाने यकीन करता है कि ईश्‍वर है और बताए गए रूप में है। जबकि एक छद्म विश्‍वासी उस ईश्‍वर को अपने अंदाज में देखता है भोगता है और उसका दिमाग उसे जस्टिफाई भी करता है। यानि अंध से अधिक पक्‍का छद्म विश्‍वास होता है। यही बात मैं स्‍पष्‍ट करने की कोशिश कर रहा था।

अगली पोस्‍ट ब्‍लॉगिंग में संप्रेषणीय आग्रहता पर होगी... यह एक रोचक बहस का हिस्‍सा थी और अब इसे रोजाना देख रहा हूं....

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

छद्म और अंध विश्‍वास में अंतर है

लवली कुमारी जी के ब्‍लॉग संचिका पर मैं अंधविश्‍वास के बारे में हैडिंग देखकर पढ़ने चला गया। विज्ञान की छात्रा लवली कुमारीजी की मेधा पर बहुत कम लोगों को शक होगा लेकिन इस बार उन्‍होंने ऐसा टॉपिक छेड़ा कि मैं न चाहते हुए भी उसमें कूद पड़ा। वहां चर्चा का सिलसिला अप्रिय तरीके से मैंने ही शुरू किया और अब उसे और बढ़ाना नहीं चाहता। लेकिन एक बात मन में है कि स्किजोफ्रीनिया के बारे में आम लोगों को आम भाषा में जानकारी क्‍यों न दी जाए। बस यह पोस्‍ट लिखने बैठ गया हूं। बात शुरू हुई अंधविश्‍वासियों से...

मानसिक अवस्‍था

स्किजोफ्रीनिया के रोगी अंधविश्‍वासी होते हैं वे न केवल ईश्‍वर को देखते हैं बल्कि उनसे वार्तालाप भी करते हैं और कई बार उनके आदेशों को मानकर बलि देने जैसे कामों को भी अंजाम दे देते हैं। भारत में एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी ने एक रात में लोहे की रॉड से सड़क के किनारे सो रहे इकतालीस लोगों की हत्‍या की और शांति से अपने घर में जाकर बैठ गया। पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय में उस रोगी के चेहरे पर असीम शांति थी। क्‍योंकि यह सब उसने सूर्य भगवान के निर्देश पर किया था। सूर्य भगवान रोज उससे बातें किया करते थे। यह रोगी दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में है। पिछली जानकारी तक तो.. आज का पता नहीं।

खैर यहां डराने की नहीं बल्कि हकीकत तक पहुंचने की बात है। करीब दस साल पहले मैंने एक अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त साइकोलॉजिस्‍ट (अब उनका निधन हो चुका है) से इस बारे में पूछा था। तब उन्‍होंने जो समझाया आज तक समझने के स्‍तर पर उससे बेहतर और कोई जवाब मिला नहीं है। इस बारे में मैंने न्‍यूरोलॉजिस्‍ट से लेकर साइक्रेटिस्‍ट और अन्‍य साइकोलॉजिस्‍ट से भी बातें की लेकिन किसी के दिमाग में इसकी स्‍पष्‍ट तस्‍वीर नहीं है।

लक्षण: स्‍पष्‍ट तौर पर सिर्फ एक संदेह। हर किसी पर, हर परिस्थिति पर और हर कोण से। बाकी बातें बाद में आती हैं।

कैसे होता है: इसे साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कह सकते हैं। यानि शारीरिक क्षति का भुगतान मानसिक अवस्‍था करती है।

आम बोलचाल में: इसे समझिए कि दिमाग के दो हिस्‍से हैं। दांया और बायां। इन दोनों हिस्‍सों में या कह दें कि दिमाग में ऑक्‍सीजन पहुंचाने के लिए लाल रक्‍त कणिकाओं का इस्‍तेमाल नहीं होता। इसके लिए अलग से ऑक्‍सीजन कैरियर्स होते हैं। ये कैरियर दिमाग के पिछले हिस्‍से में जाकर ऑक्‍सीजन को आरबीसी से ले लेते हैं और फिर दिमाग के अलग-अलग हिस्‍सों में चलते जाते हैं। वहां ऑक्‍सीजन की सप्‍लाई हो जाती है। दिमाग के हर हिस्‍से के लिए कैरियर पहले से तय हैं। इनमें बदलाव नहीं होता।

अब चाहे किसी बाहरी चोट से, किसी मेंटल डिसऑर्डर से या वंशानुगत कारणों से ये ऑक्‍सीजन के वाहक बनना बंद हो जाते हैं। अब दिमाग का एक हिस्‍सा बिना ऑक्‍सीजन की अवस्‍था में आ जाता है। तो उस हिस्‍से के न्‍यूरॉन मरने के संदेश भेजने लगते हैं। इसे नीयर डेथ एक्‍सपीरियंसेज कहते हैं। मौत को बहुत करीब से देखने वाले बहुत से लोगों को चमक, भगवान और कई तरह की चीजें दिखाई देने लगती हैं। दायां मस्तिष्‍क इस कल्‍पना को जन्‍म देता है और बायां भाग उसे जस्टिफाई करता है। अब स्‍कीजोफ्रीनिया में अंतर यह होता है कि दिन के चौबीस घण्‍टे, सातों दिन और सालों तक यह प्रक्रिया चलती है। ऐसे में रोगी संदेह करने लगता है। हर तथ्‍य पर जो सामने आता है। इसी अवस्‍था में ईश्‍वर उसे एकमात्र सहायक के रूप में नजर आने लगते हैं और वह छद्म विश्‍वास बना लेता है कि ईश्‍वर उससे बात कर रहे हैं या ईश्‍वर उसके कांटेक्‍ट में है।

इन लोगों के केवल ईश्‍वर ही नहीं बल्कि अन्‍य ऐसी कई चीजों के प्रति छद्म विश्‍वास होता है जो आमतौर पर होती ही नहीं हैं। जैसे एक रोगी को लगता था कि उसके सामने रखे शीशे में दो ड्रेगन हैं, एक अन्‍य रोगी को दूसरों द्वारा की जा रही साजिश दीवार पर चित्रों के रूप में दिखाई देती है। एक अन्‍य दूसरों पर अनैतिक लांछन लगता है।

प्रभाव: इस सबका असर यह होता है कि रोगी के परिवार के लोग ही एक-दूसरे को गलत समझने लगते हैं और रोगी के रोग की वजह बताने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि रोगी और भी अकेला पड़ जाता है। वह खुद यह डिसाइड नहीं कर पाता है कि कौन उसके पक्ष में है और कौन विरोध में।

ईलाज: सालों पहले तक इस रोग के बारे में चिकित्‍सकों की स्‍पष्‍ट राय नहीं होने के कारण पहले रोगी को संदमित करने की दवाएं दी जाती रहीं बाद में इलेक्ट्रिक शॉक की सहायता भी लगी गई लेकिन ये रोगी अनपेक्षित रूप से कभी भी ठीक हो जाते हैं और कभी भी गड़बड़। अब साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कब होगा और कब नहीं कोई नहीं कह सकता। ऐसे में रोगी का व्‍यवहार की उसके ईलाज में आड़े आता है। यानि कभी पूर्ण संयत होता तो भी पूर्ण मैनिक होना।

दवाएं: पिछले कुछ समय में कम संदमन करने वाली और ऑक्‍सीजन कैरियर की कमी की पूर्ति करने वाली दवाएं बाजार में आई हैं। इससे रोगियों को बहुत हद तक आराम भी मिला है।

अब मैं कह सकता हूं कि अंध विश्‍वास और छद्म विश्‍वास में अंतर है। उम्‍मीद है आप भी समझे होंगे....

अंत में: अगर आपको एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी की सुपरफीशियल तस्‍वीर देखनी हो तो आप ए ब्‍यूटीफुल माइंड फिल्‍म देखिए। गेम थ्‍योरी विषय में नोबेल पुरस्‍कार प्राप्‍त कर चुके जॉन नैश ने इस रोग को पूरे जीवन भोगा है और अब उनका पुत्र भी इसी बीमारी से ग्रस्‍त है।

जिस प्‍वाइंट को लेकर मेरे दिमाग में यह हलचल शुरू हुई वह लवली कुमारीजी की पोस्‍ट अन्धविश्वाशी लोगों में पाया जाने वाला सामान्य रोग - स्किजोफ्रेनिया थी।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

जब संबंध प्रोफेशनल रह जाते हैं

आज एक मेल मिली... मुझे लगा यह बहुत काम की है। ऐसे समय में तो अधिक काम की नजर आती है जब रिश्‍ते बस प्रोफेशनल रह जाते हैं, दोस्‍ती गुम हो जाती है, जानकार नाम के रहते हैं, संबंध बोझ बन जाते हैं, एक-दूसरे की देखभाल समय की खराबी बन जाती है, किसी और का ध्‍यान करना बेवकूफी समझा जाता है तो आइस बहुत अच्‍छा विकल्‍प लगता है।


HOW ICE WILL SAVE YOUR LIFE !

We all carry our mobile phones with names & numbers stored in its memory but nobody, other than ourselves, knows which of these numbers belong to our closest family or friends.

If we were to be involved in an accident or were taken ill, the people attending us would have our mobile phone but wouldn't know who to call. Yes, there are hundreds of numbers stored but which one is the contact person in case of an emergency?

Hence this "ICE" (In Case of Emergency) Campaign.

The concept of "ICE" is catching on quickly. It is a method of contact during emergency situations. As cell phones are carried by the majority of the population, all you need to do is store the number of a contact person or persons who should be contacted during emergency under the name "ICE" ( In Case Of Emergency).

The idea was thought up by a paramedic who found that when he went to the scenes of accidents, there were always mobile phones with patients, but they didn't know which number to call. He therefore thought that it would be a good idea if there was a nationally recognized name for this purpose. In an emergency situation, Emergency Service personnel and hospital Staff would be able to quickly contact the right person by simply dialing the number you have stored as "ICE."

For more than one contact name simply enter ICE1, ICE2 and ICE3 etc. A great idea that will make a difference!

Let's spread the concept of ICE by storing an ICE number in our Mobile phones today!

Please forward this. It won't take too many "forwards" before everybody will know about this It really could save your life, or put a loved one's mind at rest.

Remember:-

ICE will speak for you when you are not able to.

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

जनकवि को श्रद्धांजलि

हरीश भादाणी इस दुनिया में नहीं रहे। वे शायद स्‍वर्ग में नहीं जाएंगे। क्‍योंकि जीते जी जो ईश्‍वर के नाम पर बनाए हर सिस्‍टम का विरोध करते रहे वे मरने के बाद भी संभव है अपनी इस कोशिश को जारी रखें। केवल इसी कारण नहीं बल्कि आम आदमी की तकलीफ और दर्द को अपने सस्‍वर काव्‍य में दिखाने वाले हरीशजी को उनके पाठकों ने ही जनकवि बना दिया। जनवादी लेखक संघ के संस्‍थापकों में से एक इस कवि ने पूर्व स्‍थापित सभी मान्‍यताओं, भ्रांतियों और परम्‍पराओं को चुनौती दी और बहुत हद तक सफल भी रहे। अब अगर उसी भगवान के दूत उन्‍हें स्‍वर्ग में प्रवेश का न्‍यौता भी देंगे तो वे मना कर देंगे और एक नया स्‍वर्ग बनाएंगे। उनका वृहद् परिवार जिसमें उनके चाहने वालों की संख्‍या ही अधिक है, उस स्‍वर्ग में जाने के लिए लालायित रहेगा। खैर, बीकानेर के इस सपूत ने मरने के बाद भी बीकानेर नहीं छोड़ा। अपनी देह यहीं के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज को दान कर दी। यह भी स्‍थापित परम्‍परा को तोड़ने का ही जज्‍बा है। उन्‍हें मैं शब्‍दों में श्रद्धांजलि नहीं दे सकता सो उनकी कविता को यहां पेश कर रहा हूं जिसे उन्‍होंने तकरीबन हर मंच पर गाया फिर भी लोगों की प्‍यास बनी रही। उनके स्‍वर तो नहीं है लेकिन शब्‍द पेश करने की कोशिश कर रहा हूं।

रोटी नाम सत है

खाए ते मुगत है

ऐरावत पर इंद्र बैठे

बांट रहे टोपियां

झोलियां फैलाए लोग

भूग रहे सोटियां

वायदों की चूंटनी से

छाले पड़े जीभ पर

रसोई में लाव-लाव

भैरवी बजत है

रोटी नाम सत है

खाए ते मुगत है

बोले खाली पेट की

क्रोड़-क्रोड़ कुण्डियां

खाकी वर्दी वाले भोपे

भरे हैं बन्‍दूकियां

पाखण्‍ड के राज को

स्‍वाहा-स्‍वाहा होम दे

राज के विधाता सुण

तेरे ही निमत्त है

बाजरी के पिण्‍ड और

दाल की वैतरणी

थाळी में परोस ले

हथाळी में परोस ले

दाता के हाथ

मरोड़कर परोस ले

भूख के धरमराज

यही तेरा व्रत है

रोटी नाम सत है

खाए ते मुगत है

- जनकवि हरीश भादाणी

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

लड़का ही क्‍यों...

पिछले तीन दिन से बस सोच ही रहा हूं। आमतौर पर किसी एक विषय को लेकर सोचने का क्रम कभी इतना लम्‍बा नहीं चल पाता है लेकिन पिछले तीन दिन में हर काम करते-करते, उठते-बैठते, आते-जाते, सोते-जागते यही सोच रहा हूं। बचपन में मां सरस्‍वती की एक तस्‍वीर थी। उसमें उनके हाथ में वीणा और सादे वस्‍त्र देखा करता था। चेहरे पर ऐसी सौम्‍यता कि लगता काश यही मेरी मां होती। बाद में पता चला कि ये तो वास्‍तव में सबकी मां है। लता मंगेशकर को बहुत बाद में देखा। सुना पहले। कुछ खास अनुभव नहीं हुआ लेकिन जब देखा तो देखता रह गया। वही सादगी और वीणा के तारों की झनकार जैसी आवाज। मानो सरस्‍वती उनके जरिए अपनी आभा दिखा रही हो। कई कार्यक्रमों में देखा। एक बार तो टीवी पर लाइव शो देखा। उसमें अमिताभ बच्‍चन उनके साथ गा रहे थे। कुछ लोग स्‍टेज पर आने पर उनके पैर छू रहे थे। कुछ नहीं भी छू रहे थे, तब मैंने सोचा कि जो लोग लता जी के पैर नहीं छू रहे हैं वे एक अच्‍छा मौका खो रहे हैं। एक बार यसुदास ने कहा कि अब लताजी की आवाज में कंपन आ गया है उन्‍हें गाना बंद कर देना चाहिए। तब अच्‍छा खासा बवाल खड़ा हो गया था। तब खुद लताजी ने कहा कि यसुदास सही कह रहे हैं। उसके बाद ही मैंने यसुदास के कैसेट्स लाकर सुने। लड़कपन से एक इच्‍छा यह भी है कि एक बार मुम्‍बई जाउं और लताजी के पैर छूकर आउं। लताजी को देखकर ही मुझे शायद एक बेटी की भी इच्‍छा है।

पिछले दिनों वे अस्‍सी साल की हो गई। वही सौम्‍य अंदाज और वही वीणा के तारों की आवाज। उनके अस्‍सीवें जन्‍मदिन पर उनके एक पुराने इंटव्‍यू को छापा गया था। उसी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। उसमें उन्‍होंने कहा कि अगले जन्‍म में वे लड़की नहीं बल्कि एक साधारण परिवार में लड़का बनकर जन्‍म लेना चाहती हैं। इस बात ने मुझे झकझोर दिया। मैं सोच रहा था कि वैसी जिंदगी बार-बार कौन नहीं चाहेगा लेकिन इस जन्‍म में भी लताजी को शांति नहीं मिली तो कैसे जन्‍म में मिलेगी। क्‍या एक लड़का होना अच्‍छी जिंदगी की गारंटी है। क्‍या लड़कियां वास्‍तव में खाली दु:ख पाने के लिए ही पैदा होती हैं। हो सकता है कि मंगेशकर बहनों का बचपन इतना अच्‍छा नहीं रहा। हर किसी ने अपने तरीके से संघर्ष किया। लताजी के अलावा आशा भोंसले के जीवन में भी उतार चढ़ाव रहे और दोनों मंगेशकर बहनों की वृहद् छाया में उषाजी को भी कुछ तकलीफ हुई होगी। भले ही निरी ईर्ष्‍या के कारण ही हुई हो। लेकिन किसे समस्‍या नहीं है।

एक ज्‍योतिषी या एक पत्रकार के तौर पर देखता हूं तो समस्‍याएं हर जगह दिखाई देती हैं। क्‍या पलायन से शांति संभव है। क्‍या संघर्ष से भागने पर इसका अंत हो जाता है। क्‍या रणछोड़ बन जाने से युद्ध की स्थिति खत्‍म हो जाती है। लड़ना तो पड़ेगा ही संघर्ष की लकीरें नहीं होगी तो कैसे लिखेंगे जीवनी।

फिर दूसरा पक्ष भी मैं सोचना चाहता हूं। मैंने पढ़कर और देखकर अनुभव किया है कि इंसान दो चीजों के लिए जिंदा रहता है। स्‍पर्श और महत्‍व। वास्‍तव में इस जिंदगी में लताजी को इनमें से एक ही मिला होगा। असामान्‍य बचपन ने स्‍पर्श का अभाव दिया, असामान्‍य जवानी ने भी स्‍पर्श को दूर रखा और अब वृद्धावस्‍था भी स्‍पर्श से अछूती लगती है। ऐसे में जीवन अनुभव के दो मूल तत्‍वों में से एक का एकांतिक अभाव ऐसी सोच को पैदा कर रहा होगा। मैं भी चाहता हूं कि लताजी को अपने अगले जीवन में दोनों सुख मिले और भरपूर मिले, लेकिन क्‍या उसके लिए लड़का होना जरूरी है।

मैं निजी तौर पर चाहता हूं कि हमारी अगली संतान कन्‍या हो। लता मंगेशकर जैसी हो। भले ही उसे लताजी जैसी प्रसिद्धि न मिले लेकिन सादगी और वीणा के तारों सी आवाज हो। उसे हर संभव सुविधाएं मुहैया कराउं, उसके लिए अच्‍छा वर ढूंढकर लाउं और वह मनमर्जी का अच्‍छा जीवन जिए। मेरे जैसे बहुत से लोग होंगे जो ऐसी कामना रखते होंगे। लताजी से निवेदन है कि वे ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि ऐसे ही किसी घर में वे अगले जन्‍म में पैदा करे। फिर से कन्‍या बनाकर न कि लड़का। क्‍योंकि मां सरस्‍वती के आशीर्वाद की अभी इस धरती को बहुत जरूरत है। इस जन्‍म में भी मैं चाहता हूं कि लताजी कम से कम बीस साल तो और जिएं। उनके सौ साल पूरे होने तक मैं इंतजार कर लूंगा। उसके बाद अगली संतान करने को तैयार हूं। फिर मेरे घर आए कन्‍या के रूप में मां सरस्‍वती का आशीर्वाद बनकर...

बुधवार, 9 सितंबर 2009

अभिभूत हूं

सात सितम्‍बर को मेरा जन्‍मदिन था। जब पच्‍चीस साल का हुआ था तो लगा था कि बहुत बड़ा हो गया। तब से हर बार वर्षगांठ आने पर लगता कि अरे अभी तक कुछ किया भी नहीं और चौथाई जिंदगी निकल गई। आस-पास का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। सो लगता कि जन्‍मदिन आने का मतलब है बहुत खराब बात। एक और साल हाथ से निकल गया। इस भावना ने दिन में काम के घण्‍टों को बढ़ा दिया था। पहले पढ़ाई के साथ-साथ कम्‍प्‍यूटर कोर्स और खेल-कूद जारी रखे तो नौकरी लगने के बाद भी दूसरे आयाम खोजता रहा।

2008 में सक्रिय रूप से ब्‍लॉगिंग में जुड़ा और इसके बाद तो जैसे पंख लग गए। रोज नए लोगों से जानकारी और रोज नए विचार। कभी-कभार इतनी खुश करने वाली घटनाएं भी नहीं होती लेकिन ओवर ऑल बहुत अच्‍छा समय रहा। अभी सात सितम्‍बर को 32 साल का हो रहा था, तब अचानक इस बार दो-तीन दिन पहले घर में जन्‍मदिन की तैयारी शुरू हो गई और बाहर भी लोग पूछने लगे। ऑफिस में जहां आमतौर पर मैकेनिकल माहौल रहता है, वहां भी सरसता घुल गई। स्‍टॉफ के कई लोगों को पता था कि सात सितम्‍बर को मेरा हैप्‍पी बर्थ डे है :)

उत्‍साह बढ़ता गया, मैंने पाबलाजी को मेल करके आग्रह किया कि ब्‍लॉगर्स के जन्‍मदिन में मेरा नाम भी शामिल किया जाए। पांच सितम्‍बर को सुबह मेल की और दोपहर तक तो उनकी मेल वापस भी आ गई। शाम तक तो नाम भी जुड़ चुका था और सात सितम्‍बर को बड़े फोंट में उस ब्‍लॉग पर प्रकाशित हुआ कि आज सिद्धार्थ जोशी का जन्‍मदिन है। ऐसा लगा किसी और के बारे में पढ़ रहा हूं। नीचे बधाइयों के संदेश जुड़ते गए।

ब्‍लॉग, ईमेल, एसएमएस, ऑरकुट और फोन कॉल के दौर सुबह-सुबह शुरू हो गए जो देर रात तक चलते रहे। सालों बाद ऐसा लगा कि वाह... ऑफिस में तो छोटी सी पार्टी भी हो गई।

घर में भी पार्टी भी हुई। परिवार के लोग एकत्रित हुए। हमारे यहां काठे दाल-भात और लापसी बनते हैं। यह टिपिकल राजस्‍थानी या कहूं बीकानेरी खाना है। कुल जमा पंद्रह लोग शामिल हुए लेकिन गिफ्ट खूब आए। सबने दिए। कैश भी। मजा आ गया।

साल में कम से कम एक बार तो ऐसा होना ही चाहिए कि बर्थ डे ब्‍वॉय बना जाए। दिन में जमकर खुशियां मनाने के बाद रात को उत्‍साह के मारे नींद भी नहीं आई। (वैसे भी रोज दो बजे से पहले सोता नहीं हूं)। बैठकर बीते सालों के बारे में सोचता रहा। फर्क बस इतना था कि अच्‍छी बातें ही ध्‍यान आई।

पता नहीं साल कैसा बीतेगा लेकिन पहला दिन इतना मस्‍त था कि लगा पूरा साल बढि़या जाएगा। एक बार फिर सभी लोगों को दिल से धन्‍यवाद। मेरे खास दिन को खासमखास बनाने के लिए।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

क्‍या हम अपनी ही ताकत से डरते हैं ?

मुझे लगता है हां, कई बार यह इतनी अधिक हो जाती है कि समझ में नहीं आता कि इसका क्‍या किया जाए। तब या तो इसे नष्‍ट करने के तरीके ढूंढने लगते हैं या फिर उसे डायवर्ट कर देते हैं। वास्‍तव में पूरी ताकत का क्‍या किया जाए इसका जवाब काफी टेढ़ा है। गांधी, नेहरू, सरदार वल्‍लभ भाई पटेल, कृष्‍ण मेनन, चेतन भगत, नेपोलियन, हिटलर, डेंजिल वाशिंगटन, इंदिरा नुई, इंदिरा गांधी, सचिन तेंदुलकर सहित हजारों नाम गिनाए जा सकते हैं। वही बहत्‍तर हजार आठ सौ चौसठ नाडि़यां और वही फेफडे़ होने के बावजूद प्रयासों में जमीन आसमान का अन्‍तर है। तो क्‍या शरीर से इतर दिमाग की कोई नस ऐसी भी है जो बाकी के हिस्‍से को खोलने से रोकती है।

कुछ भी हो ताकत तो वही है, फिर कौनसी चीज है जो हमें रोकती है...

क्‍या है जो उन्‍हें लगातार आगे बढ़ने और अनजान की ओर जाने का साहस देता है...

कौनसी शक्ति इसके पीछे काम करती है्...

कैसे वे अपनी शक्ति को नियंत्रित कर पाते हैं...

यह भाग्‍य तो नहीं हो सकता क्‍योंकि भाग्‍य की बात की जाए तो इनमें से अधिकांश लोगों ने आम लोगों से अधिक दुर्भाग्‍य झेला होगा...

क्‍या वास्‍तव में हम अपनी ताकत से डरते हैं... ?

शनिवार, 29 अगस्त 2009

दार्शनिकता कब शुरू होती है

Adi    SwamiMain      ka     11024X768

दो साल तक ऑ‍फीशियली दर्शन का विद्यार्थी रहा। ऑफीशियली का मतलब पोस्‍ट ग्रेजुएट का विद्यार्थी रहा। उन दो सालों में ओशो, कृष्‍णामूर्ति, अरविन्‍द और विवेकानन्‍द के जीवन दर्शन से इतर शुद्ध लॉजिकल दर्शन से रूबरू हुआ। मेरे लिए जुदा अनुभव था। 'मैं हूं इसलिए ईश्‍वर है' और 'घोस्‍ट इन द मशीन' के पश्चिमी विचारों से लेकर 'एको ब्रह्म जगत मिथ्‍या' तक के विचारों को पढ़ गया था। हालांकि शंकराचार्य उत्‍तरार्द्ध में आते थे लेकिन मैं उन्‍हें भी पूर्वाद्ध में पढ़ गया। कोई काम तो था नहीं, नया नया शौक था सो पढ़ता गया। दिसम्‍बर की सर्दियों में जोधपुर विश्‍वविद्यालय से एक प्रोफेसर आए जोशी जी (अभी उनका पूरा नाम याद नहीं आ रहा, वे अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर के फोटोग्राफर भी हैं।) का अतिथि व्‍याख्‍यान हुआ। पहले दिन उन्‍होंने हल्‍के-फुल्‍के अंदाज में 'दर्शन क्‍या है' पर भाषण दिया। न तो भाषण समझ में आया न उसका औचित्य। एक सवाल उन्‍होंने शुरू से आखिर तक खड़ा किया था कि दर्शन कब शुरू होता है। और मेरे दिमाग में एक ही बात आई कि जब आदमी खा पीकर लेटी हुई मुद्रा में होता है तब यह दर्शन शुरू होता है।

भाषण के आखिर में उन्‍होंने पूछ ही लिया कि बताइए दर्शन कब शुरू होता है। उनका मतलब सत्‍य की खोज लॉजिकल तरीके से पराकाष्‍ठा तक पहुंचने के संदर्भ था। उन्‍होंने डेढ़ घण्‍टे के अपने भाषण में यही स्‍थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन मैं अड़ गया। मेरे पास अपने ठोस कारण थे। हमारी बीकानेर की डूंगर कॉलेज में पूर्वाद्ध और उत्‍तरार्द्ध के अस्‍सी छात्रों में एक भी ऐसा बंदा नहीं था जो स्‍थापित परिवार से न हो। यानि सब खाते-पीते घरों के। पोस्‍ट ग्रेजुएट करके भी वे अपने परिवारों पर अहसान कर रहे थे, कि बेरोजगार नहीं है पढ़ रहे हैं। मेरे खा-पीने के बाद लेटने वाले लॉजिक में दम था। हमारी कॉलेज के संस्‍कृत के एक विद्वान अध्‍यापक को मेरी बात जंची नहीं। वे सोच रहे थे कि मैं दर्शन की मजाक बना रहा हूं लेकिन जोशी सर समझ गए। उन्‍होंने कहा आज के संदर्भ में तुम्‍हारी बात ठीक है लेकिन पश्चिम में अरस्‍तू और भारत में शंकराचार्य ने भूखे रहकर दर्शन को स्‍थापित किया। इस पर मेरा कहना था कि वे शुद्ध विचार थे जिन्‍हें अब दर्शन में शामिल किया गया है। जोशी सर का पक्ष भी उतना ही दमदार था, लेकिन मेरा लॉजिक भी कॉलेज में दर्शन को चुनौती दे रहा था। इस बीच संस्‍कृत वाले सर बौखला गए। वे वार्ता को सिरे पर पहुंचाने के बजाय मुझे ही डांटने लगे। उनके कारण बात सिरे पर नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में भाषण और संवाद खत्‍म होने के बाद बाहर बरामदे में मैंने कोशिश की कि जोशी सर से एक बार फिर बात की जाए लेकिन दूसरे अध्‍यापकों ने मुझे मौका नहीं दिया। अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त लैक्‍चरर से हर कोई मिलने को उत्‍सुक था। मेरी बात वहीं  रह गई।

अंत में मैंने अपने स्‍तर पर ही निष्‍कर्ष निकाला कि अब जो दर्शन है वे इलाईट क्‍लास के हाथ में है ओर कुछ नया विचार आने के बजाय बस पुराने विचारों की जुगाली हो रही है। बाद में और भी पढ़ा पर कहीं भी शुद्ध दार्शनिकता नहीं मिली। उन दो सालों के बाद जब भी ओशो को पढ़ा तो लगा कि वे लॉजिक से स्‍थापित पुरानी बातों को चुनौती दे रहें, उसमें नया कुछ नहीं बस विरोध है। हर स्‍तर पर विरोध, चार्वाक को खराब बताया गया है तो चार्वाक का समर्थन कर देते हैं और नीति को सही बताया गया है तो उसके औचित्‍य पर सवाल खड़ा कर देते हैं। विवेकानन्‍द और अरविन्‍द पुरानी बातों को नए अंदाज में दोहरा रहे हैं। बस कृष्‍णामूर्ति का संवाद नया है लेकिन सिरे चढ़ता नहीं लगता। खुले सूत्र इतने अधिक हैं कि वह स्‍थाई नहीं दिखाई देता।

उत्‍तरार्द्ध में जब डेजरर्टेशन देने का मौका आया तब भी मैंने पुराने विचारों को ही लिया। बस अंतर इतना था कि दो दर्शनों को जोड़ दिया था। वास्‍तव में यह कहना भी गलत होगा कि जोड़ दिया। वे खुद जुड़े हुए हैं। राबिया,  अमीर खुसरो, खय्याम, इकबाल जैसे विचारक वास्‍तव में शंकराचार्य के दर्शन की ही पैरोकारी करते हैं। अपने अंदाज में। सो मैंने विषय रखा 'इस्‍लाम में धर्म की दार्शनिक पृष्‍ठभूमि।' इसमें मैंने इस्‍लाम को कुरान से इतर सूफी रहस्‍यवाद से जोड़कर पेश किया था। जब मैंने इसे सभा में पढ़ा तो विद्यार्थियों के अलावा हमारी एचओडी का चेहरा भी ब्‍लैंक था। डेजरर्टेशन खत्‍म होने के बाद तो उन्‍होंने ईमानदारी से कह दिया कि सिद्धार्थ ये कहां से उठा लाए हो। खैर मुझे तो समझ नहीं आया, जो भी है इसे सबमिट कर दो। :)

चाइनीज कॉल सेंटर में

1 

Caller: Hello, can I speak to Annie Wan?

Operator: Yes, you can speak to me..

Caller: No, I want to speak to Annie Wan!

Operator: Yes I understand you want to speak to anyone. You can speak to
me.. Who is this?

Caller: I'm Sam Wan .. And I need to talk to Annie Wan! It's urgent.

Operator: I know you are someone and you want to talk to anyone ! But
what's this urgent matter
about?

Caller: Well... just tell my sister Annie Wan that our brother Noe Wan
was involved in an accident.
Noe Wan got injured and now Noe Wan is being sent to the hospital.
Right now, Avery Wan is on his way to the hospital.

Operator: Look, if no one was injured and no one was sent to the
hospital, then the accident isn't an urgent matter! You may find this hilarious but I don't have time for
this!

Caller: You are so rude! Who are you?

Operator: I'm Saw Ree ..

Caller: Yes! You should be sorry . Now give me your name!!

Operator: That's what I said. I'm Saw Ree ..

Caller: Oh .....God.... .

From
Good Wan!

यह चुटकुला आज मेल से प्राप्‍त हुआ।

बुधवार, 26 अगस्त 2009

बाबे के पीरत्‍व में कमी

Baba Ramdev2
भादवे ही दशमी को बाबा रामदेव का मेला भरेगा। एकम् को बीकानेर से हजारों पैदल यात्रियों ने 200 किलोमीटर से अधिक लम्‍बी यात्रा शुरू की। कई लोग तो बीकानेर से भी दूर से आए थे, जैसे हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर से। यानि यात्रा में कुछ सौ किलोमीटर और जुड़ गए। जैसलमेर के रूणीचा स्थित धाम जाने वालों में कुछ साल पहले तक हिन्‍दुओं को मुसलमानों की संख्‍या बराबर थी। यह ऐसा मेला है जहां जांत-पांत ऊंच-नीच खत्‍म हो जाते हैं। पूरा रास्‍ता श्रद्धालुओं से अटा होता है और मार्ग पर एक ही घोष होता है, जय बाबे री। यही पदयात्रियों को इतनी लम्‍बी यात्रा करने का जोश दिलाता है। इस बार हिन्‍दुओं की तुलना में मुसलमान बहुत कम दिखाई दिए। सही कहूं तो दिखाई ही नहीं दिए। मुझे पता नहीं क्‍या कारण रहा होगा, लेकिन दिखाई नहीं दिए सो बता रहा हूं। सालों से सुनता आ रहा हूं कि बाबा रामदेव जहां हिन्‍दुओं के लिए देवता है  वहीं मुसलमानों के लिए पीर है। 
क्‍या बाबा रामदेव के पीरत्‍व में कमी हो गई है।
क्‍या बाबा कि केवल हिन्‍दुओं की मन्‍नत पूरी कर रहे हैं।
क्‍या मुसलमानों को इन सालों में उन्‍होंने कोई पर्चा नहीं दिया।
क्‍या लोकदेवता के आगे भी नेताओं की बनाई छद्म दीवार आड़े आ रही है।
क्‍या मुस्लिमों की सभी मन्‍नतें पूरी हो चुकी हैं।
अभी रमजान का पवित्र महीना चल रहा है। मुसलमान रोजा रखकर अपने तन और मन की शुद्धि में लगे हैं। दिनभर हर तरह की बुराई से दूर रहकर कठोर व्रत करते हैं और दिन ढलने पर रोजा खोलते हैं। इन सालों में रोजा रखने वाले बच्‍चों की संख्‍या में भी बढ़ोतरी हुई है। इससे मैं कह सकता हूं कि धार्मिक आस्‍थाएं कम तो नहीं हुई। अल्‍लाह पर मुसलमानों को अब भी गहरा भरोसा है। पर दोनों समुदायों को एक जैसा मानने वाले और हर आने वाले श्रद्धालु को श्रद्धा के अनुरूप पर्चा देने वाले बाबा रामदेव के प्रति रुचि कम होने का कारण सोचने के लिए मजबूर कर देता है।
वैसे मेरा यह ऑब्‍जर्वेशन बीकानेर तक ही सीमित है। हो सकता है दूसरे शहरों, दिशाओं, रास्‍तों और माध्‍यमों से मुस्लिम समुदाय के लोग रूणीचा पहुंचे होंगे। बीकानेर के मार्ग से जा रहे पैदल यात्रियों में इनकी संख्‍या कम देखकर कुछ उथल-पुथल हुई सो व्‍यक्‍त कर दी।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर बैठकर...

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यहां बीकानेर में पाकिस्‍तान की अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर बैठकर एक भारतीय दिल्‍ली और शिमला में हो रही उठापटक के क्‍या मायने देख सकता है। मुझे सोचता हूं कि सिंधु नदी के इस पास सुदूर दक्षिण में हिन्‍द महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और उत्‍तर में हिमालय के बीच गोथळी की तरह तीन दिशाओं से सुरक्षित है। इस भूभाग को हमेशा पश्चिमी कोने से आए विदेशियों का इंतजार रहा है। भले ही वे हमें अच्‍छे लगें हों या नहीं लेकिन उनका आना और हमें प्रभावित करने का सिलसिला अब भी जारी है और आगे भी जारी रहना चाहिए। वरना हम नए विचारों के अभाव में सड़ने लगेंगे।

पश्चिम और पश्चिमी लोगों के प्रति भारतीयों का रैवेया हमेशा स्‍वागत वाला रहा है। इतिहास बताता है कि कई बार पश्चिमी आक्रांताओं ने भारत को लूटा लेकिन भारत ने कभी इस राह में चीन जैसी दीवार बनाने की नहीं सोची। क्‍योंकि नए विचार और क्रांतियां भी इधर से ही आ रही थी। सतत क्रांति के दौर से गुजर रहे भारत को लगातार ताजी बयार की जरूरत महसूस होती है। कभी-कभार ऐसा भी होता है कि जड़ मानसिकता वाले लोग इस बयार और ताजे विचारों का विरोध करने लगते हैं। मुझे लगता है यही द्वंद्व है।

जिन्‍ना को लेकर हिन्‍दू उग्रवादी संगठन का अपने ही नेता के प्रति रेवैया यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्‍या वास्‍तव में सीमा हमें इस कदर काटकर रख देती है कि हम उस पार की अच्‍छाई या बुराई या तटस्‍थ विचार  भी बयान नहीं कर सकते। वह भी ऐसे संगठन में जो राष्‍ट्रीय होने का दंभ भरता है। शायद सीमा पर रहने वाले बहुत से लोग जमीन और इंसानों से घृणा नहीं भी करते हैं। घृणा के लायक बस गंदी राजनीति ही हो सकती है जो सीमाओं को बांधे रखती है। वरना तो मीलों तक पसरे रेगिस्‍तान में कभी भी जामों की अदला-बदली भी हो सकती है। भले ही जमीन पर बाड़ खींच दी गई हो, लेकिन आंखें देखती हैं कि हम भी नहाते-धोते हैं, हंसी मजाक करते हैं और वे भी। हमारे पास भी पशु और धान हैं और उनके पास भी। वे भी उतने ही जिंदा और ईश्‍वर के करीब हैं जितने हम। विदेश मंत्री रहने के दौरान और विदेशी जमीन पर स्‍थापित कंपनियों में भारतीयों और पाकिस्‍तानी नागरिकों को एक थाली में खाते देख जसवंत सिंह ने भी पार्टी और संघ की लघु सोच पर विचार किया होगा। यह इसलिए हुआ होगा क्‍योंकि नागपुर में उनका ब्रेनवाश नहीं किया जा सका था। अपनी अधिकांश उम्र छद्म राष्‍ट्रवाद और हिन्‍दुवाद में झोंक देने के बाद जब इस व्‍यक्ति ने अपने विचार व्‍यक्‍त किए तो मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए इक्‍का-दुक्‍का मुस्लिम लीडर शामिल कर चुकी भाजपा ने उन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखा दिया।

विभाजन से पहले और बाद में बहुत सा हिन्‍दुतान बचा रह जाता है। हालांकि अब उसका कुछ भाग पाकिस्‍तान के पास है लेकिन यादों का क्‍या करें?

विभाजन की त्रासदी को जिन लोगों ने झेला हैं उनमें से कुछ को मैं भी जानता हूं। सीमा से बिल्‍कुल सटे बीकानेर में ऐसे बहुत से परिवार हैं जो सिंध में अपना चलता कारोबार छोड़कर यहां आ बसे। जो कुछ साथ लाए थे वह भी जल्द ही खत्‍म हो गया। उन लोगों ने शून्‍य से शुरूआत की और अब तक अच्‍छी स्थिति में आ चुके हैं। विभाजन का दर्द कम भले ही न हुआ हो लेकिन कुछ धुंधला पड़ने लगा है। वह अब रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित नहीं करता। वे लोग सिंध से आए तो सिंधी भाषा और संस्‍कृति भी अपने साथ लेते आए। कुछ झूलेलाल को मानने वाले हैं तो कुछ वल्‍लभाचार्य के वैष्‍णव हैं। पिछले दिनों सिंधी समाज के बिल्‍कुल करीब जाने का अवसर मिला। तो पता चला कि पुष्‍करणा भी सिंधी ही हैं। यानि मैं भी सिंध से ही आया हुआ हूं। मुझे बहुत आश्‍चर्य हुआ। लेकिन सिंधी समाज के लोग जिनसे मैं बात कर रहा था, यह बात इतनी सहज होकर कह रहे थे कि बात मेरी समझ में नहीं आई। तो एक पढ़े लिखे सज्‍जन ने बताया कि अरे सांई, हम तो पचास-साठ साल पहले ही आए हैं, तुम तीन-चार सौ साल पहले आ गए थे। मैं इंटरव्यू कर रहा था और कई लोग बैठे थे सो सोचने का समय नहीं था। मैंने बात वहीं खत्‍म कर दी। घर आया तो यही बात दिमाग में घूम रही थी। पुष्‍करणा ब्राह्मणों में भी लालवाणी, सत्‍याणी और देवाणी की तरह कीकाणी, लालाणी और केशवाणी जैसी जातियां होती हैं। तो मेरे लिए यह स्‍वीकार करना अधिक आसान हो गया कि मैं भी इन सिंधियों की तरह इस भारत भूमि पर सिंध प्रांत से आया बंदा हूं। बस अंतर इतना है कि मैं तीन-चार सौ साल पहले आ गया था। यानि भारत ने इतने वर्ष पहले ही मुझे स्‍वीकार कर लिया था। विभाजन तो बहुत बाद की घटना है। विभाजन के बाद पाकिस्‍तान बना और अब तो सिंध प्रांत से आने वाली हवा को भी घृणित समझा जाने लगा है। अगर वह हमारा, कम से कम पुष्‍करणा समाज का उद्गम स्‍थल है तो मैं तो उस स्‍थान से घृणा नहीं कर सकता। दूसरे लोगों के लिए भी केवल यही कारण नहीं हो सकता घृणा करने का, कि वह उनका उद्गम स्‍थल नहीं है। इसी आधार पर मैं भी पंजाब, हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश से घृणा नहीं कर सकता। एक हिन्‍दु ब्राह्मण होने के बावजूद सिंध से अपना कुछ जुड़ाव महसूस करता हूं और सोचता हूं, क्‍या उधर भी कुछ सोचने विचारने और देश व संप्रदाय की सीमाओं को ताक पर रखने वाले लोग होंगे।

इसका जवाब मिला अपने मामा से। वे एक दशक से अधिक लम्‍बे समय तक‍ डिफेंस रिसर्च एण्‍ड डवलपमेंटल ऑर्गनाइजेशन की दिल्‍ली लैब में रहे। पिछले दिनों निदेशक के पद से सेवानिवृत्‍त होकर बीकानेर लौट आए हैं। डीआरडीओ में काम करने से पहले वे बीस साल तक अमरीका में थे। बाद में कलाम के बुलावे पर भारत लौटे। बातचीत में एक बार उन्‍होंने बताया कि उनके दो दोस्‍त थे और एक प्रतिद्वंदी। दोस्‍तों में एक अमरीकी था और एक पाकिस्‍तानी। प्रतिद्वंदी कश्‍मीरी था। वह अपने काम में इतना अधिक दक्ष था कि हमेशा कड़ी चुनौती दिए रखता था। काम को पूरा करने में अमरीकी और पाकिस्‍तानी दोस्‍त हमेशा उनकी मदद करते थे। मेरे लिए उन दिनों यह सोचना भी टेढ़ा काम था कि एक पाकिस्‍तानी उनका खास दोस्‍त है। मैं कौतुहल से पूछता तो वे हंसते। कहते वहां सब एक हो जाते हैं। देशों की सीमाएं संस्‍थानों में लुप्‍त हो जाती हैं। तभी अमरीका इतनी तरक्‍की कर पा रहा है। क्‍या भारत भी ऐसा कर सकता है। या ऐसा ही चलता रहेगा कि उन्‍मुक्‍त विचारों का गला घोंटने के लिए कुछ संगठन प्रतिगामी क्रियाओं में ही व्‍यस्‍त रहेंगे।

कभी सोचता हूं भारतीय मतदाता भी इसमें बराबर के दोषी हैं...

बुधवार, 19 अगस्त 2009

दो मामा की भूखी भानजी

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अनाथ चंपूबाई के दो मामा हैं। छोटे हैं जो हल्‍दी की गांठ लेकर पंसारी की दुकान चलाते हैं और बड़े ट्रेडिंग से जुड़े हैं। वे पुराने सामान से लेकर घर के बर्तनों तक की ट्रेडिंग करते हैं। जब चंपूबार्इ के बड़े मामा की शादी पक्‍की हुई तो ससुराल वालों ने पूछा था कि मामा क्‍या करते हैं। तो नानी ने अश्‍वत्‍थामा हतोहत: की तर्ज पर झूठ बोल दिया कि बड़ा बर्तन बेचता है। उनके ससुराल वालों को बाद में बहुत गुस्‍सा आया जब पता चला कि बड़ा तो घर के ही बर्तन बेचता है और पैसा बैंक में जमा कर देता है। शादी में मिले बर्तन भी बड़े ने बेच दिए और पैसा बैंक में जमा करा दिया। नाना ने पूछा कि क्‍या करोगे बेटा पैसा जमा करके। तो बेटा बोला किसी दिन लौटा लाएंगे बड़ी योजनाओं के लिए। तो नाना ने समझाया बड़ी योजनाएं तो मेरा खून चूसने के लिए ही बनाई जाती है फिर तेरा पैसा कहां काम आएगा। लेकिन बड़ा अड़ा रहा। बर्तन बिक गए। घर में खाना पकना बंद हुआ तो घर के बच्‍चों ने सर्वशिक्षा अभियान के तहत मिल रहे मिड-डे मील को खाना शुरू कर दिया। बड़ा मामा खुश था। क्‍योंकि नाना के ही पैसों से अभियान चल रहा था। बड़ी योजना थी।

अब हाल छोटे का। नाना ने सोचा कि छोटे की भी शादी कर देते हैं। बहु कान खींचेगी तो बड़े से धन निकलवा लेगा। शादी हो गई। शादी होते ही छोटा प्रसन्‍नचित्त रहने लगा। न दिन का ख्‍याल न रात का जीभरकर मजे लूट रहा था। नाना को गुस्‍सा आ गया। एक दिन बिस्‍तर से बाहर खींचा और फेंक दिया बड़े के कमरे के आगे। और कोई चारा न देखकर छोटा बड़े के कमरे में डरते-डरते दाखिल हुआ और पता नहीं क्‍या सांठ-गांठ हुई कि बड़े ने कई बड़ी योजनाएं छोटे को पकड़ा दी। छोटा खुशी-खुशी योजनाएं लेकर अपने कमरे में दाखिल हो गया। नाना देखते रह गए। अब दोनों मामाओं की पांचों अंगुलियां घी में और सिर कढाही में। बाकी बच गए तीन जन। नाना, नानी और अनाथ चंपूबाई। न बड़े ने खाने का पूछा न छोटे ने। दोनों अपनी-अपनी बीवीयों और बच्‍चों के साथ होटल गए और खाना खा आए। चंपूबाई अब भी देख रही थी। धान की गैळ में दोनों मामाओं को घर में बैठी चंपूबाई दिखी ही नहीं। दोनों अपने-अपने कमरों में जाकर सो गए। रात को बड़ी मामी ने मामा से पूछा चंपू ने क्‍या खाया तो बड़े ने कहा छोटा लाया होगा चंपू के लिए। उधर छोटी मामी ने मामा से पूछा तो छोटे मामा ने कहा बड़ा कुछ लाया होगा चंपू के लिए। दो मामाओं की भानजी चंपू को कुछ नहीं मिला।

भूखी चंपूबाई रातभर भूख से तड़पती रही। कुछ दिन यही क्रम चलता रहा। चंपूबाई की भूख बढ़ी तो बाहर निकली और गंगू के घर पहुंच गई। वहां जमकर खाया और घर के राज बताए। गंगू को यही तो चाहिए था। वह घर में घुसा और तोड़-फोड़ मचाकर निकल गया। मामा सोते रह गए। सुबह मामाओं की आंख खुली तो पता चला कि घर में तोड़ फोड़ हुई है। अब दोनों एक दूसरे पर दोष मंढने लगे। चंपूबाई रातभर की जागी हुई थी और भोर में खाना मिला था सो लम्‍बी तान के सो गई। नाना भूखे बैठे किनारे की ओर बैठे देख रहे थे और हंस रहे थे। शाम ढलने तक मामा लड़ते रहे, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

जब तक राज्‍य और केन्‍द्र के मामाओं के बीच हमारी राष्‍ट्रीय सुरक्षा यो ही भूखों मरेगी तब तक घर में आतंकी हमले होते रहेंगे। घर को योजनाओं के नाम पर मामा खा रहे हैं और चंपूबाई भूख से बेहाल होकर गंगू के हाथों दो रोटी की एवज में बिक रही है। अब तक मेरी समझ में यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि करप्‍शन ऊपर से नीचे आता है या नीचे से ऊपर जाता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

ओपन सोर्स ब्‍लॉगिंग का वक्‍त आ गया है

पिछले दिनों चिठ्ठा चर्चा में चोरी पर पूरी एक पोस्‍ट बन गई थी। तब उसमें हो सकता है बहुत से लोगों का ध्‍यान गया हो लेकिन मुझे इस कमेंट ने बहुत प्रभावित किया। यह था कि आप खुद को स्‍वतंत्र महसूस करें मेरे लेखों को चोरी करने के लिए। निशांत मिश्राजी ने इसके प्रति ध्‍यान आकृष्‍ट किया था। मैं पहुंच गया वहां मिले जैन हैबिट्स के Leo Babauta। टाइटल था Open Source Blogging: Feel Free to Steal My Content.

मुझे बात जम गई। पहले भी ब्‍लॉगिंग की रीति नीति और हां साहित्‍य को लेकर काफी चर्चा हो चुकी है। इन सबको देखते हुए मैं ओपन सोर्स ब्‍लॉगिंग को करारा जवाब मान सकता हूं। इस पोस्‍ट को पढ़ने के बाद मुझे भी लगा कि वास्‍तव में कॉपीराइट एक्‍ट और कुछ नहीं बस आपके विचारों को रोकने का एक साधन है। क्‍या हुआ अगर किसी व्‍यक्ति ने मेरा कोई लेख उठा लिया। अगर वह इस लेख को आगे प्रचारित करता है तो खुश होने की बात है कि मेरी क्रिएटिविटी (जितनी भी है) का आगे प्रसार हो रहा है। विचार लगातार आगे बढ़ रहा है। विचार तो ऐसी ही चीज है जितना आगे बढ़ेगा उतना ही प्रबल होगा।

प्रिंट या अन्‍य प्रकाशन माध्‍यमों में कॉपीराइट लगाने की कोशिश अकसर प्रकाशक ही करता है न कि लेखक। लेखक को तो खुशी ही होती होगी जब कोई उसके ही विचारों को अधिक समृद्ध रूप में वापस उसके सामने लेकर आए। लेकिन प्रकाशकों को इससे नुकसान होता है। कुछ समय पहले पॉल कोएलो ने भी कुछ इसी तरह से अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उनकी पुस्‍तक द एल्‍केमिस्‍ट की करोड़ो प्रतियां बिक जाने के बाद पॉल ने अपने प्रकाशकों को कहा कि अब इस किताब को मुफ्त जितना सस्‍ता या मुफ्त कर देना चाहिए। लेकिन प्रकाशकों ने उनकी सुनी नहीं। और किताब अब भी बिक रही है। पॉल ने प्रकाशकों से बदला लेने के लिए चार पुस्‍तकें और लिखी और उन्‍हें ऑनलाइन मुफ्त उपलब्ध करा दिया है। जब मैं बबूता को पढ़ रहा था तो मेरे दिमाग में लगातार पॉल ही घूम रहे थे। एल्‍केमिस्‍ट के बाद मुझे इले‍वन मिनट्स हाथ लगी तो मैंने सोचा कि पॉल ऐसे अंधे हैं जिनके हाथ एल्‍केमिस्‍ट का बटेर लग गया होगा। छोटे शहर में रहने का यही नुकसान है कि बाहर क्‍या चल रहा है पता ही नहीं चलता। चर्चा करने वाले दोस्‍त भी सब बाहर जा चुके हैं। ठीक है इसके बाद वैल्‍के‍रीज हाथ आई। इस पुस्‍तक ने फिर से पॉल के प्रति रुचि जगा दी। यहां के एक पुस्‍तक विक्रेता पर दबाव डालकर जहीर मंगवाई और पढ़ी, लेकिन मैं एक प्रतिशत भी विश्‍वास नहीं कर रहा था कि पॉल मुफ्त किताबें भी देंगे।

इन पुस्‍तकों को आप भी यहां  से डाउनलोड कर सकते हैं। ये बिल्‍कुल मुफ्त हैं और पीडीएफ फार्मेट में उपलब्‍ध हैं। पॉल के इस कदम ने मुझे प्रकाशकों की सोच पर एक बार फिर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। बहुत से लोग बहुत क्रिएटिव होते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एक विचार मिलने पर उसकी इतनी शानदार पॉलिश करते हैं कि विचार पैदा करने वाला भी अचंभित रह जाता है। मैं ऐसे लोगों का उतना ही सम्‍मान करता हूं जितना कि विचार पैदा करने वाले का।

बबूता की सलाह और पॉल के कदम से प्रेरित होकर मैंने भी अपने ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग पर लगाए गए डिस्‍क्‍लेमर को बदल दिया है। अब मेरे लेखों को आप कभी भी कहीं भी इस्‍तेमाल कर सकते हैं। जैसा कि निशांत जी कहते हैं अगर आप अपने ब्‍लॉग से दो पैसे भी नहीं कमा रहे हैं तो अपने लेखों को मुक्‍त कर दीजिए। ठीक है मैं पैसे नहीं कमा रहा लेकिन अपने सृजन को तो कीमती मानता ही हूं। इसके बावजूद अपने विचार को आगे बढ़ाने के लिए मैं चाहूंगा कि सौ से अधिक रीडर रोजाना वाले मेरे ब्‍लॉग से कोई पोस्‍ट कॉपी की जाए और उसे दो सौ रीडर रोज पढ़ें।

शायद गणेश जी ने कहा तथास्‍तु...

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

अकेला केला ही कर दिखाएगा

अभी मेल से मुझे केले के बारे में विशद जानकारियां हासिल हुई हैं। मैंने कॉपी पेस्‍ट कर इसे यहां पोस्‍ट में ठेला है। आप भी देखिए क्‍या फायदे हैं अकेले केले के ही।

Two Bananas a Day Keep all Doctors Away

Never put banana in the refrigerator! !!

Bananas contain three natural sugars - sucrose, fructose and glucose combined with fiber. A banana gives an instant, sustained and substantial boost of energy.

Research has proven that just two bananas provide enough energy for a strenuous 90-minute workout. No wonder the banana is the number one fruit with the world's leading athletes.

But energy isn't the only way a banana can help us keep fit.

It can also help overcome or prevent a substantial number of illnesses and conditions, making it a must to add to our daily diet.

Depression: According to a recent survey undertaken by MIND amongst people suffering from depression , many felt much better after eating a banana. This is because bananas contain tryptophan, a type of protein that the body converts into serotonin, known to make you relax, improve your mood and generally make you feel happier.

PMS: Forget the pills - eat a banana. The vitamin B6 it contains regulates blood glucose levels , which can affect your mood.

Anemia: High in iron, bananas can stimulate the production of hemoglobin in the blood and so helps in cases of anemia.

Blood Pressure: This unique tropical fruit is extremely high in potassium yet low in salt, making it perfect to beat blood pressure. So much so, the US Food and Drug Administration has just allowed the banana industry to make official claims for the fruit's ability to reduce the risk of blood pressure and stroke.

Brain Power: 200 students at a Twickenham (Middlesex) school were helped through their exams this year by eating bananas at breakfast, break, and lunch in a bid to boost their brain power. Research has shown that the potassium-packed fruit can assist learning by making pupils more alert.

Constipation : High in fiber, including bananas in the diet can help restore normal bowel action, helping to overcome the problem without resorting to laxatives.

Hangovers : One of the quickest ways of curing a hangover is to make a banana milkshake, sweetened with honey. The banana calms the stomach and, with the help of the honey, builds up depleted blood sugar levels , while the milk soothes and re-hydrates your system.

Heartburn: Bananas have a natural antacid effect in the body, so if you suffer from heartburn, try eating a banana for soothing relief.

Morning Sickness : Snacking on bananas between meals helps to keep blood sugar levels up and avoid morning sickness .

Mosquito bites: Before reaching for the insect bite cream, try rubbing the affected area with the inside of a banana skin. Many people find it amazingly successful at reducing swelling and irritation.

Nerves: Bananas are high in B vitamins that help calm the nervous system.

Overweight and at work? Studies at the Institute of Psychology in Austria found pressure at work leads to gorging on comfort food like chocolate and crisps. Looking at 5,000 hospital patients, researchers found the most obese were more likely to be in high-pressure jobs. The report concluded that, to avoid panic-induced food cravings, we need to control our blood sugar levels by snacking on high carbohydrate foods every two hours to keep levels steady.

Ulcers: The banana is used as the dietary food against intestinal disorders because of its soft texture and smoothness. It is the only raw fruit that can be eaten without distress in over-chronicler cases. It also neutralizes over-acidity and reduces irritation by coating the lining of the stomach.

Temperature control : Many other cultures see bananas as a "cooling" fruit that can lower both the physical and emotional temperature of expectant mothers. In Thailand, for example, pregnant women eat bananas to ensure their baby is born with a cool temperature.

Seasonal Affective Disorder (SAD):Bananas can help SAD sufferers because they contain the natural mood enhancer tryptophan.

Smoking & Tobacco Use: Bananas can also help people trying to give up smoking. The B6, B12 they contain, as well as the potassium (K) and magnesium (Ma) found in them, help the body recover from the effects of nicotine withdrawal .

Stress: Potassium is a vital mineral, which helps normalize the heartbeat, sends oxygen to the brain and regulates your body's water balance. When we are stressed, our metabolic rate rises, thereby reducing our potassium levels. These can be rebalanced with the help of a high-potassium banana snack.

Strokes: According to research in "The New England Journal of Medicine, 'eating bananas as part of a regular diet can cut the risk of death by strokes by as much as 40%!

Warts: Those keen on natural alternatives swear that if you want to kill off a wart, take a piece of banana skin and place it on the wart, with the yellow side out. Carefully hold the skin in place with a plaster or surgical tape !

So, a banana really is a natural remedy for many ills. When you compare it to an apple, it has four times the protein, twice the carbohydrate, three times the phosphorus, five times the vitamin A and iron, and twice the other vitamins and minerals . It is also rich in potassium and is one of the best value foods around So maybe its time to change that well-known phrase so that we say, "A banana a day keeps the doctor away!"

PS: Bananas must be the reason monkeys are so happy all the time!

Shine your shoesJ Take the INSIDE of the banana skin, and rub directly on the shoe...polish with dry cloth.......

Shine your face J Mix banana with honey and a bit of lemon juice, make paste, apply on your face (beware of skin allergy- so make a test doze first), keep for half an hour every day before sun-rise and wash out... and Your face will shine like fresh banana....

Amazing fruit, really the banana, bringing consolation to the whole humanity.... .....and rather cheap.....So get going...

सोमवार, 13 जुलाई 2009

उड़न तश्‍तरी की सबसे लम्‍बी टिप्‍पणी :)

आज कुछ ऐसा हाथ लगा कि सोचा सबको बताया जाए। यह है एक टिप्‍पणी। हमारे समीर भाई की टिप्‍पणी। जिनके बारे में ब्‍लॉगजगत में मशहूर है कि वे उम्‍दा, बढि़या, रोचक, लगे रहिए, आभार से अधिक कम ही लिखते हैं। प्रतिदिन सैकड़ों पोस्‍ट जो पढ़ने होते हैं। लेकिन इस बार समीरजी को एक इश्‍यू ने ऐसा झकझोरा कि उन्‍होंने पोस्‍ट के साइज की टिप्‍पणी दे मारी। वहां की टिप्‍पणी को में यहां उठा लाया। ताकि सभी लोग उसे देख परख सकें। कहीं टिप्‍पणी बक्‍से में गुम न हो जाए।

तो पहले मैं किस्‍सा बताने की कोशिश करता हूं। रवि रतलामीजी ने  राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी : छपास पीड़ा का इलाज मात्र हैं ब्लॉग? में  ब्‍लॉग और साहित्‍य के बारे में गुड़ी मुड़ी चर्चा की। हमारे इस जगत के तूफानी लेखकों में से एक बालसुब्रमण्यमजी ने सवाल दागा कि क्या ब्लोग साहित्य है? इस पर शिव कुमार मिश्र जी ने कहा कि वही बात...ब्लॉग को साहित्य कहा जा सकता है या नहीं?  पर बहस अब पुरानी हो चुकी है। इसी पोस्‍ट तक आते आते समीरजी ब्‍लॉग और साहित्‍य के बीच गुल्‍ली डंडा करते हुए उकता गए और दे मारी मैराथन टिप्‍पणी। आप ऊपर दिए तीनों लिंक पर जाकर किस्‍सा समझें और बाद में समीरजी की टिप्‍पणी पढ़ें। पहले यह किस्‍सा मुझे मालूम नहीं था। कुछ पता था। इसी दौरान एक पोस्‍ट मैंने भी लिख मारी कि ब्‍लॉग साहित्‍य नहीं है। कन्‍फर्म। यहां तक आते आते तो समीरजी हाथ पर हाथ रखकर बैठने को तैयार हो गए थे। लेकिन उससे पहले की पोस्‍ट और उस पर कमेंट का अवलोकन करने के लिए प्रस्‍तुत है।

समीर भाई शिव कुमार मिश्रजी की पोस्‍ट में कहते हैं

कोई मुझे साहित्य की स्पष्ट परिभाषा बतलाने का कष्ट करे तो आजीवन आभारी रहूँगा और आगे से लेखन को उस परिभाषा की कसौटी में कस कस कर निचोड़ कर ब्लॉग को अरगनी मान सूखने फैला दिया करुँगा. जब हिट्स की चटक धूप में सूख जायेगा तो प्रतिक्रियाओं में मिले अंगारों को इस्तेमाल कर इस्त्री करके किताब की शक्ल में लाऊँगा..सब करुँगा..बस कोई मुझे साहित्य की स्पष्ट परिभाषा बतलाने का कष्ट करे.
साहित्य न हुआ, बीरबल की खिचड़ी हो गई-किसी को पता ही नहीं कितना पकाना है. कभी जैसे राहुल साकृत्यायन और किपलिंग को कह दिया कि पक गई पक गई..अभी खाये भी ठीक से नहीं कि कहने लगे नहीं पकी, नहीं पकी. मजाक बना कर रख दिया है. क्यूँ?
हे प्रभु, क्या जमाना आया है कि अब चार लोग चश्मा लगा कर बतायेंगे कि क्या साहित्य है और क्या नहीं..पाठक क्या घास छिलने को बनें हैं.
मानो आप हमें चपत लगा लगा कर साहित्य रचवा भी लो सिखा पढ़ा कर-फिर पाठक, उनको भी चपत लगाओगे क्या कि चल अब पढ़ इन्हें, ये साहित्यकार हैं. जी लेने दो, महाराज और आप भी जिओ. समय सबके पास लिमिटेड है, लेखक के पास भी और पाठक के पास भी, उस पर से बीच में बैठे आप छाना बीनी में लगे हैं, जबकि सबसे कम समय आप ही के पास है (औसत के हिसाब से):). ये सब छोड़ कर, माना आप ही कागज लुग्दी में साहित्य रच रहे हो, तो रचते काहे नहीं भई. यहाँ क्या करने तराजू लिये चले आ रहे हो? यहाँ तो इलेक्ट्राँनिक तराजू है. बटन दबाओ, झट छपो और पाठक बोले. कागज लुग्दी वाला बट्टा बाट और काँटा मारी की कम ही गुंजाईश है, इससे तो परेशान नहीं हो गये कहीं.
खैर जो मन आये सो करो. हमारे शिव बाबू हम सब की बात कह दिये हैं. वे सो गये हैं और अब हम भी चले सोने!! राम राम जी की!!

शनिवार, 11 जुलाई 2009

ब्‍लॉग साहित्‍य नहीं है। कन्‍फर्म.

मैंने दो प्रवृत्तियां स्‍पष्‍ट तौर पर देखी हैं। पहली जो परिवर्तन हो रहा है उसे स्‍वीकार नहीं करना और दूसरी कि जो नया है उसे पुराने के भीतर फिट करने का प्रयास करना।

अपनी बात कहने से पहले एक किस्‍सा सुनाना चाहता हूं। कुछ दिन पहले हमारे ग्रुप में बात हो रही थी। कुछ महीने पहले कह सकते हैं। ग्रुप के सभी लोगों के पास ऑरिजिनल विंडो एक्‍स पी सर्विस पैक थ्री था। सभी खुश थे और उसी की बातें कर रहे थे। मैंने बीच में तीर चलाया कि रवि रतलामी ने अपने ब्‍लॉग में बताया है कि माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज सेवन जारी किया है। ग्रुप में सभी लोगों ने ऐसे मुंह बिचकाया जैसे मैंने कोई बचकानी बात कह दी हो। मैंने दोबारा स्‍ट्रेस किया। तो कुछ साथी भड़क गए। बोले अब तक जितना कस्‍टमाइजेशन किया है उसका क्‍या होगा। नई विंडो आएगी तो सबकुछ दोबारा करना पड़ेगा। मोझिला जैसे ब्राउजर को दोबारा टूल करना भी टेढा काम है। बाकी छोटे मोटे सब मिलाकर कम से कम पचास सॉफ्टवेयर दोबारा डालने पड़ेंगे और अपडेट भी लेने पड़ेंगे।

मैं यह बात समझता था लेकिन उम्र के जिस दौर से गुजर रहा हूं हर नई चीज पर जल्‍दी पहुंचने की कोशिश में लगा हूं। सो मैं विंडो सेवन ट्राइ करने के लिए तैयार था। लेकिन अगर ग्रुप में एक भी बंदा मेरे साथ न हुआ तो फंसने पर सहायता मिलने की बजाय लानतें ही मिलती। अब मैंने पैंतरा फेंका। मैंने कहा कि वे लोग कितने बेवकूफ हैं जो अब तक विंडो 98 से चिपके हुए हैं। उन्‍हें न तो ग्राफिक्‍स का आनन्‍द आता है न यूनिकोड के जरिए हिन्‍दी लिखने का कुछ अनुभव है। मेरी इस बात पर सभी लोग प्रसन्‍न हो गए। हम लोग सचमुच आनन्‍द ले रहे थे। माहौल रिलेक्‍स हुआ तो मैंने कहा यदि हमने विंडो सेवन के प्रति रिजिडिटी दिखाई तो थोड़े दिन बाद हमारी हालत भी 98 वालों की तरह हो जाएगी। अब हर किसी का माथा ठनक गया। आधे घण्‍टे तक कैंटीन के बाहर धूप में चाय और सिगरेट चल रही थी। वातावरण नि:शब्‍द हो चुका था। वहां से उठे तो दो साथी सेवन डाउनलोड करने के लिए तैयार हो गए। रात को अनलिमिटेड मिलता है सो अगले दिन सुबह ही कॉल आ गई कि डाउनलोड कर लिया है ले जाना। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। अब इसे इस्‍तेमाल कर रहा हूं तो अपने निर्णय पर गर्व होता है।

अब आता हूं मुद्दे पर ब्‍लॉग को साहित्‍य कहने वाले लोगों की भी कमोबेश यही स्थिति है। दरअसल किसी ने घर में एसी लगाया है तो वह साहित्‍य का हिस्‍सा कैसे हुआ। कोई पुराने ग्रंथ की बातों का अनुवाद पेश कर रहा है तो वह साहित्‍य कैसे हुआ। कोई किसी मुद्दे को लेकर चिंतन कर रहा है, कोई खबर की जुगाली कर रहा है, कोई भाषा को दुरुस्‍त करने की बात कर रहा है, कोई घर परिवार के सदस्‍यों की बात कर रहा है, कोई सुंदर तस्‍वीरें पेश कर रहा है, किसी को देश की चिंता है, किसी को गलत भाषा के उपयोग की, कोई अपने पुराने साथियों को याद कर रहा है तो कोई तकनीक के बारे में जानकारी दे रहा है। इन सबमें साहित्‍य का भी एक भाग शामिल है लेकिन सबकुछ साहित्‍य नहीं है। और न ही इसे होना चाहिए। हम लोगों को प्रकाशन का एक नया माध्‍यम मिला है। अपनी बात, अपनी भावनाएं और अपनी समझ दूसरे लोगों तक पहंचाने का जरिया मिला है। इसे किसी एक शब्‍द या विधा से जोड़ देना वैसा ही है जैसे किसी नए ईजाद किए गए उपकरण पर बल्‍ब या बाइसाइकिल जैसा टैग लगा देना।

एक पत्रकार होने के नाते मैं कह सकता हूं कि ब्‍लॉग का सबसे महत्‍वपूर्ण बिंदु यह है कि आपके विचारों और प्रकाशन के बीच कोई माध्‍यम नहीं है। यह बहुत बड़ी बात होती है। जिन लोगों ने पहले अपनी रचनाएं प्रकाशित कराई है उनसे पूछिए कि एक रचना को प्रकाशन के प्रोसेस में कितना इंतजार और मॉडरेशन झेलना पड़ता था। जो लोग आकाशवाणी में बोले हैं वे जानते हैं कि शब्‍द और समय की सीमाएं कई बार विषय का ही गला घोंट देती हैं। टीवी से जुड़े लोगों को पता है कि विचार और उसके संप्रेषण के बीच हमेशा बाजार खड़ा मिलता है। ऐसे में हर दृष्टि से सृजकों को स्‍वतंत्र कर देने वाले माध्‍यम को मैं साहित्‍य नहीं मान सकता। साहित्‍य तो इसका एक बहुत छोटा अंश है।

मेरा निजी अनुभव बताता है कि इंटरनेट पर जहां सैक्‍स सबसे ज्‍यादा बिक रहा है वहां मनोरंजन पाठक, दर्शक या श्रोता की पहली शर्त है। उसे आनन्‍द आएगा तो वह रुकेगा। वरना आगे बढ़ चलेगा। यह टीवी तो नहीं है जो आधे घण्‍टे के सीरियल में बीस मिनट तक कमर्शियल झेलना ही पड़ेगा। इस माध्‍यम ने जिनता सर्जकों को आजाद किया है उतना ही पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को भी।

आगे समय है इस आजाद वैश्विक गांव में अपनी पहचान बनाने का। अधिक से अधिक लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए हमें इतनी सशक्‍त और प्रभावी बात करनी होगी कि पढ़ने वाला रुक जाए, सुनने वाला थम जाए और देखने वाला ठगा सा रह जाए। खुद के खर्च पर रचनाएं छापने वाले लोगों से यह माध्‍यम बहुत आगे निकल चुका है।

बाकी देखते हैं दुनिया इसे किस नजर से देखती है...

रविवार, 5 जुलाई 2009

मैं संक्रामक हो गया हूं !!

अब मैं कह सकता हूं कि मैं संक्रामक ब्‍लॉगर हो गया हूं। पिछले चार-पांच महीने में कई लोगों को ब्‍लॉग शुरू करवा दिए हैं। इनमें से कुछ ब्‍लॉग तो अच्‍छे खासे चल भी रहे हैं। मुझसे बातचीत करने वाले लोग कहते हैं कि थोड़ी देर की बात के बाद ही मैं ब्‍लॉग-ब्‍लॉग बोलने लगता हूं। पहले पोस्‍ट लिखकर पब्लिश करता और लोगों को घर लाकर वह पोस्‍ट पढ़ाता था। अब जहां भी जाता हूं वहां जीमेल अकाउंट बनवाता हूं और ब्‍लॉग शुरू करा देता हूं। मेरे कई  दोस्‍त तो मेरी इस संक्रामक बीमारी के कारण मुझसे कटे-कटे भी रहने लगे हैं। :)

इस संक्रमण का सबसे पहला शिकार थे मेरे सीनियर अनुराग हर्ष जी। उन्‍होंने अपने नाम से ही अपना ब्‍लॉग शुरू किया। अब एक पोस्‍ट लिखते है। मुझे दिखाते हैं और ब्‍लॉगवाणी पर अपने पाठकों के आंकड़े देखते हैं। दूसरा नम्‍बर रहा पीटीआई के फोटोग्राफर दिनेश गुप्‍ता का। उन्‍होंने अपना फोटो ब्‍लॉग WORLD WITH MY EYES बनाया। पहले ही महीने में 55 पोस्‍ट ठेल दी। मैंने कहा बंधुवर कभी कभार हैडिंग भी लिख दिया करो। अब वे हैडिंग लिखकर पोस्‍ट में फोटो ठेलते हैं। इससे आगे अभी मैंने बताया नहीं है सो आगे कुछ करते भी नहीं हैं। तीसरा नम्‍बर कह सकते हैं जूलॉजी के लेक्‍चरर डॉ. प्रताप कटारिया का। उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग desert wildlifer में लिखना तो शुरू कर दिया लेकिन पहली पोस्‍ट मेरे सामने लिखने के बाद आज तक वापस और कुछ लिखा नहीं है। इसके बाद मैंने ट्राइ किया स्‍तंभकार विनय कौड़ा पर। वे कहते तो हैं ब्‍लॉग शुरू करने के लिए लेकिन करते नहीं हैं। अगली मुलाकात में उन्‍हें ब्‍लॉगर बना ही दूंगा। इसके अलावा फूटी आंख नाम से भी एक ब्‍लॉग शुरू करवा चुका हूं। लेखक ज्ञान संतोषजी अपना नाम नहीं बताना चाहते सो उनका नाम नहीं दे रहा। हां अभी तक उन्‍होंने कोई पोस्‍ट नहीं लिखी है लेकिन शीघ्र ही वे एक कुत्‍्ते का इंटरव्‍यू छापेंगे।

पिछले दिनों जयपुर गया था। वहां मेरे एक दूर के मामाजी हैं डॉ शिव हर्ष। उन्‍होंने बीसेक सालों तक अमरीका में हार्ट सर्जन के तौर प्रेक्टिस की और अब वापस जयपुर आकर रहने लगे हैं। उनके कम्‍प्‍यूटर में कुछ खराबी आई थी। उसे दुरुस्‍त कराने के लिए मुझे बुलाया। कम्‍प्‍यूटर तो हाथों-हाथ ठीक नहीं हुआ लेकिन उनका ब्‍लॉग पहले ही बन गया। आप भी देखिएगा भारत में ह्रदय रोग के कारणों और निवारणों पर उनका ब्‍लॉग हार्ट सिम्‍पलीफाइड। यह ब्‍लॉग अंग्रेजी में ही सही लेकिन है केवल भारतीयों के लिए। डॉ शिव पांच दिन में दो पोस्‍ट ठेल चुके हैं और इसी रफ्तार से आगे बढ़ने वाले हैं। आप वहां पहुंचकर उनकी हौंसला आफजाई कर सकते हैं।